BBC EXCLUSIVE: अखिलेश यादव ने दिया आरक्षण का नया फ़ॉर्मूला

  • 27 मार्च 2018
अखिलेश यादव, उत्तर प्रदेश इमेज कॉपीरइट Twitter@yadavakhilesh

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इन दिनों आबादी के हिसाब से हक़ की मांग कर रहे हैं.

साल 2017 में यूपी विधानसभा का चुनाव विकास के नाम पर लड़कर करारी हार झेलने के बाद उनका कहना है कि जिसकी जितनी आबादी है, उसे उतना हक मिलना चाहिए.

उनके इस बयान का क्या मतलब है? क्या वे मौजूदा व्यवस्था में किसी तरह का बदलाव चाहते हैं?

बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में अखिलेश कहते हैं, "आरक्षण की बात करने पर कुछ लोगों को लगता है कि आरक्षण के चलते टैलेंटेड लोगों को जगह नहीं मिल रही है, कुछ काफ़ी नाराज भी रहते हैं, जबकि हमारा मानना है कि आरक्षण व्यवस्था के तहत दलितों-पिछड़ों को 50 फ़ीसदी से कम पर सीमित रखा जा रहा है."

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आरक्षण का अखिलेश फ़ॉर्मूला

मौजूदा समय में आरक्षण के तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में नामांकन के दौरान अति पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जाति को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7 फ़ीसदी का आरक्षण मिलता है.

अखिलेश यादव इसकी जगह नए फ़ॉर्मूले की बात करते हुए कहते हैं, उनका कहना है, "बैकवर्ड-फॉरवर्ड का झगड़ा खत्म हो जाएगा. हर समुदाय के लोगों को गिन लिया जाए और आबादी के हिसाब से उनका हक दे देना चाहिए. जिसकी जितनी आबादी है, उस हिसाब से सबको आरक्षण दे देना चाहिए."

आरक्षण की वजह से टैलेंटेड लोगों को मौका नहीं मिल पाता है, इस मान्यता के बारे में अखिलेश कहते हैं, "हमारा तो फ़ॉर्मूला यही है कि टैलेंटेड लोगों के लिए 20 फीसदी सीटों को अलग कर लो. इसमें जो मेरिट लिस्ट टॉपर हो चाहे जिस भी जाति का हो, उसे टैलेंटेड लोगों के पूल में रख लो."

"हालांकि अपने यहां इतने टैलेंटेड लोग हैं ही नहीं कि 20 फीसदी सीट भरेंगी नहीं तो 10-15 फीसदी का रख सकते हैं. जो टैलैंटेड हैं, वो इस पूल के ज़रिए सामने आएं."

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जातिगत आधार पर जनगणना

समाजवादी पार्टी के मुखिया की राय ये भी है कि इस देश के टैलेंटेड लोग भारत में टिकते भी नहीं हैं, वो विदेश चले जाते हैं, आईआईटी और आईआईएम से निकलने वाले ज्यादातर लोग काम करने विदेश चले जाते हैं.

अखिलेश के मुताबिक इसके बाद बाकी के 80-90 फ़ीसदी सीटों के लिए आबादी के हिसाब से हक मिलना चाहिए. उनका दावा है कि इस फ़ॉर्मूले से शायद ही किसी समुदाय को कोई दिक्कत होगी.

हालांकि भारत में अब तक जातिगत आधार पर कोई जनगणना नहीं हुई है. ऐसे में आबादी के हिसाब से हक़ देने की राह में यह सबसे बड़ी व्यावहारिक अड़चन है. लेकिन अखिलेश यादव इसे बड़ी समस्या नहीं मानते हैं.

वे कहते हैं, "आपने आधार से सारे लोगों को लिंक कैसे कर दिया है, आज तकनीक की ऐसी व्यवस्था हो गई है कि आप चाहें तो मोबाइल फोन से लोगों की जाति के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं. तमाम तरह की तकनीक है, ये कोई बड़ा मसला है ही नहीं."

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आरक्षण का मुद्दे

अखिलेश यादव ये भी कहते हैं कि असली लड़ाई इसी मुद्दे पर है, भारतीय जनता पार्टी लोगों को बरगलाने के लिए अति पिछड़े और अति दलित की बात कर रही है, हमारे समाज को और भी बांट रही है, लेकिन समाजवादियों की सरकार आने पर इस फार्मूला को लागू करने की बात कर रहे हैं.

अखिलेश कहते हैं, "शायद अत्याधुनिक तकनीक और लोगों की जागरूकता, आने वाली सरकारों को बाध्य कर देगी, आने वाले दिनों में लोगों को आबादी के हिसाब से हक देना ही होगा."

वैसे अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के दौरान एससी और एसटी को मिलने वाले आरक्षण को खत्म कर दिया था. इसके अलावा उन्होंने पिछड़े वर्ग के लिए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की ओर से लागू किए गए त्रिस्तरीय आरक्षण की व्यवस्था को भी वापस ले लिया था.

लेकिन बीबीसी हिंदी से उन्होंने कहा, "मैं किसी बात पर हिचकता नहीं हूं. मैं चाहता था लोग बैकवर्ड को बैकवर्ड नहीं कहें, ये सुनने में अच्छा कहां लगता है. मैं बैकवर्ड-फॉरवर्ड की खाई को खत्म करना चाहता था."

"एक सच ये भी है कि मैं खुद को फॉरवर्ड समझ रहा था. क्योंकि मेरे पास विकास का विज़न है और मैंने एक्सप्रेसवे, 18 लाख लेपटॉप वितरण, मेट्रो जैसी परियोजनाओं को लागू किया. दूसरी तरफ, जो लोग खुद को फॉरवर्ड कहते हैं, वो समाज को जाति और धर्म के नाम पर बरगलाने में लगे हुए हैं. इतना ही नहीं, बीजेपी ने मुझे एहसास करा दिया कि मैं बैकवर्ड हूं. मैं समझ गया, उनका इसके लिए शुक्रिया."

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