झारखंड : राज्यसभा चुनाव की पिक्चर अभी बाक़ी है

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Image caption अमित महतो के वोट को लेकर बीजेपी ने हाईकोर्ट जाने की बात कही है

झारखंड में राज्यसभा चुनाव की कहानी में नया मोड़ आ गया है. चुनाव आयोग की ओर से घोषित परिणाम को भारतीय जनता पार्टी चुनौती देने जा रही है.

पार्टी का तर्क है कि चुनाव के दिन ही कोर्ट से दो साल की सज़ा पाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के विधायक अमित महतो का वोट अवैध है. लिहाज़ा, उनके वोट को रद्द कर देना चाहिए.

झारखंड भाजपा के महामंत्री दीपक प्रकाश ने संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी सोमवार को इस मामले को लेकर हाईकोर्ट जाएगी.

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पार्टी इसके लिए 10 जुलाई 2013 को लिली थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश को आधार बनाएगी.

दीपक प्रकाश ने बीबीसी से कहा, "सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि 2 साल या उससे अधिक की सज़ा मिलते ही किसी भी विधायक या सांसद की सदस्यता स्वत: ख़त्म हो जाती है. झामुमो विधायक अमित महतो की सदस्यता भी सज़ायाफ्ता होते ही रद्द हो गयी. ऐसे में जब वे विधायक रहे ही नहीं तो निर्वाचन आयोग ने उनके वोट को रद्द क्यों नहीं किया."

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Image caption कांग्रेस प्रत्याशी धीरज साहू .01 वोट से निर्वाचित घोषित किए गए

क़रीबी अंतर से जीते धीरज

बीती 23 मार्च को हुए राज्यसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के समर्थन से उतरे कांग्रेस प्रत्याशी धीरज साहू दशमलव शून्य एक ( .01) वोट से निर्वाचित घोषित किए गए थे.

भारत में इतने मामूली अंतर से हुई यह इकलौती जीत थी. उन्होंने भाजपा के दूसरे प्रत्याशी प्रदीप कुमार सोंथालिया को हराया था.

झारखंड में राज्यसभा की 2 सीटें रिक्त हुई थीं. इनमें से एक सीट भाजपा पहले ही जीत चुकी है. उस सीट पर बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष समीर उरांव निर्वाचित हुए.

वोटों की गिनती में बीजेपी प्रत्याशी समीर उराँव को 27, कांग्रेस के धीरज साहू को 26 और बीजेपी के प्रदीप कुमार सोंथालिया को 25.99 वोट मिले थे.

चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग हुई थी. इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) ने अपने विधायक प्रकाश राम को पार्टी से निलंबित कर दिया था.

वहीं, विपक्ष का कहना है कि चूंकि वोटिंग के वक़्त तक अमित महतो को सज़ा नहीं सुनायी गयी थी.

ऐसे में उनके वोट को रद्द करने का कोई क़ानूनी आधार नहीं बनता है.

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Image caption झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस नेता आलमगीर आलम

'रद्द नहीं हो सकता वोट'

झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस नेता आलमगीर आलम ने बीबीसी से कहा, "झामुमो विधायक अमित महतो ने सुबह सवा नौ बजे के क़रीब वोट दिया था. तब तक कोर्ट ने उन्हें सज़ा नहीं सुनायी थी. वह क़ानूनन विधायक थे. ऐसे में उनके वोट को कैसे रद्द किया जा सकता है. चुनाव आयोग ने उनके वोट को मतगणना में शामिल कर संवैधानिक प्रावधानों का पालन किया है."

"किसी भी विधायक की सदस्यता रद्द करने की घोषणा विधानसभा के अध्यक्ष करते हैं. इसके लिए उनके दफ़्तर तक कोर्ट के आदेश की प्रति आना आवश्यक है. जिस वक़्त अमित महतो ने वोट दिया, तब तक स्पीकर ने उनकी सदस्यता रद्द नहीं की थी. ऐसे में अमित महतो का मत किसी तरह से अवैध नहीं माना जा सकता."

झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने इस मुद्दे पर कहा कि बीजेपी तो दो सीट जीतकर भी सरकार बनाने लगती है. उससे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की क्या उम्मीद की जा सकती है.

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Image caption प्रदीप कुमार संथोलिया

नाकाम होगी कोशिश

उन्होंने बीबीसी से कहा कि भाजपा की कोशिशें नाकाम होंगी क्योंकि उनके पास कोई वाजिब क़ानूनी आधार नहीं है. हमारी पार्टी ज़रूरत पड़ने पर कोर्ट में भी उनका मुक़ाबला करेगी.

ग़ौरतलब है कि सिल्ली से झामुमो विधायक अमित महतो को एक सरकारी अधिकारी से साल 2006 में की गयी मारपीट के मामले में अपर न्यायायुक्त दिवाकर पांडेय की अदालत ने 23 मार्च की दोपहर दो साल की सज़ा सुनाई थी.

जिस वक़्त कोर्ट ने उन्हें सज़ा सुनायी, झारखंड विधानसभा परिसर में राज्यसभा के लिए वोटिंग चल रही थी.

वो अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुके थे लेकिन वोटों की गिनती उनके सज़ायाफ़्ता होने के बाद करायी गयी.

हालांकि, झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार मानते हैं कि इस मामले में अमित महतो के वोट की गिनती क़ानून सम्मत है. इसके कई ठोस आधार हैं.

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Image caption समीर उराँव

उन्होंने बीबीसी से कहा, "क्योंकि वोट देते वक़्त अमित महतो विधायक थे लिहाज़ा उनके वोट को ग़ैर-क़ानूनी कैसे कह सकते है. कोर्ट का फ़ैसला उनके वोट देने के बाद आया है. इसलिए उसे चैलेंज करने का आधार नहीं है."

"किसी भी निर्वाचित विधायक की सदस्यता रद्द करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास है. वो ये फ़ैसला कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद करते हैं क्योंकि वोटों की गिनती के वक़्त तक उन्हें कोर्ट का आदेश नहीं मिला था. ये जानकारी मीडिया ने लोगों तक पहुंचाई थी. मीडिया रिपोर्ट के आधार पर स्पीकर फ़ैसला नहीं ले सकते. ऐसे में वोटों की गिनती में अमित महतो के वोट को शामिल करना विधायी प्रावधानों के अनुकूल है."

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