उत्तरप्रदेश: इस नेता ने अमित शाह का भी चैन उड़ा रखा है

उत्तर प्रदेश की राजनीति

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की आदित्यनाथ योगी सरकार को विधान सभा में दो तिहाई से भी ज़्यादा बहुमत हासिल है और उसे छोटे-मोटे राजनीतिक दलों के दो-चार विधायकों के अलग होने या साथ छोड़ने से कोई फ़र्क भी नहीं पड़ने वाला है.

बावजूद इसके सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर की वजह से सरकार और पार्टी आलाकमान तनाव में दिख जाते हैं.

ताज़ातरीन मामला ओमप्रकाश राजभर के एक बयान से आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर उनकी कुछ मांगों को नहीं माना गया तो वो सरकार से समर्थन वापस भी ले सकते हैं.

राजभर ने इसके लिए छह महीने की समय-सीमा भी तय कर दी है.

इससे पहले, ऐन राज्यसभा चुनाव के वक़्त भी राजभर की नाराज़गी खुलकर सामने आई थी, राज्य सरकार को उन्होंने दस में से तीन नंबर दिए थे और उनकी नाराज़गी और उसकी अहमियत को देखते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राजभर को दिल्ली बुलाया था.

कैबिनेट मंत्री का ये हाल

उस समय तो राजभर मान गाए थे लेकिन हफ़्ता भी नहीं बीता और राज्य सरकार पर फिर हमलावर हो गए.

बीबीसी से बातचीत में राजभर बताते हैं, "आगामी 10 अप्रैल को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के यूपी दौरे के दौरान हम सार्वजनिक तौर पर अपना पक्ष रखेंगे. उसके बाद हमारी पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर अपना अंतिम फैसला लेगी. राज्य सरकार से हमारी जो नाराज़गी शुरू से थी वो अभी भी बनी हुई है. हमारी और हमारे पार्टी के नेताओं की बात छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक नहीं सुनते हैं. जब कैबिनेट मंत्री का ये हाल है तो आम जनता का हाल आप समझ सकते हैं."

एक दिन पहले हुए अपनी पार्टी के सम्मेलन में ओम प्रकाश राजभर ने योगी सरकार को चेतावनी दी कि अगर सरकार छह महीने में पिछड़ों को मिलने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन हिस्सों में विभाजित कर भर्तियों की शुरुआत नहीं करती, तो वह भाजपा को आगे समर्थन देने पर दोबारा विचार करने को मजबूर होंगे.

उन्होंने महिलाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण दिए जाने की भी मांग उठाई.

...और भी शिकायतें

राजभर को ये भी शिकायत है कि सरकार को समर्थन देने और ख़ुद कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद उन्हें सरकार में अपना नहीं समझा जाता है.

वो कहते हैं कि पिछले दिनों अमित शाह से मुलाकात के बाद पहली बार राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्हें मंच पर जगह दी गई.

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जानकारों का कहना है कि ओम प्रकाश राजभर के पास भले ही चार विधायक हों लेकिन वो जिस समुदाय का नेतृत्व कर रहे हैं, पूर्वांचल में उसकी अच्छी-ख़ासी राजनीतिक अहमियत है.

2017 के विधान सभा चुनाव के दौरान पटेल, राजभर, निषाद इन्हीं सब जातियों के नेताओं को एकजुट करके भाजपा ने इतनी बड़ी जीत हासिल की थी.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "ओम प्रकाश राजभर की अधिकारियों को लेकर जो शिकायत है, वो शिकायत तो बीजेपी के भी कई मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की है. लेकिन समस्या ये है कि केंद्रीय नेतृत्व के डर के मारे कोई आवाज़ नहीं उठा पा रहा है. राजभर को ऐसा कोई डर नहीं है. वो किसी भी दल के साथ गठबंधन कर लेंगे तो जो आज उनकी राजनीतिक हैसियत है, वो तब भी कम नहीं होगी. लोकसभा चुनाव नज़दीक देखकर ही उन्होंने सरकार के विरोध का स्वर तेज़ कर दिया है और ज़ाहिर है, इसीलिए बीजेपी भी उन्हें मनाने में लगी है."

'खेल बिगाड़ने वालों' की भूमिका

दरअसल, राजभर समुदाय पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, ग़ाज़ीपुर, देवरिया, मऊ, आंबेडकर नगर जैसे ज़िलों में काफी प्रभावी हैं और निषाद समुदाय की तरह कई सीटों पर ये जीत-हार तय करते हैं.

हालांकि राजभर समुदाय के और भी कई नेता हैं लेकिन ओम प्रकाश राजभर ने अलग पार्टी बनाकर इन्हें एकजुट करने और फिर बीजेपी से गठबंधन करके चार विधायकों को जिताकर अपनी राजनीतिक हैसियत भी दिखाई है.

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1981 में कांशीराम के साथ राजनीति की शुरुआत करने वाले ओम प्रकाश राजभर ने 2001 में बीएसपी नेता मायावती से विवाद के बाद पार्टी छोड़ कर नई पार्टी बनाई. उनकी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी 2004 से यूपी और बिहार में कई जगह चुनाव लड़ रही है लेकिन 2017 से पहले उसके उम्मीदवारों की भूमिका 'खेल बिगाड़ने वालों' के तौर पर ही रही, जीतने वालों के रूप में नहीं.

जानकारों के मुताबिक 2017 में विधान सभा में बीजेपी की प्रचंड जीत के पीछे, ख़ासकर पूर्वांचल में, इस समुदाय और इस पार्टी की अहम भूमिका थी.

यही नहीं, गोरखपुर उपचुनाव हारने के बाद ओम प्रकाश राजभर ने साफ़तौर पर कहा था कि उनकी अनदेखी की वजह से बीजेपी गोरखपुर की सीट हारी है. जानकारों का कहना है कि राजभर की इस स्वीकारोक्ति में पर्याप्त सच्चाई है.

इसी को देखते हुए बीजेपी आलाकमान ओम प्रकाश राजभर को नाखुश नहीं करना चाहता, वहीं विरोधी दल महागठबंधन बनने की स्थिति में राजभर समुदाय और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को अपने खेमे में करने को आतुर हैं.

इसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि ओम प्रकाश राजभर के 'दोनों हाथों में लड्डू' हैं लेकिन राजभर की परेशानी ये है कि कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद 'यूपी के अधिकारी उन्हें मंत्री नहीं समझते.'

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