एयर इंडिया को ख़रीदने की रेस में कौन-कौन?

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भारत सरकार ने बुधवार 28 मार्च को सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया की 76 फ़ीसद हिस्सेदारी बेचने के लिए विनिवेश का खाका जारी कर दिया.

इसके अनुसार बोली लगाने वालों की संपत्ति कम से कम पांच हज़ार करोड़ रुपये होनी चाहिए. इसका मतलब है कि भारतीय विमानन कंपनियों को इसमें बोली लगाने के लिए किसी विदेशी एयरलाइंस के साथ करार करना होगा.

सरकार के एयर इंडिया की हिस्सेदारी बेचने को तैयार होने के बाद ग्रेट महाराजा की बिक्री के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा शुरू होने को है.

इस दौड़ में सबसे पहले एक और सरकारी स्वामित्व वाली एयरलाइंस है- सिंगापुर एयरलाइंस, जो अभी भारत में टाटा संस के साथ साझेदारी में विस्तारा एयरलाइंस का संचालन कर रही है.

सिंगापुर एयरलाइंस ने बीबीसी को ये पुष्टि की है कि भारत सरकार के एयरलाइंस में हिस्सेदारी की बिक्री-प्रक्रिया शुरू होने पर वो इसमें हिस्सा लेगी.

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सिंगापुर एयरलाइंस के भारत में महाप्रबंधक, डेविड लिम ने बीबीसी को बताया कि वो एयर इंडिया में हिस्सेदारी ख़रीदने की बोली लगाने के इच्छुक हैं.

लिम ने कहा, "भारत सरकार विनिवेश करना चाहती है और हम एयर इंडिया में हिस्सेदारी लेना चाहते हैं. जब भी ऐसा होता है हम इसे देखेंगे."

नए नियमों के तहत, सिंगापुर एयरलाइंस एयर इंडिया की केवल 49 फीसद हिस्सेदारी ही ख़रीद सकती है क्योंकि इसका स्वामित्व और नियंत्रण किसी भारतीय कंपनी के पास ही होना चाहिए. हालांकि वो विस्तारा के माध्यम से अपने भारतीय साझीदार टाटा संस के साथ भी बोली लगा सकते थे.

डेविड लिम ने कहा, "हमने विस्तारा का विस्तार किया है और इसका विस्तार करना ही हमारी पहली प्राथमिकता है."

अगर विस्तारा ये हिस्सेदारी लेने में कामयाब हो जाती है तो ये महज दो साल पहले हवाई उड़ान सेवा के क्षेत्र में आने वाली इस एयरलाइंस कंपनी के लिए बहुत बड़ी सफलता होगी जिसके इसी साल अंतरराष्ट्रीय उड़ान के क्षेत्र में अपने कदम पसारने की योजना है.

50 हज़ार करोड़ के घाटे में डूबी एयर इंडिया को कौन ख़रीदेगा

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एयर इंडिया पर दांव क्यों?

एयर इंडिया स्टार एलायंस का सदस्य है. ये अमरीका और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया की 44 जगहों के लिए अपनी हवाई सेवा देती है.

इसके पास अन्य अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस के साथ एक प्रभावशाली कोड शेयरिंग समझौता भी है, जो यात्रियों को सस्ते किराए पर छोटी जगहों पर पहुंचने में मदद करता है.

टाटा संस के लिए विस्तारा के जरिए बोली लगाने का एक और भी कारण है. जेआरडी टाटा ने ही भारत में 1948 में एयर इंडिया लॉन्च की थी लेकिन पांच साल बाद भारत सरकार ने उसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था. इसलिए टाटा संस के लिए यह विरासत को फिर पाने के लिए प्रतिष्ठा की बोली है.

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लेकिन मुक़ाबला कठिन है. एयर इंडिया के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है कि इसकी बोली में और भी ग्लोबल खिलाड़ी हैं.

इनमें से एक कतर एयरवेज के होने की संभावना है, जो कि एक सरकारी स्वामित्व वाली एयरलाइंस है और इंडिगो एयरलाइंस के साथ बोली लगा सकती है.

पिछले साल, इंडिगो एयरलाइंस ने एयर इंडिया और बजट कैरियर एयर इंडिया एक्सप्रेस के अंतरराष्ट्रीय परिचालन में रुचि दिखाई थी.

इंडिगो एयरलाइंस के सह-संस्थापक राहुल भाटिया ने पिछले साल जून में निवेशकों को बताया था, "एयर इंडिया के अंतरराष्ट्रीय संचालन से हमारे नेटवर्क में कुछ खास एलिमेंट जुड़ेगा. इससे प्रतिबंधित, और कुछ मामलों में, सीमित अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में तुरंत घुसने का अवसर मिलेगा."

कतर एयरवेज के साथ मिलकर इंडिगो कम से कम नगदी के मामले में इस मुक़ाबले को जीतने की स्थिति में है.

कतर एयरवेज के लिए भी अपने क्षेत्र से बाहर पांव पसारने को लेकर एयर इंडिया बेहद महत्वपूर्ण सौदा है. इस एयरलाइंस को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि अरब देश कथित तौर पर चरमपंथ का समर्थन करने के लिए कतर का विरोध कर रहे हैं और इसकी एयरलाइंस पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं.

हालांकि, फिलहाल एयरलाइंस ने अपने एक मीडिया बयान में एयर इंडिया के लिए बोली लगाने से इंकार किया है.

कतर एयरलाइंस के मुताबिक, "कतर एयरवेज एयर इंडिया के अधिग्रहण से संबंधित किसी भी वार्ता में शामिल होने से इंकार करता है."

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और भी हैं प्रतिस्पर्धी

लेकिन एक तीसरा मोर्चा भी है. एयर इंडिया के सूत्रों के मुताबिक, फ्रेंच-डच-अमरीका एयरलाइंस की एक संयुक्त बोली भी हो सकती है.

एयर फ्रांस-केएलएम और डेल्टा एयरलाइंस जेट एयरवेज से साथ मिलकर एक संयुक्त बोली लगाने की इच्छुक हैं.

हालांकि उनके प्रवक्ता ने आधिकारिक तौर पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया है, लेकिन वो सिंगापुर एयरलाइंस और कतर एयरवेज की आर्थिक ताक़त का मुकाबला नहीं कर सकेंगे.

केवल अमरीकी डेल्टा एयरलाइंस ने ही पिछले साल 3.6 बिलियन डॉलर का शुद्ध लाभ दिखाया है, इसके यूरोपीय साझेदार घाटे का सामना कर रहे हैं और जेट एयरवेज ने पिछले साल की तुलना में दिसंबर की तिमाही में अपने शुद्ध लाभ में करीब 40 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की थी.

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एयर इंडिया का पतन

हालांकि, वैसे तो दुनिया की ये एयरलाइंस बोली खुलने का इंतजार कर रही हैं, लेकिन एयर इंडिया के पतन का क्या कारण है? इस पर डालते हैं एक नज़र.

एयर इंडिया का पतन 2007 में इंडियन एयरलाइंस के साथ विलय के साथ शुरू हुआ. नौकरशाही के ख़राब फ़ैसले और कर्ज में डूबे होने के बावजूद बोइंग विमानों के ख़रीदने के कारण इसकी बैलेंस शीट बिल्कुल चरमरा गई.

2018 में एयर इंडिया पर 52 हज़ार रुपये का भारी कर्ज है जबकि घरेलू उड़ानों में इसकी हिस्सेदारी 2014 के 19 फ़ीसदी से घट कर आज 13.3 फ़ीसदी पर पहुंच गई है.

सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने एयरलाइंस की परिसंपत्तियों और संचालन के विनिवेश की रूपरेखा तैयार की है.

एयरलाइंस के संचालन के अतिरिक्त इसकी तीन और सहायक कंपनियां हैं.

एयर इंडिया इंजीनियरिंग सर्विस लिमिटेड, यह रखरखाव और मरम्मत का प्रबंध करती है. एयर इंडिया ट्रांसपोर्ट सर्विस लिमिटेड, जो ग्राउंड हैंडलिंग करती है और एलायंस एयर जो छोटे शहरों के लिए उड़ानों का संचालन करती है.

सभी सहायक कंपनियों की अलग रेटिंग है और इसके लिए एक संयुक्त बोली भी लगाई जा सकती है.

यह साफ़ तौर पर दिखता है कि बोली लगाने वाली कंपनी इसके ऋण दायित्व को नहीं लेना चाहती. लेकिन सरकार की विनिवेश नीतियों के मुताबिक एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया एसएटीएस, के लिए बोली लगाने वाली कंपनियों को कुल कर्ज 24,576 करोड़ रुपये का करीब आधा और देनदारियों का 8816 करोड़ रुपये देना होगा.

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