आपको पता है मोबाइल आपकी जासूसी कर रहा है

  • 29 मार्च 2018
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जीके पिल्लई नैस्कॉम की संस्था डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के प्रमुख हैं. इसका काम इंटरनेट की दुनिया को सुरक्षित बनाना है.

एक दिन उनके दफ़्तर में आए एक व्यक्ति ने उन्हें कुछ ऐसा दिखाया जिससे वो डर गए.

वो बताते हैं, "उस व्यक्ति ने मधुमक्खी के आकार का कुछ ज़मीन पर फेंका. फिर वो अपने मोबाइल पर कमरे की तस्वीरें दिखाने लगा. दरअसल मुधमक्खी जैसी चीज़ मिनी ड्रोन थी. ये दृष्य डरा देने वाला था. मान लीजिए कोई ऐसा ड्रोन आपके बेडरूम में रख दे तो आपकी निजता कितनी सुरक्षित रहेगी?"

निजता की बहस के बीच सवाल ये कि हमें निजता की कितनी समझ है?

जब हम कोई फ़्री ऐप डाउनलोड करके ओके का बटन दबाते चले जाते हैं, क्या हमें पता होता है कि ऐप हमारी सहमति से हमारे मोबाइल पर दोस्तों, परिवार के कांटैक्ट नंबर, हमारे एसएमएस, मोबाइल पर रखी तस्वीरें सब कुछ पढ़ या देख सकता है और अपने आर्थिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है.

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क्या होता है डेटा का

क्या हमें पता होता है कि हमारे डेटा का क्या इस्तेमाल किया गया या किस कंपनी को दिया गया?

नरेंद्र मोदी ऐप पर उभरे विवाद के बाद प्रिवेसी पॉलिसी में बदलाव कर एक शब्द 'प्रोसेस' का इस्तेमाल किया गया.

इस शब्द का अर्थ क्या है? इस प्रोसेसिंग से क्या हासिल किया जाएगा, इस बारे में आप और हम मात्र अंदाज़ा लगा सकते हैं.

इलियट ऑल्डरसन (असली नाम बैप्टिस्ट रॉबर्ट) के नाम से ट्वीट करने वाले फ़्रांस के सिक्योरिटी रिसर्चर का इस नई प्रिवेसी पॉलिसी पर कहना है, "साफ़ है इस डेटा का इस्तेमाल प्रोफ़ाइल बनाने के लिए किया जा सकता है. मान लीजिए नमो ऐप आपका आईपी उनके सर्वर पर भेजता है. इससे ऐप आपकी लोकेशन जान सकता है और ये भी जान सकता है कि आप कहाँ-कहाँ जा चुके हैं."

भाजपा का कहना है कि 'कुछ' जानकारियों को प्रोसेस करने के लिए 'तीसरी पार्टी' को भेजा जा सकता है ताकि लोगों को पर्सनलाइज़़्ड एक्सपीरियंस दिया जा सके.

इस पर ऑल्डरसन कहते हैं, "ऐप का यूज़र एक्सपीरियंस बेहतर करने के लिए निजी डेटा को इकट्ठा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. नमो ऐप राजनीतिक इस्तेमाल के लिए है. निजी डेटा के आधार पर प्रासंगिक विषय दिखाना (मैनिपुलेशन) चालबाज़ी है."

ऑल्डरसन के अनुसार नमो ऐप में डाला गया डेटा को कोई बाहरवाला चाहे तो बीच में पढ़ सकता है.

उन्होंने कांग्रेस के मेंबरशिप ऐप में भी सुरक्षा को लेकर खामी गिनाई.

कैंब्रिज ऐनेलिटिका, आधार, भाजपा और कांग्रेस ऐप के डाउनलोड पर मची बहस के बीच क्या हमें समझ है कि पर्दे के पीछे हमारा मनोवैज्ञानिक, सोशलॉजिकल प्रोफ़ाइल बनाया जा रहा है ताकि हमें हमारी मनपसंद चीजें बेची जा सकें, या फिर हमारी पसंद, नापसंद को प्रभावित किया जा सके?

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कैसे लगती है आपकी निजता में सेंध

हमें मोबाइल फ़ोन बेहद पसंद है. साथ ही हमें मुफ़्त चीज़ें भी पसंद हैं.

जब हमें कोई मुफ़्त ऐप डालउनलोड करने पर 500 या 1000 रुपए का मुफ़्त वाउचर देता है तो क्या फ़ायदा सिर्फ़ हमारा होता है?

डेटा प्रोटेक्शन और निजता पर काम करने वाले वकील वकुल शर्मा बताते हैं, "दुनिया में कोई चीज़ मुफ़्त नहीं होती. फ़्री ऐप डाउनलोड की क़ीमत आपकी और आपके परिवार की निजता होती है जो वो ऐप आपसे वसूल करते हैं."

ऐप डाउनलोड करते वक्त, या फिर ऐप में निजी जानकारियों फ़ीड करके ओके का बटन दबाने से पहले हम कई पन्नों लंबी शर्तों को पढ़ना ज़रूरी नहीं समझते.

क्या कभी ऐसा नहीं हुआ कि आपने एअर टिकट ली हो और उसके बाद अचानक आपके मोबाइल या सोशल मीडिया पेज पर यात्रा से जुड़ी चीज़ें दिखने लगी हों.

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किसी डायग्नॉस्टिक सेंटर में परीक्षण का पर्चा लेने के बाद क्या हम जानने की कोशिश करते हैं कि वो सेंटर उस मेडिकल जानकारी को कब तक अपने पास रखेगा और फिर उसे कब डिलीट किया जाएगा?

सेंटर कारण देते हैं कि वो उस जानकारी को अगले परीक्षण में रेफ़रेंस के लिए इस्तेमाल करेंगे.

लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि उस जानकारी को किसी फ़ार्मेसी, दवा बनाने वाली कंपनी, अस्पताल को न बेचा गया हो ताकि उस डेटा के आधार पर नई दवाइयों की बिक्री या फिर कोई और बेचने वाली चीज़ का समय पता किया जा सके?

हमारे डेटा के साथ क्या होता है, हमें कोई जानकारी नहीं होती.

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ये सारी डेटा माइनिंग ऐल्गोरिद्म आधारित होती है जिसका मक़सद होता है, मोबाइल के पीछे के इंसान का 'क्लोन' तैयार करना ताकि उसी के पसंद, नापसंद के आधार पर प्रोडक्ट को डिज़ाइन किया जा सके.

वकुल शर्मा कहते हैं ऐल्गोरिद्म में लगातार हो रहे सुधार के कारण हमारा दिमाग़ी, व्यावहारिक प्रोफ़ाइल तैयार हो रहा है क्योंकि जब हम अकेले में फ़ेसबुक या ट्विटर में डूबे होते हैं तो वो किसी नियंत्रित माहौल में नहीं होता.

उस वक्त हम हम होते हैं और कोई नहीं और हम अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर अपने व्यवहार की छाप छोड़ रहे होते हैं.

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ऐल्गोरिद्म का खेल

वकुल शर्मा कहते हैं, " ऐल्गोरिद्म इतनी तेज़ी से बेहतर हो रहे हैं कि आपका सोशियोलॉजिकल प्रोफ़ाइल बन रहा है. वक्त बीतने के साथ ऐल्गोरिद्म में और सूक्ष्मता आती जाएगी."

इन कारणों से मानव इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब हम किसी व्यक्ति के अंदर के इंसान को इतनी नज़दीकी से समझ पा रहे हैं.

वकील पवन दुग्गल कहते हैं, "अगर एक बार आप किसी ऐप को अपना डेटा देने को तैयार हो जाते हैं तो फिर तीर कमान से निकल जाता है."

इस बीच यूआईडीएआई के पूर्व प्रमुख नंदन नीलकेनी ने रिपोर्टों के मुताबिक हाल ही में कहा कि भारतीय अपना डेटा बेचकर पैसा कमा सकते हैं और अपनी ज़िंदगी बेहतर बना सकते हैं.

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यानि आपके जिस डेटा को बेचकर इंटरनेट कंपनियों करोड़ों, अरबों रुपए कमा रही हैं, उसमें से कुछ पैसा आपको क्यों नहीं मिल रहा?

पवन दुग्गल कहते हैं कि भारतीय अपना डेटा ख़ुद से बेचने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि हम निजता को लेकर जागरुक ही नहीं हैं?

वो कहते हैं, "जब भारत में डेटा संरक्षण से जुड़ा कोई क़ानून ही नहीं है तो आप चाहते हैं कि आप अपने डेटा को बेचकर पैसे कमाएं? ऐसा करने पर भारतीय गिनी पिग जैसे हो जाएंगे जिन पर विभिन्न तरह के तज़ुर्बे किए जाएंगे."

साथ ही लोगों को पता नहीं होगा कि अगर कोई विवाद होता है तो निपटारे में कितने साल अदालत के चक्कर लगाने होंगे.

एक अन्य चिंता सर्वर के भारत से बाहर सिंगापुर, अमरीका और यूरोप में होने पर है जिनके अधिकृत या अनधिकृत इस्तेमाल से है.

सायबर वकील विराग गुप्ता कहते हैं, "दुनिया की नौ बड़ी कंपनियों ने भारत का डेटा प्रिज़्म प्रोग्राम के तहत अमरीकी एजेंसी एनएसए के साथ शेयर किया. न ही यूपीए, न मोदी सरकार ने उन कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की. इसकी बजाय डिजिटल इंडिया के नाम पर उनको आमंत्रण देते गए."

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क्या करें

वो कहते हैं, "हम डिजिटल इंडिया के तहत इन कंपनियों के सर्वर को भारत में क्यों नहीं ला पा रहे हैं? इस बारे में पूरी तरह पता चलना चाहिए कि भारतीय डेटा का का किस तरह इस्तेमाल हो रहा है. इस डेटा से कंपनियों को जो फ़ायदा हो रहा है उस पर टैक्स लगना चाहिए. डेटा ट्रांसैक्शन पर टैक्स क्यों नहीं लग रहा है?

"आज हमारे सारे सरकारी विभाग सोशल मीडिया से जुड़े हैं. अलग-अलग ऐप का इस्तेमाल हो रहा है. ये सारा डेटा विदेश में जा रहा है. क्या हम डेटा कॉलोनी हैं? देश में तीन करोड़ सरकारी अधिकारी हैं. एनआईसी के पास सरकारी ईमेल का जो इंफ़्रास्ट्रक्चर है वो मुश्किल से 15-20 लाख लोगों के लिए है. बाकी लोग प्राइवेट ईमेल इस्तेमाल कर रहे हैं."

फ़्रेंच रिसर्चर बैप्टिस्ट रॉबर्ट कहते हैं, "जब आप एक राजनीतिक पार्टी हैं और लाखों लोगों का डेटा इकट्ठा कर रहे हैं तो ये एक अच्छा (राजनीतिक) आइडिया होगा कि सर्वर आपके देश में हो."

डर है कि जल्द ही डेटा माइनिंग से ऐल्गोरिद्म इतने स्मार्ट हो जाएंगे कि हमारी राजनीतिक पसंद और नापसंद पर प्रभाव डालने लगेंगे.

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वकुल कहते हैं, "ऐसा अभी नहीं है, लेकिन अगले 10 सालों में ऐसा हो जाएगा."

ज़रूरत है उपभोक्ताओं को जागरुक होने की और हर क्लिक से पहले सोचने की कि हम अपनी हामी किस चीज़ के लिए दे रहे हैं.

सायबर सिक्योरिटी ऐक्सपर्ट और सरकार के साथ सालों काम कर चुके पुखराज सिंह सलाह देते हैं कि लोग इंटरनेट पर गुमनाम रहें क्योंकि "पता नहीं अगले 10-12 साल बाद हमारे बारे में मौजूद जानकारी से क्या मतलब निकाला जाएगा."

आधार ने जब लापता सौरभ को मिलवाया माँ-बाप से

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