आज भी दलितों को अलग गिलास में दी जाती है चाय?

  • 31 मार्च 2018
चाय के कप इमेज कॉपीरइट PUNEET KUMAR/BBC

क्या आपने किसी होटल में चाय पीने के बाद अपना चाय का कप खुद धोया है? दक्षिण भारत के कई हिस्सों में होटलों में चाय पीने के बाद भी कुछ लोगों को अपना कप खुद धोना पड़ता है.

जाति के निचले पायदान पर खड़े समाजों, ख़ास तौर से दलित समुदाय के लोगों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता है. कई बार उन्हें बाकी ग्रामीणों के साथ चाय पीने की इजाज़त भी नहीं होती.

क्या है टू-ग्लास सिस्टम

दलितों के चाय पीने के गिलास अलग रखे जाने की रूढ़ि को 'टू-ग्लास सिस्टम' कहते हैं. आज़ाद भारत के कुछ हिस्सों में यह रूढ़ि अब भी क़ायम है.

सभी में नहीं, लेकिन कुछ सवर्ण परिवारों में दलित आगंतुकों के लिए आज भी अलग बर्तन रखे जाते हैं. लेकिन सार्वजनिक दुकानों पर अलग गिलास रखने की परंपरा ज़्यादा चौंकाती है. तमाम भेदभाव विरोधी क़ानूनों और समाज-सुधार अभियानों के बावजूद यह परंपरा ख़त्म नहीं हो पाई है.

जाति आधारित भेदभाव के ख़िलाफ़ भारतीय संविधान में कई क़ानून हैं. संविधान का अनुच्छेद 15 जाति, धर्म, नस्ल, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है. अनुच्छेद 16 में समान अवसरों की बात भी कही गई है.

1989 का एससी-एसटी कानून भी जाति आधारित अत्याचारों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करता है. इसके बावजूद भारत में जाति आधारित भेदभाव अब भी एक कड़वा सच है.

लेकिन पेपर कप जैसी छोटी सी चीज़ के दशक भर पहले हुए आविष्कार ने एक हद तक इस रूढ़ि पर चोट की है. चाय की छोटी दुकानों और होटलों पर डिस्पोज़ेबल गिलास रखे जाने लगे हैं और ऐसा लगता है कि इससे दलितों के लिए अलग गिलास रखने की प्रवृत्ति में कमी आई है. अब किसी विशेष जाति को चाय पीने के बाद अपना कप ख़ुद धोना नहीं पड़ता.

काग़ज़ के गिलास से कितने बदले हालात?

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बीबीसी की टीम ने आंध्र प्रदेश के उत्तरी छोर पर बसे कुछ गांवों- मुत्ताई वल्सा, तम्मि वल्सा, कामा वल्सा और पिरिडी का दौरा किया और यह समझना चाहा कि पेपर गिलास से दलितों के जीवन में कितना बदलाव आया.

विजयनगरम ज़िले के मुत्ताई वल्सा गांव में दो पिछड़ी और एक अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं.

बीबीसी की टीम ने इस गांव में एक छोटा सा होटल चलाने वाले एक व्यक्ति से बात की. उन्होंने स्वीकारा कि दलितों को डिस्पोज़ेबल गिलासों में चाय दी जाती है जबकि अन्य लोगों को सामान्य गिलासों में.

गांव में रहने वाले दलित समुदाय के वेनकन्ना ने कहा, "पहले हमारे गांव में सब लोग दो तरह के गिलास रखते थे, लेकिन बाद में प्रशासन के डर से डिस्पोज़ेबल गिलास प्रयोग में लाए जाने लगे."

वेनकन्ना ने आगे कहा, "गांव में हम सब बड़े प्रेम से रहते हैं और हमारे बीच कोई मसला नहीं है. अगर किसी को प्लास्टिक के गिलास में चाय पीने में समस्या होती है तो वह अपने घर से ख़ुद गिलास ले आता है."

भारत की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी 16 फीसदी है. बीबीसी टीम ने आंध्र प्रदेश के कुछ गांवों का दौरा किया. 2011 की जनगणना के मुताबिक, आंध्र प्रदेश (जिसमें उस वक़्त तेलंगाना भी शामिल था) में दलितों की आबादी भी करीब 16 फीसदी है.

'हमने नाराज़गी ज़ाहिर की'

मुत्ताई वल्सा में राजू नाम के एक दलित युवक ने बीबीसी से कहा कि गांव में सब भाइयों की तरह रहते हैं, इसलिए उन्होंने होटल वालों से खुलकर दो तरह के गिलास रखने पर नाराज़गी ज़ाहिर की.

राजू ने आगे कहा, "इसके बाद होटल वालों ने टू-गिलास सिस्टम ख़त्म करके प्लास्टिक के गिलास रखना शुरू कर दिया. डिस्पोज़ेबल गिलास आने के बाद हम प्रेम से रह रहे हैं."

एक दलित महिला ने कहा कि वे होटलों के सामान्य गिलासों में चाय पीना पसंद नहीं करतीं क्योंकि वे साफ नहीं होते.

त्योहारों पर कैसा होता है माहौल?

हालांकि दूसरी जातियों के गांव वाले यहां किसी भी तरह के भेदभाव से इनकार करते हैं.

60 साल के एक बुजुर्ग ने कहा, "दलित समुदाय के लोग त्योहारों पर हमारे घर आते हैं, साथ में खाना खाते हैं और यहां टू-गिलास सिस्टम बिल्कुल नहीं है."

वहीं 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक युवक ने कहा कि इस तरह की प्रथाएं आने वाली पीढ़ियां ही खत्म करेंगी.

दूसरे गांव का हाल

बीबीसी टीम तम्मि वल्सा गांव पहुंची और पता लगाया कि क्या वहां टू-गिलास सिस्टम चलता है या नहीं. इस गांव में आमतौर पर होटल पिछड़ी जातियों के लोग ही चलाते हैं.

एक होटल मालिक ने कहा, "हम पिछड़ी जाति के लोगों को आम तौर पर सामान्य गिलास और डिस्पोज़ेबल गिलास दोनों में ही चाय देते हैं, जबकि दलितों को हम सिर्फ डिस्पोज़ेबल गिलास और पेपर प्लेट में चाय और खाना देते हैं. लेकिन कभी किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाए."

एकता की भावना

गांव के दलित जानते हैं कि भेदभाव के ख़िलाफ़ उन्हें कौन से कानूनी अधिकार हासिल हैं. इसके बावजूद वे गांव में मिलजुल कर रहना चाहते हैं.

वहीं एक अन्य गांव पिरिडी में बीबीसी की टीम टू-गिलास सिस्टम नहीं दिखा. गांववालों ने बताया कि यह सिस्टम तो 1990 में ही समाप्त कर दिया गया था.

40 वर्षीय दलित रामाराव ने कहा कि उन्होंने कभी टू-गिलास सिस्टम जैसा भेदभाव नहीं देखा है.

सामाजिक दबाव

कई सामाजिक समूहों के साथ काम करने वाले सिम्हाचलम का कहना है कि जब टू-गिलास सिस्टम के ख़िलाफ़ समाज में आवाज़ उठने लगी और दबाव बढ़ने लगा तब गांव में इस प्रथा को ख़त्म कर दिया गया.

वहीं दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक नेता सोरू रामबैया ने बताया कि कुछ होटलों में अब भी टू-गिलास सिस्टम चल रहा है.

रामबैया गांव के बुजुर्गों से पूछते हैं कि क्या वो ईमानदारी से इस पर सहमत हैं कि टू-गिलास सिस्टम गांव में अब बिल्कुल प्रयोग में नहीं है? वो कहते हैं पुलिस को इस पर नज़र रखनी चाहिए.

वो कहते हैं कि गांव में सभी लोगों को एक ही तरह के कप में चाय मिलनी चाहिए इससे दलितों और अन्य समूहों में समानता आएगी.

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