ब्लॉग: मोदी को दक्षिण चाहिए, दक्षिण को भाजपा चाहिए कि नहीं चाहिए?

  • 28 मार्च 2018
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दक्कन फ़तह करने का ख्वाब बादशाह और सुल्तान देखते रहे, उतर भारत के चक्रवर्ती सम्राटों ने भी सदियों ये सपने देखे, लेकिन सपना शायद ही कभी पूरा हुआ.

2014 के चुनाव में अकेले 282 सीटें जीतकर अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली बीजेपी की निगाहें दक्षिण भारत पर टिकी हैं, 2019 के आम चुनाव में दक्षिण के रुख़ पर बीजेपी का भविष्य काफ़ी हद तक टिका है.

बीजेपी देश के अन्य हिस्सों में अपने चरम पर पहुँच चुकी है यानी यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या गुजरात जैसे किसी राज्य में उसकी लोकसभा सीटें बढ़ने के कोई कारण नहीं दिखता, यह बात पार्टी अच्छी तरह समझती है इसलिए 2019 के लिए पूरा ध्यान दक्षिण भारत के राज्यों पर लगा रही है.

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कुल मिलाकर 130 लोकसभा सीटें हैं. परंपरागत रूप से बीजेपी दक्षिण भारत में कमज़ोर रही है, तमिलनाडु में 39 में से उसके पास सिर्फ़ एक लोकसभा सीट है जबकि केरल में आज तक पार्टी एक भी एमपी नहीं जिता पाई है.

हालाँकि पिछले कुछ सालों में बीजेपी का जनाधार कर्नाटक और आँध्र प्रदेश में बढ़ा है, कर्नाटक में उसके 28 में से 17 सांसद हैं. आंध्र प्रदेश में दो और तेलंगाना में पार्टी का एक सांसद है. यानी 130 में से सिर्फ़ 21 सीटें उसके पास हैं.

बात मुख़्तसर ये है कि बीजेपी के पास दक्षिण भारत में खोने के लिए बहुत कम और पाने के लिए बहुत कुछ है, उत्तर भारत में होने वाले नुक़सान की भरपाई दक्षिण से कर लेना बीजेपी का लक्ष्य है लेकिन ये राह आसान नहीं है.

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इन राज्यों की राजनीति के बारे में ये कहा जा सकता है कि यहाँ उत्तर भारत में चल रही बयार को देखकर नहीं, बल्कि अपने प्रदेश की राजनीति के हिसाब से लोग वोट डालते हैं और उत्तर भारतीय राजनीति को लेकर हमेशा उनके मन में एक ख़ास तरह का संशय रहा है.

हिंदू राष्ट्रवाद का जवाब उप-राष्ट्रवाद

दक्षिण भारत की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले पत्रकार इमरान कुरैशी कहते हैं कि "बीजेपी की हिंदू-हिंदी राष्ट्रवाद का मुक़ाबला दक्षिण भारत के द्रविड़ उप-राष्ट्रवाद से है जहाँ तमिल, कन्नड़, मलयाली या तेलुगु अस्मिता बहुत अहम है, उप-राष्ट्रवाद यानी सब-नेशनलिज़्म केंद्र में यही भावना है कि वे अपने राज्य में अपने तरीक़े से रहेंगे और फ़ैसले करेंगे, दिल्ली या उत्तर भारतीयों के दबदबे में आना उन्हें मंज़ूर नहीं है."

इसकी मिसालें दिखने लगी हैं. डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्तालिन ने पिछले हफ्ते कहा कि "केंद्र में सत्ताधारी एनडीए दक्षिण भारतीय राज्यों को नज़रअंदाज़ कर रही है इसलिए द्रविड़ नाडु पर सहमति बन सकती है."

द्रविड़ नाडु के मुद्दे पर काफ़ी हंगामा मचा, स्तालिन ने बाद में कहा कि उन्होंने दक्षिण भारतीय राज्यों का अलग संगठन बनाने का कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखा है लेकिन केंद्र सरकार के दक्षिणी राज्यों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैए को देखते हुए अगर ऐसा होता है तो इस पर सहमति बन सकती है.

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एनडीए की मज़बूत साझीदार रही, 15 सांसदों वाली तेलुगु देशम पार्टी ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य के दर्जे की माँग करते हुए गठबंधन छोड़ दिया और उसके मंत्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया.

दक्षिण भारत में ये चर्चा तेज़ हो रही है कि उत्तर भारत के नेता उनके साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं करते हैं, तेलुगु फ़िल्म ऐक्टर पवन कल्याण ने कुछ दिनों पहले ट्वीट करके कहा था कि राज्यों के बीच राजस्व का बँटवारा जिस तरह से होता है उससे दक्षिण भारतीय राज्य घाटे में रहते हैं.

कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने केंद्र और राज्य के बीच राजस्व के बँटवारे पर एक विस्तृत नोट लिखा, जिसे ट्वीट करते हुए उन्होंने लगभग सभी प्रमुख दक्षिण भारतीय नेताओं को टैग किया.

उन्होंने लिखा, "दक्षिण के राज्य अधिक टैक्स देते हैं लेकिन उन्हें बदले में कम मिलता है. राज्यों को उनकी आबादी के हिसाब से केंद्र सरकार पैसा देती है, हम कितने समय तक आबादी बढ़ाने वाले राज्यों को बढ़ावा देते रहेंगे?"

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सिद्धरमैया ने लिखा, "दक्षिण भारत के राज्य ऐतिहासिक तौर पर उत्तर भारत को सब्सिडाइज़ करते रहे हैं, मसलन, यूपी के लोग एक रुपया टैक्स देते हैं तो सरकार से उन्हें 1.80 रु. मिलता है, कर्नाटक के लोग एक रुपया टैक्स देते हैं तो उन्हें 47 पैसे वापस मिलते हैं."

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव कह चुके हैं कि राजस्व में हिस्सा देने के मामले में "केंद्र सरकार का रवैया खैरात देने जैसा है जबकि हम ढेर सारा राजस्व केंद्र सरकार को देते हैं". राव ने कहा कि अमित शाह ने 20 हज़ार करोड़ रुपए देने की बात ऐसे कही है मानो वे 'बादशाह' हों, राव ने अमित शाह से माफ़ी माँगने के लिए कहा.

ये मामला बड़ा होता दिख रहा है, अलग द्रविड़ नाडु तो नहीं बन रहा है लेकिन 10 अप्रैल को केरल में दक्षिण भारतीय राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक बैठक हो रही है जिसमें केंद्र से मिलने वाले राजस्व के सवाल पर एकजुट होकर मुद्दा उठाने पर चर्चा होगी.

एमके स्तालिन केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख चुके हैं कि 15वें वित्त आयोग के टर्म ऑफ़ रेफ़रेंस पर पुनर्विचार करें, वित्त आयोगों का मुख्य काम राज्यों के बीच राजस्व के बँटवारे की नीति तय करना है, मौजूदा टर्म ऑफ़ रेफ़रेंस के तहत राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में केंद्र से पैसा मिलता है.

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बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि ऐसे माहौल में दक्षिणी राज्यों का मित्र दिखना आसान काम नहीं होगा, यही वजह है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने वित्त आयोग के प्रमुख एनके सिंह से मुलाक़ात की है और एक बयान जारी करके 'चिंतित राज्यों' को आश्वस्त करने का प्रयास किया है.

सवाल भाषा-संस्कृति और पहचान का भी

दक्षिण भारत में, उत्तर के दबदबे को लेकर जनभावना हमेशा से रही है, ऊपर से मोदी सरकार के दौर में जिस तरह आरएसएस की पहल पर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के एजेंडे को आगे बढ़ाया गया है उस पर प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है.

तमिलनाडु में 'हिंदी थोपे जाने' का विरोध लंबे समय से होता रहा है लेकिन पिछले साल बंगलौर मेट्रो के स्टेशनों के नाम हिंदी में लिखने और एनाउंसमेंट हिंदी में करने को लेकर हंगामा हुआ था जिसके बाद से कन्नड़ स्वाभिमान की चर्चा लगातार चल रही है.

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कर्नाटक के गौरव और स्वाभिमान का मुद्दा राज्य के अलग झंडे तक जा पहुँचा है. राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की चिट्ठी फ़ेसबुक और ट्विटर पर शेयर की जा रही है, उसका शीर्षक ही है--'क्षेत्रीय पहचान और संघीय व्यवस्था--कुछ मुद्दे', इसमें उन्होंने कहा है कि "अपनी भाषा और संस्कृति के लिए खड़े होना भारत को कमज़ोर नहीं, मज़बूत करेगा."

जब बंगलौर में हिंदी का विरोध हुआ तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जनभावनाओं को समझते हुए चुप्पी साध ली थी, यानी हिंदू-हिंदी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का एजेंडा चलाना बीजेपी के लिए कारगर नहीं होगा.

बीबीसी तमिल सेवा के पूर्व संपादक तिरूमलै मणिवन्नन कहते हैं कि तमिलनाडु बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा, उसके लिए वहाँ ख़ुद जगह बनाना कठिन है और लोकसभा सीटें जीत पाना तो और भी मुश्किल. वे कहते हैं, "तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति, भाजपा-आरएसएस के ठीक विपरीत है, ज्यादातर तमिल भाजपा को ब्राह्मणवादी और सांस्कृतिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाली उत्तर भारतीय पार्टी के रूप में देखते हैं."

यह ग़ौर करने की बात है कि तमिलनाडु में कांग्रेस को सत्ता से बेदख़ल हुए पचास वर्ष हो चुके है, कांग्रेस या कोई दूसरी राष्ट्रीय पार्टी वहाँ जगह नहीं बना पाई है, तमिलनाडु पूरी तरह क्षेत्रीय दलों के कब्ज़े में है.

जलीकट्टू पर प्रतिबंध को लेकर तमिलनाडु में हुआ हंगामा यही दिखाता है कि तमिल जनता नहीं चाहती कि दिल्ली से उन पर कोई राज करे.

तमिलनाडु में बीजेपी की उम्मीद सीटें जीतने से अधिक इस बात पर टिकी हैं कि वहाँ की कौन-सी पार्टी या गुट कितनी सीटों के साथ उसे समर्थन देने को राज़ी होगा.

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केरल में जहाँ लोकसभा की 20 सीटें हैं, वहाँ लंबे समय से आरएसएस गाँव-गाँव में सक्रिय है, आरएसएस और सीपीएम के कार्यकर्ताओं के बीच लगातार हिंसा होती रहती है जिसमें अब तक दोनों तरफ़ से क़रीब 100 लोग मारे जा चुके हैं, लेकिन इस तनाव का कोई चुनावी फ़ायदा भाजपा को नहीं मिला है. पिछले चुनाव में बुजुर्ग नेता राजगोपाल ने बीजेपी का पहला विधायक बनने का गौरव हासिल किया.

हिंदुत्व की राजनीति का केरल में परवान चढ़ना सांस्कृतिक कारणों से भी मुश्किल है, केरल से आने वाले केजे अल्फ़ोंस ने मंत्री बनने के बाद कहा था कि बीफ़ कोई मुद्दा नहीं है, केरल में लोग हमेशा से बीफ़ खाते रहेंगे और आगे भी खाते रहेंगे, लोगों के खान-पान की आदतों का सम्मान करना चाहिए." आरएसएस भी कह चुका है कि केरल के उसके कार्यकर्ता अगर बीफ़ खाते हैं तो उसे कोई आपत्ति नहीं है.

बीजेपी की मौजूदा हिंदुत्व की राजनीति के दक्षिण में कामयाब होने के कारण नज़र नहीं आते, पार्टी इस बात को समझती है और ज़ाहिर है आने वाले समय में उसकी रणनीति में बदलाव दिखाई देंगे, वो कामयाब कितनी होगी, ये कहना अभी मुश्किल है.

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