छह दिन बाद अन्ना हज़ारे ने तोड़ी भूख हड़ताल

  • 29 मार्च 2018
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भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने गुरुवार शाम को अपनी भूख हड़ताल ख़त्म कर दी.

वो दिल्ली के रामलीला मैदान में पिछले छह दिनों से अनशन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति का भरोसा मिलने के बाद उन्होंने ये फ़ैसला लिया.

उनका अनशन तुड़वाने के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय कृषि (राज्य) मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत रामलीला मैदान पहुंचे थे.

दोनों ने उनसे बातचीत की और उन्हें भूख हड़ताल ख़त्म करने के लिए राजी किया.

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उन्होंने कहा कि वो सरकार को अगस्त तक की मोहलत दे रहे हैं लेकिन अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वो सितंबर में फिर अनशन पर बैठेंगे.

भूख हड़ताल पर बैठे 80 वर्षीय अन्ना लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति के साथ ही किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने की मांग कर रहे थे.

देवेंद्र फडणवीस ने भी एक वीडियो ट्वीट कर जानकारी दी.

उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार ने अन्ना जी की लगभग सभी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया है. हमने उन्हें पीएमओ की तरफ़ से इस बारे में एक चिट्ठी भी दी है.''

फडणवीस ने कहा, ''किसानों की फसलों को उनका उचित मूल्य दिलाने से लेकर चुनाव सुधारों और लोकपाल की नियुक्ति जैसे सारे मामलों पर हमारी उनसे बात हुई."

सीएमओ महाराष्ट्र के ट्विटर हैंडल से एक वीडियो ट्वीट किया गया है जिसमें देवेंद्र फडणवीस अन्ना को पानी पिलाते नज़र आ रहे हैं. साथ ही माहौल में 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' के नारे सुनाई पड़ रहे हैं.

अन्ना ने अपना अनशन तोड़ने के बाद कहा, "सरकार और जनता अलग नहीं होती...सरकार का काम है जनता की भलाई, देश की भलाई...ऐसे आंदोलन की नौबत ही नहीं आनी चाहिए."

इससे पहले साल 2011 में भी अन्ना लोकपाल की मांग लेकर ऐसी ही भूख हड़ताल पर बैठे थे. इसके बाद दिल्ली में लोकपाल और लोकायुक्त ऐक्ट 2013 पारित किया है लेकिन केंद्र में आज भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है.

इस बार धरने पर बैठने से पहले अन्ना ने मोदी सरकार के प्रति गहरी नाराज़गी जताई थी और कहा था कि उन्होंने बीते चार सालों में केंद्र सरकार को 43 चिट्ठियां लिखीं जिनमें से उन्हें एक का भी जवाब नहीं मिला.

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उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने ट्रेनों और बसों को रोका और किसानों के रास्तों में अड़चने पैदा कीं ताकि वो दिल्ली ना पहुंच सकें.

हालांकि इस बार के अन्ना आंदोलन में पहले जैसी रौनक और भीड़ नहीं दिखी. अन्ना हजारे ने खुद भी ये बात स्वीकार की थी.

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उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि पिछली बार आंदोलन में राजनीतिक लोग शामिल हो गए थे. इस बार कोई राजनीतिक व्यक्ति आंदोलन में नहीं है इसलिए उतनी भीड़ नहीं है.

इतना ही नहीं अन्ना ने ये भी कहा था कि कहते हैं कि बहुत से किसानों ने उन्हें आंदोलन में शामिल होने के लिए संपर्क किया लेकिन सरकार ने उन्हें दिल्ली पहुंचने से रोक दिया.

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इससे पहले 2014 में आम चुनाव से पहले अन्ना हज़ारे ममता बनर्जी के समर्थन में भी आए थे.

वो उनकी रैली में हिस्सा लेने के लिए रामलीला मैदान भी आए थे लेकिन बाद में 'कम भीड़' और 'गुमराह किए जाने' का हवाला देकर पीछे हट गए थे.

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