नज़रियाः 'लाभ के पद' मामले में आम आदमी पार्टी को मिला तिनके का सहारा

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बीस विधायकों की सदस्यता-बहाली से लगातार ढलान पर उतरती आम आदमी पार्टी को फ़ौरी तौर पर न केवल राहत की साँस लेने का मौका मिलेगा, बल्कि वह कह सकती है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है.

इसे डूबते को तिनके का सहारा कह सकते हैं. पर यह मुकम्मल जीत नहीं है. अभी कई किन्तु-परन्तु बाकी हैं. चुनौती इस बात की भी है कि हमारी सांविधानिक संस्थाएं इस मामले को किस तरह सुलझाती हैं.

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लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सवाल

दिल्ली उच्च-न्यायालय का फ़ैसला मूलतः लोकतांत्रिक मर्यादाओं और न्याय-प्रक्रिया की कसौटी से जुड़ा है. अदालत ने चुनाव आयोग के उस फ़ैसले को ख़ारिज किया है जिसके तहत 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त की गई थी.

हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद अभी कुछ सवाल उठेंगे. सबसे पहले देखना होगा कि केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग इसे यथा-रूप स्वीकार करेंगे या चुनौती देंगे? चुनौती देंगे तो किस आधार पर और कहाँ?

इस बात की गारंटी नहीं है कि चुनाव आयोग सुनवाई के बाद भी वही फ़ैसला नहीं करेगा जो पहले किया था. सवाल आयोग की प्रासंगिकता का और उसके अधिकार-क्षेत्र का है. आयोग पर हो रहे लगातार राजनीतिक हमले भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं.

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केन्द्र को शर्मिंदगी

यह फ़ैसला केन्द्र सरकार के लिए भी शर्मिंदगी पैदा करने वाला है. इसके राजनीतिक निहितार्थ कम नहीं हैं. इसके पहले अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के मामले में केन्द्र सरकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है.

सवाल है कि जब राष्ट्रपति के सामने चुनाव आयोग की रिपोर्ट रखी जा रही थी, तब उन्होंने चुनाव आयोग से सवाल क्यों नहीं किए? उससे सफ़ाई क्यों नहीं माँगी? ऐसे ही सवाल उत्तराखंड और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लागू करने से जुड़ी अधिसूचनाओं को लेकर भी थे.

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बदनीयती का आरोप

विधायकों की सदस्यता के प्रसंग में आम आदमी पार्टी ने केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग पर बदनीयती के आरोप लगाए हैं. हाईकोर्ट के फ़ैसले को पार्टी ने 'सत्य की जीत' बताया है.

बीजेपी के विरोधी लगातार आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग सरकारी दबाव में काम कर रहा है. इस फ़ैसले से इस आरोप को बल मिलेगा. सांविधानिक संस्था की साख का सवाल खड़ा होगा.

अदालत ने माना है कि विधायकों को अपनी बात कहने का उचित अवसर नहीं मिल पाया, इसलिए यह मामला फिर से चुनाव आयोग के पास ले जाना चाहिए. अदालत ने विधायकों से पूछा भी था कि क्या वे मामले की पुनः सुनवाई चाहते हैं.

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आयोग की विसंगतियाँ

हाईकोर्ट ने कुछ विसंगतियों की ओर इशारा किया है, जिनसे चुनाव आयोग की तटस्थता पर प्रकारांतर से आँच आती है. अदालत ने कहा है कि आयोग की 19 जनवरी 2018 की सलाह विधिक-दृष्टि में ख़राब है. उसमें प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हुआ. विधायकों को मौखिक सुनवाई और अपने पक्ष में दलील रखने का मौका नहीं दिया गया.

तत्कालीन चुनाव आयुक्त और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने खुद को इस मामले की सुनवाई से पहले अलग कर लिया था, फिर वे इस मामले की सुनवाई में शामिल हो गए. ऐसा कैसे हुआ, यह स्पष्ट नहीं है.

हाईकोर्ट ने कहा है कि आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि 'सरकार में लाभ के पद' का मतलब क्या होता है. तब फ़ैसला करे कि विधायक सदस्यता के लिए अयोग्य हैं या नहीं.

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'आप' के अंतर्विरोध

दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 2015 के चुनाव में मिली भारी जीत भी उसके गले की हड्डी बन गई है. इतनी बड़ी संख्या में आने के बाद विधायकों की ज़रूरतें भी बढ़ गईं.

आम आदमी पार्टी की सरकार ने समर्थक विधायकों को प्रसन्न रखने के लिए वही तरीके अपनाए जो तमाम राजनीतिक दल अपनाते हैं. दिल्ली में विधायकों को संसदीय सचिव के पद देते वक्त सरकार ने 'लाभ के पद' की तरफ़ ध्यान नहीं दिया.

पेशबंदी में देरी

सच यह है कि कुछ राज्यों में ऐसे पद हैं, पर वहाँ की विधानसभाओं ने इसके लिए पहले से जरूरी प्रस्ताव पास कर लिए हैं. दिल्ली में पदों पर पहले नियुक्तियाँ हुईं, फिर पेशबंदी के प्रयास हुए. दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, केन्द्र शासित प्रदेश है.

उप-राज्यपाल ने विधानसभा में संशोधन की अनुमति नहीं दी. सदस्यों की नियुक्ति होने के बाद एक तरफ चुनाव आयोग से शिकायत हुई. दूसरी तरफ हाईकोर्ट में मामला गया.

हाईकोर्ट ने विधायकों की नियुक्ति को रद्द कर दिया, पर चुनाव आयोग ने इस मामले को खत्म नहीं किया. सम्भव है कि इन सभी पेचीदगियों के मद्देनज़र चुनाव आयोग या केन्द्र सरकार उच्चतम न्यायालय जाएं.

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जान में जान आई

आम आदमी पार्टी को लगातार एक के बाद एक झटके लग रहे हैं. निश्चित रूप से हाईकोर्ट के इस फ़ैसले से उसकी जान में जान आई है.

यदि इस दौर में 20 सीटों पर फिर से चुनाव की नौबत आती और उनमें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो पार्टी के पैरों की जमीन खिसकने में देर नहीं लगती. फिलहाल पार्टी को संभलने का मौका मिल गया है.

यह मसला कांग्रेस और बीजेपी के राजनीतिक नज़रियों की भी परीक्षा का मौका पेश करेगा. आम आदमी पार्टी से दोनों दल नाराज़ हैं. अरविन्द केजरीवाल ने कुछ समय पहले तक खुद को नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ बराबरी पर खड़ा करने की कोशिश भी की.

हालांकि इस वक्त पार्टी जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है, पर उसका ठिकाना नहीं कि कब उसके हौसले बुलंद हो जाएं.

अरविन्द केजरीवाल का कुछ महीने पुराना ट्वीट है, 'जब आप सच्चाई और ईमानदारी पर चलते हैं तो बहुत बाधाएँ आती हैं... इतिहास गवाह है कि जीत अंत में सच्चाई की होती है.'

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