डेटा चोरी को लेकर इतना शोर, लेकिन मामला क्या है

  • 29 मार्च 2018
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पिछले कई दिन से हर तरफ़ डेटा चोरी की ख़बरें चल रही हैं

पहले लगा कि मामला सिर्फ़ अमरीकी चुनाव से जुड़ा है लेकिन जल्दी ही इसमें भारतीय राजनीति भी शामिल हो गई

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मामले की शुरुआत

17 मार्च को ब्रिटेन के अख़बार द गार्डियन में ख़बर छपी कि एक ब्रिटिश कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका (CA) ने फ़ेसबुक के लगभग 5 करोड़ यूज़र्स का डेटा चुराकर 2016 के अमरीकी चुनाव में इस्तेमाल किया.

ये जानकारी खोजी पत्रकार कैरल कैडवालाडर ने CA के एक पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफ़र वाइली के हवाले से सार्वजनिक की.

28 साल के क्रिस्टोफ़र कनाडा के हैं.

उनका कहना है कि उन्होंने CA के साथ 2013-14 के बीच काम किया.

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कैसे चुराया डेटा?

वाइली के मुताबिक़, CA ने एक क्विज़ बनवाया जिसके सवालों का जवाब देने के लिए 1-2 डॉलर दिए जाते थे.

शर्त ये थी कि लोग क्विज़ खेलने के साथ-साथ उससे अपना फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल भी लिंक करें.

वाइली के मुताबिक़, तक़रीबन ढाई लाख लोगों ने ये क्विज़ खेला, जिससे उनका डेटा तो कंपनी के पास पहुंचा ही, साथ ही कंपनी ने चोरी से उनके दोस्तों का डेटा भी डाउनलोड कर लिया.

उस वक़्त फ़ेसबुक में किसी के ज़रिए उनके दोस्तों के प्रोफ़ाइल भी एक्सेस किए जा सकते थे. फ़ेसबुक ने ये सुविधा मई 2015 में बंद की.

वाइली का दावा है कि इसका फ़ायदा उठाकर उस प्रोग्राम ने फ़रवरी से मई 2014 के बीच तक़रीबन 5 करोड़ लोगों का डेटा चुरा लिया.

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अमरीकी चुनाव में हेरफेर?

क्रिस्टोफ़र वाइली का ये भी दावा है कि इस डेटा का इस्तेमाल 2016 के अमरीकी चुनाव में हेरफेर करने के लिए किया गया.

मीडियानामा के संपादक निखिल पाहवा के मुताबिक़ "जिन्होंने ने ये क्विज़ खेला उनका व्यक्तित्व, पसंद, रुझान, नस्ल, लिंग, उम्र, नाम, जगह, ईमेल सब पता लग गए. ऐसी जानकारी से विरोधियों की पहचान की जा सकती है, अफ़वाहें फैलाई जा सकती हैं. किसी ख़ास समूह को निशाना बनाया जा सकता है, जाली ख़बरें भेजकर लोगों को किसी नेता के साथ या ख़िलाफ़ किया जा सकता है. जैसे सुनने में आया कि कुछ अफ़्रीकी-अमरीकी लोगों को एक फ़र्ज़ी साइट का लिंक भेजकर कहा गया कि वो उसके ज़रिए घर बैठे वोटिंग कर सकते हैं. उनके वोट ख़राब हो गए."

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Image caption कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ एलेक्ज़ेंडर निक्स को बर्ख़ास्त कर दिया गया

इस ख़बर से हंगामा मच गया

रिपोर्ट आने के बाद मार्क ज़ुकरबर्ग ने माफ़ी मांगी और CA के सीईओ एलेक्ज़ेंडर निक्स को बर्ख़ास्त कर दिया गया.

हालांकि फ़ेसबुक और CA दोनों कंपनियों ने आरोपों का खंडन भी कर दिया.

नाराज़ लोगों ने डिलीट फ़ेसबुक नाम से एक हैशटैग चलाया और भारत की सरकार ने ज़ुकरबर्ग को धमकी दी कि 'अगर भारतीयों के डेटा के साथ छेड़छाड़ हुई होगी तो ज़ुकरबर्ग को भारत बुलाया जाएगा.'

ब्रिटेन की एक संसदीय समिति ने इस मामले की जांच शुरू कर दी जिसमें मंगलवार को क्रिस्टोफ़र वाइली से पूछताछ की गई.

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Image caption क्रिस्टोफ़र वाइली

वाइली ने संसद को क्या बताया?

वाइली ने कहा कि 'CA ने अमरीकी चुनाव के अलावा ब्रेक्सिट में भी छेड़छाड़ की.

साथ ही उन्होंने बताया कि 'SCL में चुनावों का काम देख रहे डैन मुरेसान की संदिग्ध हालात में मौत हो गई. मुरेसान पहले भारत में काम कर रहे थे.'

SCL कैम्ब्रिज एनालिटिका की मालिक कंपनी है.

वाइली की मानें तो CA कंपनी नहीं बल्कि SCL की एक टीम भर है, जिसे चुनावी डेटा की पड़ताल के लिए ही बनाया गया था.

SCL के मालिक नाइजेल ओक्स हैं वहीं CA का काम मुख्य रूप से एलेक्ज़ेंडर निक्स देखते थे.

वाइली के मुताबिक़ CA में अमरीकी अरबपति रॉबर्ट मर्सर का पैसा लगा है जिन्हें ट्रंप का बड़ा सहयोगी माना जाता है.

वाइली का दावा है कि मर्सर से एलेक्ज़ेंडर निक्स की मुलाक़ात स्टीव बैनन ने करवाई थी जो डोनल्ड ट्रंप के चुनावी रणनीतिकार थे.

वाइली ने ये भी कहा कि भारत की विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी CA की सेवाएं लेती है.

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भारत में SCL की जड़ें

वाइली ने अपने ट्विटर पर कुछ तस्वीरें शेयर की और SCL के भारत में किए गए काम की जानकारी दी. इन तस्वीरों के मुताबिक़ SCL इंडिया ने 2003 से 2012 के बीच कई राज्यों में नौ चुनावी प्रोजेक्ट किए.

इनमें से दो प्रोजेक्ट वोटरों की जाति पता करने के लिए किए गए वहीं छह में वोटरों के व्यवहार पर रिसर्च करनी थी.

SCL इंडिया के भारत में 10 दफ़्तर हैं. SCL इंडिया, SCL और ओवलीनो बिज़नेस इंटेलीजेंस (OBI) को मिलाकर बनाई गई है.

OBI जेडीयू नेता केसी त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी की कंपनी है जो SCL इंडिया के अध्यक्ष भी हैं.

वाइली की तस्वीर में एक जगह जेडीयू का नाम भी है. इसे लेकर विपक्षी पार्टियों ने जेडीयू को घेरने की कोशिश की लेकिन केसी त्यागी ने CA के साथ काम करने के आरोप को ख़ारिज कर दिया.

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Image caption क्रिस्टोफ़र वाइली ने ट्विटर पर SCL के भारतीय प्रोजेक्ट की जानकारी शेयर की

कांग्रेस-बीजेपी के नाम भी उछले

ऐसी ख़बरें भी आईं थी कि OBI की वेबसाइट पर कहा गया था कि बीजेपी और कांग्रेस ने उनकी सेवाएं लीं. हालांकि ये जानकारी अब हटा ली गई है लेकिन बीजेपी और कांग्रेस ने सभी आरोपों का ख़ारिज कर दिया है.

कांग्रेस की सोशल मीडिया हेड दिव्या स्पंदन ने वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त से बातचीत में कहा कि 'कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कांग्रेस से कई बार काम मांगा लेकिन कांग्रेस ने उनके साथ कभी काम नहीं किया.'

वहीं बीजेपी ने फ़ेसबुक को नोटिस भेजकर पूछा है कि क्या भारतीय वोटर्स और यूज़र्स के निजी डेटा का ग़लत इस्तेमाल किया गया? या कभी भारतीय चुनाव पर असर डालने की कोशिश की गई?

फ़ेसबुक को जवाब देने के लिए 7 अप्रैल तक का समय दिया गया है.

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क्या डेटा विश्लेषण ग़ैर क़ानूनी है?

नहीं. न डेटा जमा करना ग़ैर क़ानूनी है. न ही उसका विश्लेषण करना या कराना ग़ैर क़ानूनी है.

शर्त ये है कि ऐसा यूज़र्स की इजाज़त लेकर किया जाए और डेटा की पड़ताल का ग़लत इस्तेमाल न हो.

हालांकि भारत के सरकारी डेटा को विदेश नहीं भेजा जा सकता क्योंकि ये पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट का उल्लंघन होगा जो दंडनीय अपराध है.

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फिर इतना विवाद क्यों?

क्योंकि कैम्ब्रिज एनालिटिका पर आरोप है कि उसने चोरी से, बग़ैर यूज़र को बताए, उनका डेटा जमा किया.

क्रिस्टोफ़र वाइली के मुताबिक़, CA ने अमेज़न के एम टर्क प्लेटफ़ॉर्म पर क्विज़ बनाया, जहां जवाब देने वालों को पैसे मिलते हैं.

यही वजह है कि कथित तौर पर लाखों लोगों ने जवाब दिया.

लेकिन यह धोखाधड़ी ज़्यादा दिन नहीं चल सकी क्योंकि ये क्विज़ एम टर्क की नीतियों का उल्लंघन कर रहा था और इसलिए कुछ यूज़र्स ने इसकी शिकायत कर दी.

दिसंबर 2015 में अमेज़न ने उस क्विज़ पर रोक लगा दी.

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NaMo ऐप का मामला भी इससे जुड़ा है?

नहीं. वो मिलता-जुलता लगता है क्योंकि उस पर भी डेटा लीक का आरोप है लेकिन वो मामला बिल्कुल अलग है.

फ़्रांस के एक व्हिसल ब्लोअर इलियट ऑल्डरसन का आरोप है कि पीएम मोदी का आधिकारिक ऐप NaMo यूज़र्स की इजाज़त लिए बग़ैर उनका डेटा एक थर्ड पार्टी को भेज रहा है.

बीजेपी ने इस आरोप का खंडन किया है.

बताया जा रहा है कि विवाद सामने आने के बाद NaMo की निजता नीति में गुपचुप तरीक़े से एक डिस्क्लेमर जोड़ दिया गया है जो 23 मार्च तक नहीं था.

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क्या NaMo ऐप ने कुछ ग़ैर क़ानूनी किया?

तब तक नहीं जब तक कोई साबित न कर दे कि NaMo ऐप लोगों की मंज़ूरी लिए बिना उनकी जानकारी बाहर भेज रहा था.

ऐसा कोई सबूत नहीं है जो बताए कि बीजेपी उस डेटा का कुछ ग़लत इस्तेमाल कर रही है.

NaMo ऐप पर क़ानून के उल्लंघन का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि बीजेपी के मुताबिक़ NaMo प्रधानमंत्री का निजी ऐप है.

हालांकि राहुल गांधी ने पूछा है कि PMO का सरकारी ऐप होने के बावजूद प्रधानमंत्री को एक निजी ऐप की ज़रूरत क्यों पड़ गई.

इलियट ऑल्डरसन ने भी बीबीसी से बातचीत में कहा कि "सरकारी हो या नहीं, NaMo एक राजनीतिक ऐप तो है. ऐसे में अगर वो डेटा का विश्लेषण कराके लोगों को उनकी दिलचस्पी के हिसाब से जानकारी भेजता है तो ये भी एक तरह की हेराफेरी है."

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क़ानून इस पर रोक नहीं लगा सकता?

साइबर सिक्योरिटी के जानकार पवन दुग्गल के मुताबिक़, ''सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि निजता का अधिकार बुनियादी अधिकारों में शामिल है लेकिन भारत में न कोई डेटा सुरक्षा क़ानून है, न ही निजता क़ानून. अब लोग अगर अपना फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल डिलीट कर भी दें तो भी जो जानकारी वहां है, वो तो वहीं रहेगी."

तो क्या रास्ता है?

पवन कहते हैं कि ''अगर किसी कंपनी ने आपका डेटा लीक किया है तो आईटी एक्ट की धारा 43 (ए) के तहत मुकदमा किया जा सकता है लेकिन आम आदमी सामान्य तौर पर ये साबित ही नहीं कर पाता. सरकार को डेटा की सुरक्षा और निजता की हिफ़ाज़त के लिए कड़ा क़ानून बनाना जाना चाहिए.''

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