चाय पे ख़र्चा: देवेंद्र फडणवीस के कार्यालय में पी गई तीन करोड़ की चाय

  • 29 मार्च 2018
महाराष्ट्र, देवेंद्र फडणवीस इमेज कॉपीरइट PTI

महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार एक बार फिर विवादों में है और वजह है- चाय.

आरटीआई (राइट टू इन्फ़ॉर्मेशन) से मिली जानकारी के मुताबिक़ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यालय में एक साल में (2017-18) तीन करोड़ 34 लाख रुपए की चाय पी गई.

यह आरटीआई याचिका यूथ कांग्रेस के सदस्य निखिल कांबले ने दायर की थी.

बीबीसी ने इस बारे में कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने से बात की.

उन्होंने कहा, "हमने उनसे पूछा था कि आपके कार्यालय में साल भर में चाय और नाश्ते पर कितना ख़र्च किया जाता है. जवाब में हमें बताया गया कि इस साल चाय-पानी के लिए तकरीबन तीन करोड़ 34 लाख रुपए ख़र्च किए गए."

आरटीआई में ये भी बताया गया है कि दो साल पहले तक ये ख़र्च तकरीबन 57 लाख रुपए था. निरुपम ने कहा कि ये बेहद चौंकाने वाली बात है.

उन्होंने पूछा, "मुख्यमंत्री के कार्यालय में अचानक ऐसी कौन सी चाय पी जाने लगी कि ख़र्च 500% से ज़्यादा बढ़ गया?''

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अब राज्य सरकार का कहना है कि ये सिर्फ चाय-नाश्ते का ख़र्च नहीं है. इसमें विदेशी मेहमानों को दिए जाने वाले तोहफ़ों का ख़र्च भी शामिल है.

हालांकि आरटीआई में सिर्फ़ चाय-नाश्ते के खर्च के बारे में पूछा गया था और जवाब भी इसी का दिया गया था.

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Image caption संजय निरुपम

बीबीसी के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "ज़ाहिर है कि चाय कम पी गई है, पर्चे ज़्यादा फाड़े गए हैं.''

निरुपम का आरोप है कि अब भी मुख्यमंत्री कार्यालय इसे गंभीरता से लेने के बजाय झूठ पर झूठ बोले जा रहा है."

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उन्होंने कहा कि ये सब तब हो रहा है जब महाराष्ट्र का बजट भारी घाटे में चल रहा है. राज्य की विकास योजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में 30% कटौती की गई है. इतना ही नहीं महाराष्ट्र पर लाखों करोड़ों रुपयों का कर्ज है.

निरुपम के मुताबिक ऐसी स्थिति में ख़ुद मुख्यमंत्री के कार्यालय में इस तरह की फ़िज़ूलखर्ची, फ़िज़ूलखर्ची कम और घोटाला ज़्यादा है.

असल में कितना खर्च होता होगा?

संजय निरुपम के मुताबिक़ मंत्रालय में दो रुपये की चाय, दो रुपये के बिस्किट और एक रुपये का बटाटा-वड़ा मिलता है.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

अगर एक शख़्स दो बार स्नैक्स लेता है तो भी ये खर्च बहुत ज़्यादा है. इस पर भी मंत्रालय शनिवार-रविवार बंद रहता है और पूरे मंत्रालय में रोज 5,000 से ज़्यादा लोग आते ही नहीं हैं.

उन्होंने कहा, ''यानी साफ़ है कि चाय़ सिर्फ कागजों पर पिलाई जा रही है.''

इस बारे में बीबीसी ने जब महाराष्ट्र बीजेपी के प्रवक्ता माधव भंडारी से पूछा तो उन्होंने कहा, ''मुख्यमंत्री कार्यालय ने पहले ही इस बारे में पहले ही अपना पक्ष रख दिया है इसलिए बीजेपी को अलग से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है.''

उन्होंने कहा, ''मुझे हैरत है कि कभी सत्ता में रहने वाले संजय निरुपम इस पर इतना हो-हल्ला मचा रहे हैं जबकि उन्हें प्रशासनिक कामों की अच्छी तरह जानकारी है.''

भंडारी का दावा है कि कांग्रेस के वक़्त में कोई सीएम ऑफ़िस आता-जाता नहीं था जबकि बीजेपी के शासन में आम लोगों से लेकर विदेशी मेहमानों तक का आना-जाना लगा रहता है इसलिए जब खर्च बढ़ गया तो विपक्ष इतना चिल्ला रहा है.

इससे पहले हुआ था 'चूहा घोटाला'

पिछले दिनों एक कॉन्ट्रैक्टर ने दावा किया कि उसने मंत्रालय में एक हफ़्ते के भीतर तीन लाख तीस हजार के लगभग चूहे मारे. यानी हर मिनट औसतन 31,000 चूहे मारे गए. इसका बिल भी भुगतान किया गया.

हालांकि फडणवीस सरकार के ही मंत्री एकनाथ खड़से ने इस पर सवाल उठाया और पूछा कि इन मरे हुए चूहों का वजन नौ किलो से ज़्यादा होगा. खडसे ने पूछा कि कंपनी ने इतने चूहों को कहां फेंका.

बाद में पता चला कि चूहे मारने वाली कंपनी असल में है ही नहीं. ये सिर्फ़ कागजों पर मौज़ूद है यानी फ़र्जी कंपनी है.

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