हिज़बुल में क्यों शामिल हुआ पेटीएम में काम करने वाला जुनैद

  • 29 मार्च 2018
कश्मीर इमेज कॉपीरइट Getty Images

अलगाववादी खेमे में चल रहे राजनीतिक मंथन के दौरान आई एक असामान्य ख़बर ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है.

ख़बर है कि हाल ही में तहरीक-ए-हुर्रियत के प्रमुख चुने गए अशरफ़ सहराई के बेटे जुनैद चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गए हैं.

कई सालों बाद इस चंरमपंथी संगठन में कोई हाई प्रोफ़ाइल चेहरा में शामिल हुआ है.

अशरफ़ सहराई जिस तेज़ी से उभरे हैं वो भी कई लोगों के लिए हैरान करने वाला रहा है. कई लोग सहराई को हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस में गिलानी का उत्तराधिकारी भी मानते हैं.

सहराई ने 18 मार्च को ही तहरीक-ए-हुर्रियत के प्रमुख का पद संभाला था और 25 मार्च को उनके बेटे जुनैद की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. इस तस्वीर में वो हाथों में एके-47 राइफल पकड़े देखे गए थे.

कश्मीर में चरमपंथ की नई लहर ज्यादा खतरनाक

'हुर्रियत, नक्सलियों से बात तो मनसे से क्यों नहीं?'

इमेज कॉपीरइट Social Media/Viral Photo

जुनैद ने कश्मीर यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है. उनके चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन में शामिल होने के फ़ैसले को कश्मीर के नौजवानों के लिए 'एक बड़ा संदेश' माना जा रहा है.

'जुनैद अपनी राह पर चला गया'

जुनैद ने चार महीने पहले पेटीएम कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी.

बीते कुछ सालों में भारत प्रशासित कश्मीर के कई नौजवानों ने इस चरमपंथी संगठन में बड़े पद संभाले हैं. लेकिन 'कश्मीर का पोस्टर ब्वॉय' कहे जाने वाले बुरहान वानी की मौत के बाद हिज़बुल मुजाहिदीन से जुड़ने वालों की संख्या बढ़ी है. कई बार माता-पिता अपने बच्चों को हिंसा के रास्ते पर जाने से चाहते हुए भी नहीं रोक पा रहे हैं.

हालांकि कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं जहां माता-पिता के कहने पर उनके बच्चे बंदूक छोड़ घर लौट आए हैं.

अशरफ़ सहराई का कहना है कि जुनैद की जो इच्छा थी, उसने वही किया. वो कहते हैं, "जुनैद अपनी राह पर चला गया. ख़ुदा के हवाले. उसको वही समझ आया कि मुझे ऐसा काम करना चाहिए. हम बहुत ज़ुल्म झेल रहे हैं."

गिरफ़्तार जुनैद का बटला हाउस से क्या कनेक्शन?

वो सात कश्मीरी जिन्हें एनआईए ने पकड़ा

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अशरफ़ सहराई को अपने बेटे के जाने का कोई पश्चाताप नहीं है. हाल के कुछ साक्षात्कारों में अशरफ़ सहराई ने कश्मीर पर भारतीय कब्ज़े को ख़त्म करने के लिए हिंसा के मार्ग को भी उचित ठहराया था.

सहराई की तुलना

सहराई का कहना है कि सशस्त्र प्रतिरोध दुनिया में हर स्वतंत्रता आंदोलन का एक अभिन्न अंग है.

कई लोग मानते हैं कि आहिस्ता और नरम तरीक़े से बात करने वाले सहराई अपने सीनियर नेताओं की तुलना में कहीं ज़्यादा कट्टरपंथी हैं.

कश्मीर में एक कार्यक्रम के दौरान दिए अपने संबोधन में उन्होंने सरकारी अधिकारियों की अपील को ख़ारिज कर दिया. अपील में सहराई से कहा गया था कि वो अपने बेटे को वापस बुला लें.

लेकिन सहराई के लिए ऐसा करना इसलिए भी संभव नहीं है क्योंकि आंदोलन में हिंसा को जायज़ बताने वाले सहराई को फिर ये भी बताना होगा कि हिंसा में झोंकने के लिए औरों के बच्चे ही बेहतर हैं, अपने क्यों नहीं.

'कश्मीर में घायल युवक की मौत, लगे थे 360 छर्रे'

श्रीनगर: चरमपंथी हमला, छह की मौत

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जुनैद के चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन ज्वाइन करने के फ़ैसले पर कई तरह से बहस हो रही है.

उनका ये फ़ैसला ऐसे लोगों के लिए एक जवाब माना जा रहा है जो कहते रहे हैं कि हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के नेताओं के बच्चे तो बेहतर करियर चुन रहे हैं. वो क्यों बंदूक नहीं उठाते?

हिंसा समाज ने स्वीकार कर ली

लेकिन ये किसी के लिए जवाब है या नहीं, इससे ज़्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि इस आंदोलन ने अपना रंग एक बार फिर बदल लिया है. हिंसा से अहिंसा की ओर जाना अतीत की बात हो गई है.

जब जुनैद ने हथियार उठाया तो किसी ने इस बारे में एक सवाल तक नहीं पूछा. वरना जुनैद के पास अपने पिता के साथ राजनीति करने का एक विकल्प तो हमेशा खुला ही था.

बीते वक़्त में तेज़ी से इस संगठन से जुड़े चरमपंथियों की संख्या बढ़ी है और दूसरी वैचारिक ताकतों के साथ उनकी लड़ाई ने हाल के दिनों में एक नया मोड़ लिया है.

'कश्मीर में पेलेट नहीं, शॉट गन हो रही इस्तेमाल'

हुर्रियत से दिल्ली का ट्रैक-टू डॉयलाग शुरु?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

मसलन, तहरीक उल मुजाहिदीन के चरमपंथी ईसा फ़ज़ीली के अंतिम संस्कार में कुछ लोगों ने उनके शव को इस्लामिक स्टेट के झंड़े में लपेट दिया और ये बताने की कोशश की कि हिज़बुल के साथ-साथ दूसरी विचारधाराएं भी कश्मीर में काम कर रही हैं.

हिज़बुल मुजाहिदीन पहले ही ज़ाकिर मूसा नाम के अपने स्थानीय कमांडर को खो चुकी है जो अब अल-क़ायदा के संगठन 'अंसार ग़ज़वात-उल-हिंद' से जुड़ गए हैं.

कौन है कश्मीर का नया चरमपंथी कमांडर ज़ाकिर मूसा?

कश्मीर में 'ज़ाकिर मूसा की तस्वीर लगा ऑडियो' वायरल

हिज़बुल मुजाहिदीन के माध्यम से चलने वाले जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा को ये तत्व अब चुनौती दे रहे हैं. पाकिस्तान और जमात के ख़िलाफ़ उनके द्वारा दिए गए बयानों ने चरमपंथी राजनीति को हिला रखा है.

ऐसे हालात में जुनैद का हिज़बुल मुजाहिदीन से जुड़ना इस चरमपंथी संगठन के लिए एक मज़बूत राजनीतिक निवेश कहा जा रहा है. साथ ही कयास लगाए जा रहे हैं कि जुनैद हिज़बुल की कमान भी संभाल सकते हैं.

आधिकारिक रूप से जमात, हिज़बुल मुजाहिदीन को अब वैसे नहीं अपनाती जैसे कभी वो 90 के दशक में अपनाती रही है. लेकिन अब हालात बदल गए हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे