हिंदू धर्म क्यों छोड़ रहा है ऊना का ये दलित परिवार?

अपनी गाय गौरा के बछड़े के साथ बालूभाई
Image caption अपनी गाय गौरा के बछड़े के साथ बालूभाई

अपने घर के गलियारे में एक कुर्सी पर बैठे 55 साल के बालूभाई सरवैया अपनी नज़रें सीधी रखते हुए घोषणा करते हैं-

''19 अप्रैल को हम हिंदू देवी देवताओं की सभी तस्वीरें और मूर्तियां गांव के पास बहने वाली रावल नदी में विसर्जित कर देंगे. इसके 10 दिन बाद हम ऊना के पास उसी जगह पर बौद्ध धर्म अपनाएंगे जहां हमारा अपमान किया गया, हमें मारा गया और परेड करवाई गई.''

बालूभाई सरवैया उन 6 दलितों में से एक हैं, जिन्हें जुलाई 2016 में गिर सोमनाथ ज़िले के ऊना इलाके में मारा-पीटा गया और फिर सड़क पर उनकी परेड करवाई गई थी. उस समय दलितों के साथ इस अत्याचार का वीडियो पूरे देश में वायरल हो गया था, इसके बाद आनंदीबेन पटेल, राहुल गांधी, मायावती समेत कई बड़े नेता ऊना पहुंचे थे.

इन दलितों पर कुछ कथित गौ-रक्षकों ने गौ-हत्या के आरोप लगाए थे जबकि इन दलितों का कहना था कि वे मृत गायों की चमड़ी निकालने का काम कर रहे थे.

बालूभाई सरवैया के बेटे वाश्रम सरवैया भी उन्हीं दलित यवकों में से एक हैं. उन्हें और उनके दो अन्य भाइयों को इस अत्याचार का सामना करना पड़ा था. उस घटना के बाद वाश्रम सरवैया पहली बार बीबीसी गुजराती की टीम के साथ उसी जगह पर गए जहां उनके साथ वह घटना घटित हुई थी. वाश्रम ने कहा कि ऊना जैसी ऐतिहासिक जगह जहां से पूरे देश में दलित संघर्ष की शुरुआत हुई वहां ऐसी घटना का होना दुर्भाग्यपूर्ण है.

ऊना की उस घटना के चारों पीड़ित अब भी 7 जुलाई 2016 के उस दिन को भूल नहीं पाए हैं.

बालूभाई और उनका परिवार ऊना तालुका के मोटा सम्धियाला गांव में स्थित दलित बस्ती में बनी एक छोटी सी झोपड़ी में रहता है.

उनके इस छोटे से घर में हिंदू देवी देवताओं की तस्वीरें आसानी से देखी जा सकती हैं. जबकि डॉ. बी आर आंबेडकर और भगवान बुद्ध की तस्वीरें और मूर्तियां हाल ही में उन्होंने अपने घरों में रखी हैं.

Image caption हंसाबेन बेचरभाई सरवैया

'आज भी लगता है डर'

अशोक सरवैया सभी पीड़ितों में सबसे युवा हैं, वे उस दिन को याद करते हुए बताते हैं, ''मैं आज भी उस दिन को याद करके डर जाता हूं, मुझे लगता है कि वे अभी आएंगे और हमें मारने-पीटने लगेंगे.''

ऊना की उस घटना के बाद से ही सभी पीड़ित बेरोजगार हैं, वे इतने कमजोर हो चुके हैं कि खेतों में मजदूरी करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते.

अशोक ने खेत में मजदूरी करने की कोशिश ज़रूर की लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. उनकी मां विमला सरवैया ने बीबीसी को बताया, ''उसे रात में बुरे-बुरे सपने आते हैं, आधी रात को वह जाग जाता है. आज भी मुझे उसे एक बच्चे की तरह देखना पड़ता है.''

वडगाम से विधायक बने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने जब गुजरात विधानसभा में ऊना के पीड़ितों को मुआवजा देने से जुड़ा सवाल उठाया तो राज्य सरकार ने उन्हें जवाब दिया कि ऊना के पीड़ितों को किसी भी तरह का मुआवजा देने की घोषणा सरकार ने नहीं की है.

साल 2016 में ऊना की उस घटना के बाद पूरे देश में दलितों का आंदोलन शुरू हो गया था, ऊना के पीड़ितों के समर्थन में जिग्नेश मेवाणी ने एक रैली की थी जिसके बाद वे एक जाने-माने नेता के रूप में स्थापित हो गए.

दलित कार्यकर्ता मार्टिन मैकवान का मानना है कि इस दलित आंदोलन के चलते ना सिर्फ देश के दलित बल्कि कई अन्य समुदाय भी जुड़ गए. वे कहते हैं, ''ऊना की घटना के बाद देश के भीतर मौजूदा वक्त में दलितों के बुरे हालात सभी के सामने उभर कर आ गए थे.''

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Image caption जिग्नेश मेवाणी

बौद्ध धर्म क्यों?

वाश्रम, रमेश और बेचर के पिता बालूभाई सरवैया कहते हैं कि उस घटना के बाद से ही उनका परिवार अपना धर्म बदलने के लिए तैयार हो गया था.

वाश्रम ने शुरू-शुरू में तो ज़्यादा बातचीत नहीं की लेकिन बाद में वह बौद्ध धर्म की तारीफें करने से खुद को नहीं रोक सके. उन्होंने कहा, ''बौद्ध एक वैश्विक धर्म है. ऊना की घटना के बाद पूरी दुनिया का ध्यान इस तरफ गया है और मुझे भरोसा है कि इससे लोगों को पता चला होगा कि हिंदू धर्म में कितनी बुराइयां हैं जबकि बौद्ध धर्म काफी बेहतर है.''

वाश्रम कहते हैं कि हिंदू धर्म में उन्हें आत्मसम्मान और इज्जत नहीं मिली.

वाश्रम और बालूभाई ने गांव के तमाम दलितों से बौद्ध धर्म अपनाने की अपील की है. बालूभाई कहते हैं कि 29 अप्रैल को बड़ी संख्या में दलित बौद्ध धर्म अपनाएंगे.

कट्टर हिंदू से बौद्ध बनने तक

बालूभाई की पत्नी कुंवरबेन को हाल ही में बौद्ध धर्म और आंबेडकर की विचारधारा के बारे में मालूम चला है. वे कहतीं हैं, ''अगर आंबेडकर एक दलित के रूप में जन्म ना लेते तो आज इस देश में दलितों की हालत सड़क पर रहने वाले कुत्तों जैसी होती.''

कुंवरबेन हिंदू धर्म की एक कट्टर समर्थक थीं. पिछले दस साल से वे देवी दसमा की आराधना के लिए लगातार 10 दिन का व्रत रखा करती थीं. इस बारे में बालूभाई बताते हैं कि उनकी पत्नी ने जीवनभर हिंदू देवी देवताओं की पूजा की. वह भगवान रामपीर की पूजा करती थीं साथ ही वे ऊना में होने वाले हिंदू धर्मगुरुओं के सत्संग में भी हिस्सा लेती थीं.

लेकिन अब कुंवरबेन के भीतर हिंदू धर्म के प्रति गुस्सा साफ तौर पर देखा जा सकता है. वे कहती हैं, ''हमने अपना जीवन भिखारियों की तरह गुजार दिया और अभी भी हम अपने जीने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, आखिर ऐसा धर्म मैं क्यों मानूं जिसमें हमें इंसान तक नहीं समझा जाता.''

अगर वाश्रम की बात करें तो ऊना की उस घटना से पहले की उनका झुकाव बौद्ध धर्म की तरफ था. उनके घर में भगवान बुद्ध और आंबेडकर की नई तस्वीरें और मूर्तियां देखने को मिल जाती हैं.

साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक गुजरात में कुल 30 हज़ार 483 बौद्ध थे. वहीं बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया के निदेशक डॉ. पीजी ज्योतिकर कहते हैं कि ऊना की घटना के बाद से ही राज्य भर के दलितों ने बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अपनाया है.

डॉ. ज्योतिकर गुजरात विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख भी रह चुके हैं, बौद्ध धर्म अपनाने वाले कुछ शुरुआती दलितों में वे भी शामिल थे, वे बताते हैं कि भीमराव आंबेडकर का अनुसरण करते हुए उन्होंने साल 1960 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

बीबीसी के साथ बातचीत में वे बताते हैं कि साल 2011 की जनगणना के बाद से अभी तक बौद्धों की संख्या दोगुनी हो चुकी है. वे बताते हैं कि इस समय राज्य में लगभग 70 हज़ार बौद्ध हैं.

बौद्धों की संख्या में हो रही इस वृद्धि के पीछे क्या कारण है, इस पर डॉ. ज्योतिकर बताते हैं, ''धर्म परिवर्तन करने का सबसे बड़ा कारण है आत्म सम्मान. जैसे-जैसे दलित युवा पढ़ लिख रहे हैं और उन्हें यह महसूस हो रहा है कि हिंदू धर्म में उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया जाता, वे हिंदू धर्म छोड़ने का फैसला कर रहे हैं.''

डॉ. ज्योतिकर का मानना है कि जब कभी भी दलितों पर अत्याचार की घटनाएं होती हैं तब दलित बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अपनाने लगते हैं.

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Image caption दलित आंदोलन

'मैं गाय से प्यार करता रहूंगा'

बहुत कम लोगों को पता है कि ऊना की घटना से पहले बालूभाई सरवैया के पास एक गाय भी थी. उन्होंने उस गाय का नाम गौरी रखा था. उस घटना से एक महीना पहले बालूभाई ने अपनी गाय के इलाज के लिए 6 हज़ार रुपयों से ज्यादा का खर्च भी किया था. वे बताते हैं कि उन्होंने वह गाय अपने भाई के खेत में रखी थी और अब उस गाय का बछड़ा भी हो गया है.

बालूभाई कहते हैं, ''गाय के लिए मेरे प्यार को किसी धर्म के प्रमाण की जरूरत नहीं है. बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी मैं गाय पालूंगा और उसकी सेवा करूंगा.'' वे कहते हैं कि कोई दलित गाय को नुकसान नहीं पहुंचाता.

बालूभाई कहते हैं, ''हमने आज तक किसी बीमार गाय को भी चमड़ी निकालने के लिए नहीं उठाया, यहां तक कई बार इस काम के लिए हमें ऊंची जाति के लोगों ने पैसे देने की बात भी रखी.''

ऊना की उस घटना के बाद कुल 45 लोगों को हिरासत में लिया गया था लेकिन इस वक्त महज़ 11 लोग ही जेल की सलाखों के पीछे बंद हैं जबकि बाकी जमानत पर आज़ाद घूम रहे हैं.

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