आधार ने इन ग़रीबों की ज़िंदगी की नींव हिला दी

  • 29 मार्च 2018
आधार इमेज कॉपीरइट Ronny Sen
Image caption जमा सिंह के पास आधार कार्ड है लेकिन वह उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि उसमें उनकी उम्र 102 साल दर्ज की गई है.

मुनिया देवी कहती हैं कि महीने में 6-7 दिन ऐसे होते हैं, जब पांच लोगों वाले उनके परिवार को खाना नसीब नहीं होता.

31 वर्ष की ये कमज़ोर सी महिला अपने बच्चों के साथ झारखंड के एक सूखे इलाक़े के गांव में रहती है. झारखंड भारत के सबसे ग़रीब सूबों में से एक है. मुनिया के पति भूषण, गांव से क़रीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक ईंट भट्ठे में 130 रुपए की दिहाड़ी पर काम करते हैं.

पिछले तीन साल से मुनिया और भूषण के परिवार को सरकार की तरफ़ से सब्सिडी वाला अनाज नहीं दिया जा रहा. ये अनाज उन्हें भारत की विशाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलता था, जो ऐसे ग़रीबों के लिए लाइफ़ लाइन जैसा है.

ऐसा इसलिए नहीं हो रहा कि सरकार ने इलाक़े की राशन की दुकान को सप्लाई बंद कर दी है. बल्कि इसलिए हो रहा है क्योंकि उनके राशन कार्ड 12 अंकों वाले बायोमीट्रिक पहचान नंबर से नहीं जुड़े हैं.

क्या आधार से चुराई जा सकती हैं निजी जानकारियां?

आज की तारीख़ में एक अरब से ज़्यादा भारतीयों के पास एक ख़ास नंबर है. इसे आधार कहा जाता है. इसका मतलब होता है बुनियाद. आधार योजना एक स्वैच्छिक कार्यक्रम के तौर पर शुरू हुई थी.

इसका मक़सद ग़रीबों को दी जाने वाली मदद में हो रहे फ़र्ज़ीवाड़े को रोकना था. लेकिन अब आधार योजना दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी और विवादित डिजिटल पहचान कार्यक्रम बन चुका है. धीरे-धीरे करके तमाम तरह के वित्तीय लेन-देन और सामाजिक योजनाओं का फ़ायदा लेने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया गया है.

इमेज कॉपीरइट Ronny Sen

तीन महीने पहले, मुनिया देवी ने 35 किलोमीटर दूर स्थित एक क़स्बे में जाकर फॉर्म और ज़रूरी दस्तावेज़ जमा कराए थे, ताकि उसके परिवार के राशन कार्ड को आधार से जोड़ा जा सके. उस सरकारी दफ़्तर के लोगों ने इसके लिए रिश्वत मांगी, तो मुनिया देवी ने उन्हें अपने काम के लिए 400 रुपए रिश्वत भी दी. ये उसके परिवार की चार दिन की कमाई के बराबर रक़म थी.

मुनिया ने मुझे बताया, 'वो कहते हैं कि नेटवर्क नहीं है. कंप्यूटर काम नहीं कर रहा है और हम अपने परिवार का पेट भरने के लिए अनाज उधार पर उधार ले रहे हैं'.

जिस विशुनबांध गांव में मुनिया रहती है, उसके 282 परिवारों में से ज़्यादातर के पास ज़मीन नहीं है. अच्छे दिनों में उन्हें जो बेहतर खाना मिलता है, वो होता है चावल और आलू और सेम की सब्ज़ी. बुरे दिनों में खाने के लाले रहते हैं.

इस मुश्किल में मुनिया देवी के कई साथी हैं. गांव के 350 सरकारी सब्सिडी पाने वाले लाभार्थियों में से 60 का राशन अधिकारियों ने बंद कर दिया है. वजह वही है. इन सभी के राशन कार्ड तय मियाद में आधार से नहीं जुड़े थे. इनमें से ज़्यादातर की कहानी एक जैसी है. वो बताते हैं कि किस तरह उनका सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटना बार-बार बेमानी साबित होता है.

रिश्वत देने पर भी काम नहीं होता. सरकार ने राशन कार्ड को आधार से जोड़ना कई साल पहले अनिवार्य किया था. अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ इसे ग़रीब विरोधी और ज़बरदस्ती वाला क़दम कहते हैं.

इमेज कॉपीरइट Ronny Sen

भुखमरी से मौत

पिछले साल सितंबर में जब झारखंड में 11 बरस की लड़की की भूख से मौत की ख़बर आई, तो आधार को राशन कार्ड से जोड़ने की अनिवार्यता पर बहस तेज़ हो गई थी. ये घटना सिमडेगा ज़िले में हुई थी. उस लड़की के परिवार के लोग तय वक़्त पर राशन कार्ड को आधार से जुड़वाने में नाकाम रहे थे. नतीजा ये हुआ कि परिवार को सस्ता सरकारी अनाज मिलना बंद हो गया था.

उस लड़की का नाम संतोषी कुमारी था. संतोषी की पढ़ाई छूट चुकी थी. उसे चार दिनों से खाना नसीब नहीं हुआ था. जिस दिन संतोषी की मौत हुई, उस दिन उसने नमक और चाय ली थी. इसके कुछ ही घंटों के बाद उसकी मौत हो गई थी. एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने मुझे बताया कि संतोष की मौत भूख से ही हुई, इस बात की तस्दीक़ नहीं की जा सकती.

'काश, यह आधार इतना ज़रूरी नहीं होता'

'आधार लिंक करने के गंभीर परिणामों को पहचाने सरकार'

डॉक्टर ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि राज्य में भुखमरी से ऐसे ही कम से कम आधा दर्जन लोगों की मौत हुई है. द्रेज़ कहते हैं कि हम इस बात पर बहस कर सकते हैं कि उनकी मौत भुखमरी से हुई या नहीं. लेकिन एक बात तो तय है कि इन सभी मामलों में घरों में कई दिनों से अनाज नहीं था, और इसकी वजह आधार से जुड़ी दिक़्क़तें थीं.

बात यही नहीं है. पिछले साल मार्च में झारखंड ने क़रीब 7 लाख 60 हज़ार फ़र्ज़ी राशन कार्ड रद्द कर दिए थे. डॉक्टर द्रेज़ मानते हैं कि इनमें से ज़्यादातर को इसलिए रद्द किया गया क्योंकि ये आधार से नहीं जुड़े थे. नतीजा ये हुआ कि हज़ारों लोगों को सस्ता अनाज मिलना बंद हो गया. एक सरकारी अधिकारी ने मुझे बताया कि इस बात की जांच चल रही है कि आख़िर ये राशन कार्ड क्यों रद्द किए गए.

इमेज कॉपीरइट Ronny Sen
Image caption रइलो देवी बीते एक साल से अपनी पेंशन नहीं हासिल कर पा रही हैं.

कानूनन, राशन की दुकानें किसी को इस बिनाह पर राशन देने से मना नहीं कर सकतीं कि उनका राशन कार्ड आधार से नहीं जुड़ा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है कि बहुत से लोगों को राशन की दुकानों से इसी वजह से लौटाया जा रहा है. झारखंड में 25 हज़ार से ज़्यादा सरकारी राशन की दुकानें हैं.

झारखंड में खाद्य आपूर्ति के सबसे सीनियर अधिकारी अमिताभ कौशल कहते हैं कि, 'हां, मैं मानता हूं कि हमारे संवाद में कुछ कमियां रह गई हैं. हम लोगों तक ये संदेश नहीं पहुंचा सके हैं कि आधार न होने का मतलब ये नहीं है कि उन्हें सब्सिडी वाला अनाज दिया ही न जाए. हमें इसे ठीक करना होगा'.

'सरकार ही बताए आधार कहां ज़रूरी, कहां नहीं'

आधार-राशन कार्ड नहीं जुड़े और बच्ची 'भूख' से मर गई

बहुत ही कम हैं ऐसे मामले

लेकिन, आधार के विरोधी कहते हैं कि सरकार दोहरी ज़बान बोल रही है.

डॉक्टर ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि उनके पास इस बात का वीडियो है जिसमें हाल ही में एक सरकारी अधिकारी गांव के लोगों को ये कहते हुए दिख रहा है कि, 'जिन लोगों के पास आधार नहीं है, उन्हें राशन कार्ड नहीं मिलेगा'. साफ़ है कि इन्हीं वजहों से लोगों को सरकारी अनाज से महरूम रहना पड़ रहा है.

अमिताभ कौशल कहते हैं कि ऐसे लोगों की तादाद बहुत कम है जिन्हें सब्सिडी वाला अनाज नहीं मिल पा रहा है. वो दावा करते हैं कि उन्होंने जो मामले देखे हैं, वो इक्का-दुक्का ही हैं.

कौशल कहते हैं कि राज्य में सस्ते सरकारी अनाज का फ़ायदा पाने वाले दो करोड़ साठ लाख से ज़्यादा लोगों में से 80 फ़ीसदी के राशन कार्ड आधार से जुड़ चुके हैं.

वहीं, 99 फ़ीसद लोगों को आधार नंबर मिल चुका है. इसका मतलब ये है कि हर परिवार से कम से कम एक सदस्य ऐसा है, जो सस्ती दरों पर मिलने वाला अनाज हासिल कर सकता है.

इमेज कॉपीरइट Ronny Sen
Image caption बीते साल अक्तूबर महीने में राजकुमारी देवी की पेंशन बंद हो गई क्योंकि उन्होंने अपना राशन कार्ड आधार से नहीं जुड़वाया था.

अमिताभ कौशल इस बात से भी इनकार करते हैं कि राशन की दुकानों से लोगों को इसलिए लौटाया जा रहा है क्योंकि उनके फिंगर प्रिंट मशीनें नहीं पढ़ पा रही हैं.

कई बार ऐसी मशीनें इसलिए काम नहीं करतीं क्योंकि इंटरनेट की रफ़्तार कम होती है या वो काम ही नहीं करता. कई बार बिजली चली जाने से भी मशीनें फिंगरप्रिंट लेने का काम नहीं कर पातीं.

कौशल कहते हैं कि सिर्फ़ जनवरी में ही सरकारी अनाज बांटने के 47 लाख मामलों में से 8 लाख का वितरण ऑफ़लाइन हुआ था. यानी इन लोगों को अनाज आधार की दिक़्क़तो के बावजूद दिया गया था.

डॉक्टर ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर आधार का राशन कार्ड से जुड़ना चौंकाने वाली बात नहीं है. क्योंकि सरकार ने तो पहले ही आधार से राशन कार्ड न जुड़े होने पर बड़ी संख्या में राशन कार्ड कैंसिल कर दिए थे.

झारखंड के बहुत से पेंशनरों की यही मुसीबत है. झारखंड में क़रीब 12 लाख बुज़ुर्ग, विधवाएं और विकलांग लोग हैं जो 600-800 रुपए की पेंशन के अधिकारी हैं.

पिछले साल सरकार ने पेंशन के खातों को आधार से जोड़ना अनिवार्य कर दिया. इसके बाद तीन लाख फ़र्ज़ी पेंशनधारकों के नाम लाभार्थियों की सूची से काट दिए गए.

स्वतंत्र रिसर्चरों ऋषभ मल्होत्रा और अनमोल सोमानची ने पाया कि जिन पेंशन खातों को हटाया गया, उनमें से फ़र्ज़ी खातों की तादाद बहुत कम थी.

वो कहते हैं कि फ़र्ज़ी खाते बंद करने के चक्कर में कई ऐसे लोगों के नाम भी काट दिए गए, जो पेंशन के असल हक़दार थे. जानकार कहते हैं कि ये ग़लती डेटा ऑपरेटरों की है, जिन्होंने ग़लत जानकारी सिस्टम में डाली. किसी की उम्र में गड़बड़ी, तो किसी के नाम में हेर-फेर पाया गया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ऐसी ग़लतियों के नतीजे बहुत घातक रहे हैं. जन्म प्रमाणपत्र न होने की वजह से या डेटा ऑपरेटरों की ग़लती से कई गांवों के पूरे के पूरे लोगों की जन्मतिथि अलग-अलग वर्षों की पहली जनवरी लिख दी गई.

सड़वाडीह गांव के रहने वाले उम्रदराज़ किसान जामा सिंह को वृद्धावस्था पेंशन इसलिए नहीं मिल पा रही है, क्योंकि आधार में उनकी उम्र 102 साल दर्ज कर दी गई है. बैंक कर्मचारी कहते हैं कि उनके सॉफ्टवेयर में तीन अंकों वाली उम्र दर्ज़ करने की व्यवस्था ही नहीं है. जामा सिंह के पड़ोसी पचाथी सिंह ने बताया कि अब अधिकारी जामा सिंह को सलाह दे रहे हैं कि वो अपनी उम्र 80 बरस घोषित करें और नए आधार कार्ड के लिए अर्ज़ी दें.

जामा सिंह ने मुझे बताया, 'मुझे नहीं पता कि मेरी उम्र क्या है. लेकिन मुझसे छोटे लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है. क्या ये सही है'.

मुनिया देवी के गांव विशुनबांधसे क़रीब 175 किलोमीटर दूर स्थित खूंटी ज़िले में क़रीब 20 हज़ार पेंशनरों के नाम हटा दिए गए हैं. इनमें से ज़्यादातर महिलाएं हैं. इनके नाम इसलिए हटाए गए, क्योंकि उनके आधार सही तरीक़े से बैंक खातों से नहीं जोड़े गए थे. मसलन, राजकुमारी देवी नाम की एक महिला की पेंशन पिछले साल अक्तूबर में इसलिए रोक दी गई, क्योंकि उनका बैंक खाता आधार नंबर से नहीं जुड़ा था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इसके बाद 84 बरस की हो चुकीं राजकुमारी देवी को अपनी एक महीने की पेंशन के बराबर रक़म पास के क़स्बे में स्थित बैंक में जाकर ये कमी दूर कराने में ख़र्च करनी पड़ गई. फिर भी पेंशन नहीं आई.

राजकुमारी बताती हैं कि उनके खाते में पैसे नहीं आ रहे हैं. अब राजकुमारी के पास बचत के नाम पर महज़ 73 रुपए बचे हैं. अब सवाल उनकी इज़्ज़त का हो गया है.

जब राजकुमारी का बेटा ये कहता है कि वो उनकी देखभाल करता रहेगा तो राजकुमारी उसे फटकारती हुए कहती हैं, 'मेरा पैसा मेरा है. मैं तुम्हारी मेहरबानी पर क्यों जियूं'.

कैसे रुकेगी आपके आधार डेटा की चोरी?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे