क्यों उठ रहा है अलग कोल्हान देश का मुद्दा?

  • 30 मार्च 2018
कोल्हान विश्वविद्यालय इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash

तारीख थी 30 मार्च, साल 1980. दिन रविवार. सुबह होते ही चाईबासा की सड़कों पर आदिवासी जुटने लगे. जैसे-जैसे दिन चढ़ा, इनकी संख्या बढ़ती चली गयी. दोपहर तक मंगलाहाट में हजारों लोग जमा हो चुके थे.

झारखंड के हो (लकड़ा-कोल) आदिवासियों का ये जमावड़ा यहां आयोजित रैली के लिए था. इसी रैली में पहली बार अलग कोल्हान देश की मांग की गई.

इस भीड़ का नेतृत्व कोल्हान रक्षा संघ के नेता नारायण जोनको, क्राइस्ट आनंद टोपनो और कृष्ण चंद्र हेंब्रम (के सी हेंब्रम) कर रहे थे. इन लोगों ने 1837 के विल्किंसन रूल का हवाला देते हुए कहा कि कोल्हान इलाके पर भारत का कोई अधिकार नहीं बनता है. तब उन्होंने ब्रिटेन की सत्ता के प्रति अपनी आस्था जताई.

कोल्हान तब अविभाजित बिहार राज्य का एक प्रमंडल था. पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम जिले इसके अधीन थे. अब ये इलाका झारखंड में है.

सिंहभूम के दोनों हिस्सों के साथ इसी से काट कर बनाया गया सरायकेला खरसावां जिला भी इसकी परिधि में है. चाईबासा पश्चिमी सिंहभूम जिले का मुख्यालय है.

क्या लड़कियों के भरोसे मोर्चा संभाल रहे हैं नक्सली?

तीर-धनुष के साथ ‘स्वशासन’ मांगते आदिवासी

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash
Image caption कृष्ण चंद्र हेंब्रम

क्या है विल्किंसन रूल?

ब्रिटिश शासनकाल में सर थामस विल्किंसन साउथ वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी (एसडब्लूएफए) के प्रमुख थे. उन्होंने सैन्य हस्तक्षेप कर कोल विद्रोह को दबाया और कोल्हान इलाके के 620 गांवों के मुंडाओं (प्रधान) को ब्रिटिश सेना के समक्ष आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया.

तब इन मुंडाओं के नेतृत्व में कोल विद्रोह अपने उफान पर था. सर विल्किंसन ने साल 1837 में 'कोल्हान सेपरेट एस्टेट' की घोषणा कर चाईबासा को उसका मुख्यालय बना दिया.

तब लोगों को अपने पक्ष में करने के उद्देश्य से उन्होंने इस इलाके में पहले से चली आ रही मुंडा-मानकी स्वशासन की व्यवस्था लागू कर दी. इसे 'विल्किंसन रुल' कहा जाता है.

इसके तहत सिविल मामलों के निष्पादन का अधिकार मुंडाओं को मिल गया जबकि आपराधिक मामलों के निष्पादन के लिए मानकी को अधिकृत कर दिया गया.

लालू यादव को चारा घोटाले के चौथे मामले में 14 साल की क़ैद

कैंसर पीड़ित बंसती ज़रूरतमंदों के लिए जी रहीं जिंदगी

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash

क्यों प्रभावी है विल्किंसन रूल?

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर बताते हैं कि देसी रियासतों के भारत में विलय के वक्त कोल्हान इलाके में कोई रियासत प्रभावी नहीं थी. ये इलाका मुगलों के वक्त से ही पोड़ाहाट के राजा की रियासत थी. लेकिन, कोल्हान एस्टेट बनने के बाद सारे अधिकार मुंडाओं के हाथों में आ गए थे.

लिहाजा, पोड़ाहाट के राजा अस्तित्व में ही नहीं थे. इस वजह से कोल्हान इलाके के भारतीय संघ में विलय का कोई मजबूत दस्तावेज नहीं बन सका.

इस कारण भारत की आज़ादी के बाद भी यहां विल्किंसन रूल प्रभावी बना रहा. इसी को आधार बनाकर गाहे-बगाहे अलग कोल्हान देश की मांग की जाती रही है.

आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासियों को नेतृत्व क्यों नहीं देती पार्टियां?

दलितों और आदिवासियों को सुरक्षा चाहिए या ब्राह्मण को?

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash
Image caption रामो बरुआ की फाइल फोटो

अभी क्यों उठा है मामला?

पश्चिमी सिंहभूम के मंझारी निवासी रामो बिरुवा ने पिछले दिनों खुद को 'कोल्हान गर्वनमेंट इस्टेट' का 'खेवटदार (मालिक) नंबर-1' घोषित कर दिया और खूंटपानी प्रखंड के बिंदीबासा में अपना झंडा फहराने की घोषणा कर दी.

उन्होंने ब्रिटेन की महारानी से साल 1995 में हुए अपने पत्राचार का हवाला देते हुए दावा किया कि वो इस इलाके के खेवटदार नंबर-1, अर्थात प्रशासक हैं. लिहाजा, उन्हें झंडा फहराने का अधिकार प्राप्त है.

इसके बाद चाईबासा पुलिस ने रामो बिरुवा समेत 45 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस के भारी बंदोबस्त के कारण रामो बिरुवा बिंदीबासा में झंडा नहीं फहरा सके लेकिन कुछ लोगों ने उसी दिन जमशेदपुर के पास अपना झंडा फहरा दिया.

इसे लेकर जमशेदपुर के बागबेड़ा थाने में भी राजद्रोह का एक मुकदमा दर्ज कराया गया है.

83 साल के रामो बिरुवा तबसे फरार हैं. वो बिहार सरकार में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर रहे हैं.

बीजेपी को त्रिपुरा जिताने वाली 'अलगाववादी' आईपीएफ़टी

किसान आंदोलन: चलते-चलते पत्थर हुए पैर

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash

संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची थी मांग

कोल्हान आंदोलन पर किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा ने बीबीसी को बताया कि साल 1981 में कोल्हान रक्षा संघ से जुड़े नारायण जोनको, आनंद टोपनो और अश्विनी सवैयां इस मामले को लेकर लंदन और जिनेवा भी गए थे.

लंदन में इन लोगों ने राष्ट्रमंडल के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को अपने तर्कों से संबंधित दस्तावेज सौंपा और विल्किंसन रूल के तहत कोल्हान को अलग देश का दर्जा देने की मांग की.

तब इन लोगों ने राष्ट्रमंडल देशों के प्रतिनिधियों से 2 दिसंबर 1981 को चाईबासा पहुंचने की अपील की ताकि वे कोल्हान देश की विधिवत घोषणा कर सकें.

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash

इसकी खबर मिलते ही तत्कालीन भारत सरकार सक्रिय हुई और लंदन से वापस लौटते ही नवंबर 1981 में आनंद टोपनो और अश्विनी सवैयां को गिरफ्तार कर चाईबासा जेल में डाल दिया. पुलिस तब नारायण जोनको और के सी हेंब्रम को गिरफ्तार नहीं कर पायी. इन सबके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया गया.

अनुज सिन्हा बताते हैं, "30 जुलाई 1984 को भारत की तत्कालीन गृह राज्यमंत्री रामदुलारी सिन्हा ने लोकसभा में स्वीकार किया कि बिहार के चाईबासा इलाके में कोल्हानिस्तान नाम से एक अलगाववादी आंदोलन को हवा दी जा रही है."

बीमार बच्चे को लेकर मीलों चली मां, गोद में दम तोड़ा

'सरकार के मुताबिक मेरे दादा आदिवासी हैं पर मैं नहीं'

इमेज कॉपीरइट Ravi Prakash

अनुज सिन्हा कहते हैं, "इसके बाद कई गोलीकांड हुए और कोल्हान रक्षा संघ और भारत सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच परस्पर पर्चेबाजी भी हुई. तब नारायण जोनको ने कोल्हान विश्विद्यालय की संबद्धता आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से भी कराने की बात प्रचारित की. लेकिन, बाद के दिनों में यह आंदोलन कुंद पड़ गया."

"इसके बाद कभी-कभार अचानक से कोई नेता इस मामले को उठाता है और कोल्हान देश की चर्चा होने लगती है. रामो बिरुवा का मामला इसी का उदाहरण है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे