भगत सिंह की भूख हड़ताल पर क्या बोले थे मोहम्मद अली जिन्ना?

  • 23 मार्च 2018
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Image caption भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की एक पुरानी तस्वीर

कुछ साल पहले ऐतिहासिक रिकॉर्ड होने के बावजूद मोहम्मद अली जिन्ना और भगत सिंह के बीच के संबंधों के बारे में सोचना भी मुश्किल था.

ये 1996 में ए जी नूरानी की किताब 'द ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह पॉलिटिक्स ऑफ़ जस्टिस' आने के बाद ही पहली बार संभव हो पाया.

किताब में उन्होंने न केवल सेंट्रल असेंबली की पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया है बल्कि उन्होंने 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में भूख हड़ताल करने पर जतिन दास की शहादत के बाद और पहले दिए गए जिन्ना के पूरे भाषण को भी शामिल किया है.

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 14 जून, 1929 को भूख हड़ताल शुरू की थी.

उन दोनों को दिल्ली बम धमाके में दिल्ली की अदालत ने दोषी ठहराया था. इसके बाद उन्हें पंजाब के मियांवली और लाहौर जेल में भेज दिया गया था.

8 अप्रैल, 1929 उन्होंने सेंट्रल असेंबली (अब संसद भवन) पर एक बम फेंका, तब से उन्हें 12 जून तक दिल्ली में ट्रायल पर रखा गया. ट्रायल के दौरान उन्हें अख़बारों और अच्छे भोजन की सभी सुविधाएं प्रदान की जा रही थीं.

लेकिन दोषी ठहराए जाने और पंजाब की जेल भेज दिए जाने के बाद उनसे सभी सुविधाएं वापस ले ली गईं.

लाहौर और पंजाब तक यात्रा के समय उन्होंने 'राजनीतिक कैदी के तरह व्यवहार करने और अख़बार और अच्छे भोजन की मांग की. लेकिन न मिलने पर उन्होंने वहीं से भूख हड़ताल शुरू करने का फैसला किया.'

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भगत सिंह को मियांवली जेल ले जाया गया और बीके दत्त को लाहौर जेल में रखा गया.

जब 10 जुलाई, 1929 को सॉन्डर्स हत्याकांड की सुनवाई शुरू हुई तो भगत सिंह को स्ट्रैचर पर कोर्ट लाया गया. तभी बाकी के कॉमरेड को भगत सिंह और बीके दत्त की भूख हड़ताल के बारे में पता चला.

लाहौर षड्यंत्र केस के लिए सभी को लाहौर जेल में रखा गया था. तभी जतिन दास और अन्य लोग भी भूख हड़ताल में शामिल हुए.

केवल जतिन दास को ही कांग्रेस आंदोलन के दौरान जेल में भूख हड़ताल देखने और राजनीतिक कैदी होने का अनुभव था. और उन्होंने अपने अन्य कॉमरेड साथियों को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के लिए सावधान रहने के लिए कहा था.

उन्होंने घोषणा की कि चाहे दूसरे भूख हड़ताल तोड़ दें पर वे नहीं तोड़ेगें.

जब सभी राजनीतिक गतिविधियों और लाहौर के मीडिया केंद्र में भूख हड़ताल पर सब एक साथ आए तो ये एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया. इसे शिमला में सेंट्रल असेंबली सत्र में भी उठाया गया.

14 जुलाई को लाहौर ने 'द ट्रिब्यून' में उनकी सभी मांगों को प्रकाशित किया.

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Image caption भगत सिंह के भूख हड़ताल का पोस्टर

जतिन दास की तबियत बिगड़ी

जिसे भगत सिंह और दत्त ने दिल्ली में ट्रायल के दौरान लिखा था.

उन्होंने उसमें बताया कि उनके साथ दिल्ली में सही से व्यवहार किया गया लेकिन मियांवली और लाहौर जेल भेजने के बाद से उनके साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है.

हड़ताल करने वाले सभी लोगों को जेल के अधिकारी ज़बरदस्ती खाना खिला रहे हैं. लेकिन जतिन दास के इरादे बुलंद थे और उन्हें भूख हड़ताल का पहले से भी अनुभव था.

उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया. उनके साथ जेल के अधिकारियों ने क्रूर व्यवहार किया और ज़बरदस्ती फेफड़ों में पंप से दूध पहुंचाया गया, जिससे उनकी तबियत खराब हो गई.

इसके बाद जतिन दास को जेल के हॉस्पिटल में भेजा गया लेकिन उनकी हालत और बिगड़ती गई.

जेल के डॉक्टर के अलावा जेल के बाहर के डॉक्टर और कांग्रेस पार्टी के नेता डॉ गोपी चंद भार्गव आए दिन जेल में जतिन दास से मिलने आया करते थे.

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Image caption नेशनल कॉलेज लाहौर की फ़ोटो. पगड़ी पहने भगत सिंह (दाहिने से चौथे) खड़े नज़र आ रहे हैं (तस्वीर प्रोफ़ेसर चमनलाल ने उपलब्ध करवाई है)

भगत सिंह से नाराज़ हुए जतिन

वे जतिन दास को तरल पदार्थ लेने को कहते, लेकिन जतिन दास को मनाना बहुत मुश्किल था.

उनके छोटे भाई किरन दास को उनके साथ रहने की इजाजत दे दी गई. लेकिन इससे भी जतिन दास की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा.

भगत सिंह के कहने पर जतिन दास एक बार तरल पदार्थ लेने को तैयार हो गए. क्योंकि वे भगत सिंह से बहुत प्यार और सम्मान करते थे.

लेकिन वे भगत सिंह से नाराज थे कि उन्होंने तरल पदार्थ लेने के लिए उन पर दबाव क्यों बनाया?

ये मामला 12 सितम्बर, 1929 को केंद्रीय विधानसभा में उठा. उस दिन विधानसभा का सत्र होम मेंबर सर जेम्स क्रेरार के बिल से शुरू हुआ.

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जिन्ना को मिली तारीफ़

इस बिल में संशोधन किया गया कि कुछ मामलों में आरोपी के अनुपस्थिति होने पर भी मुकद्दमे को आगे बढ़ाया जा सकता है.

इस पर जिन्ना ने सवाल उठाया, ''आप उन पर मुकद्दमा चलाना चाहते हो या उन्हें परेशान करना चाहते हैं?''

ये भगत सिंह और उनके दूसरे साथियों के संदर्भ में था, जो भूख हड़ताल पर थे और ट्रायल के लिए कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकते थे.

देवन चमन लाल ने 14 जुलाई, 1929 को ट्रिब्यून में आई भगत सिंह और दत्त की मांग को पढ़ा.

जिन्ना ने हस्तक्षेप किया, 'जो आदमी भूख हड़ताल करता है वो उसकी खुद की मर्जी होती है. वे अपने अंतरमन की आवाज सुनते हैं और न्याय में विश्वास करते हैं.'

ब्रिटिश शासन के दौरान विधानसभा सत्र ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में चल रहा था.

'पंजाब एक डरावनी जगह'

ट्रिब्यून के संवाददाता ने शिमला से रिपोर्ट की कि जिन्ना ने सदन में अच्छा प्रभाव डाला और इसके बाद उन्हें प्रशंसा भी मिली. जिन्ना ने पंजाब को 'एक डरावनी जगह कहा'!

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जिन्ना ने विधानसभा के कानून के जानकारों को भूखा रखने को कहा ताकि उन्हें पता चले कि भूख हड़ताल के बाद मनुष्य के शरीर पर क्या असर पड़ता है.

उन्होंने कहा, 'भूख हड़ताल पर हर कोई नहीं रह सकता. कभी रहने की कोशिश करें और देखें कि क्या होता है'.

जिन्ना ने 12 सितंबर को अपना भाषण शुरू किया, तब जतिन दास जीवित थे. और 14 सितंबर को भाषण की समाप्ति हुई.

हालांकि जतिन दास की मौत 13 सितंबर को ही हो गई थी. और सदस्यों ने चर्चा में शामिल होने से मना कर दिया.

उन्होंने अपने प्रदर्शन से ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था, "आपको नहीं लगता कि लोगों के विरोध और संघर्ष का कारण कठोर उपचार और दबाव नीति से ज्यादा है."

एजी नूरानी के अनुसार, ''जिन्ना को भगत सिंह और उनके साथियों का सम्मान मिला. जिन्ना ने कहा कि अगर यह संशोधन हुआ तो ट्रायल सिर्फ 'न्याय के लिए एक मजाक' बन कर रह जायेगा".

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Image caption असेंबली बम केस में भगत सिंह के खिलाफ उर्दू में लिखा गया एफआईआर

सिख नेताओं की रिहाई की मांग

जिन्ना को मोती लाल नेहरू, एम आर जयकर, रफी अहमद किदवई आदि का समर्थन मिला. संशोधन के खिलाफ़ 55 में से 47 वोट मिले. जिन्ना ने इसके खिलाफ़ वोट किया.

फरवरी 1929 में असेंबली में भाषण के दौरान जिन्ना ने लाला लाजपत राय की मौत पर दुख व्यक्त किया, जिनके साथ उनके अच्छे संबंध थे.

उन्होंने सिख गुरुद्वारा एक्ट के सिलसिले में जेल में रहने वाले सिख नेताओं की रिहाई के लिए भी मांग की.

साथ ही उन्होंने वल्लभ भाई पटेल, एनी बसंत, अली ब्रदर्स, हसरत मोहानी जैसे राष्ट्रवादियों को हिरासत में लेने का विरोध भी किया.

भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव पर संशोधित अधिनियम के तहत मुकद्दमा चलाया गया. और एक झूठी सुनवाई के बाद उन्हें 23 मार्च, 1931 को फांसी पर लटका दिया गया.

जिन्ना के शब्दों में कहें तो ये ''न्याय का मज़ाक उड़ाया'' गया है.

[चमनलाल जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं. और वे 'अंडरस्टेंडिग भगत सिंह' किताब के लेखक हैं.]

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