कर्नाटक : वो ख़ूबी जिसके दम पर मोदी को चुनौती दे रहे हैं सिद्धारमैया

  • 2 अप्रैल 2018
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एक राजनेता की सफलता इस पर निर्भर करती है कि अपने राजनीतिक करियर के दौरान आने वाले मौकों को वो कैसे भुनाते हैं.

राजनीतिक विकास को मापने वाला यह वो पुराना पैमाना है जो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक बड़ा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कर्नाटक में बड़ी चुनौती बनाता है.

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सिद्धारमैया का आगमन

एक वक्त था जब 1983 में सिद्धारमैया जनता पार्टी के दफ्तर के बाहर विधानसभा चुनाव के लिए टिकट का इंतजार कर रहे थे. तब उनके राजनीतिक गुरु थे अब्दुल नाज़ीर साब, जिन्हें बाद में पेय जल की उपलब्धता मुहैया करवाने और पंचायती राज व्यवस्था को लागू कराने की वजह से प्रसिद्धि मिली.

तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष एच डी देवेगौड़ा ने यह सुनिश्चित किया कि सिद्धारमैया को टिकट ना मिले. अपने शिष्य सिद्धारमैया की तरह ही समाजवादी पृष्ठभूमि से आने वाले नज़ीर साब ने उन्हें सलाह दी कि वो निर्दलीय चुनाव लड़ें.

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सिद्धारमैया निर्दलीय लड़े और जीते

सिद्धारमैया निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़े और जीतने के बाद रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में कर्नाटक की पहली उन्होंने गैर-कांग्रेसी सरकार का समर्थन किया.

हेगड़े ने राज्य की प्रशासनिक भाषा के रूप में कन्नड़ को इस्तेमाल करने के लिए गठित समिति की अध्यक्षता सिद्धारमैया को सौंप दी. 1985 के बाद हेगड़े ने सिद्धारमैया को अपने मंत्रालय में शामिल किया और फिर पुराने मैसूरू क्षेत्र में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए देवेगौड़ा ने भी उन्हें अपना लिया.

सिद्धारमैया की पहचान एक दक्षिणपंथी के रूप में थी. वो कुरुबा (चरवाहा) जाति के हैं जिनके जमीनी स्तर पर प्रभावशाली वोकालिग्गा समुदाय से अच्छे ताल्लुक़ात हैं. देवेगौड़ा भी इसी समुदाय से हैं. सिद्धारमैया किसानों के लिए प्रतिबद्ध वकील और स्पष्ट बोलने वाले व्यक्ति थे.

सिद्धारमैया के दोस्त से विरोधी बने पूर्व सांसद एएच विश्वनाथन ने बीबीसी को बताया, "ये मौका मिलने से ही वो नेता बने. उन्होंने हेगड़े के नेतृत्व में एक जूनियर मंत्री के रूप में काम किया, इसके बाद जेएच पटेल की कैबिनेट में मंत्री रहे और फिर देवेगौड़ा के वित्त मंत्री बने. उनका यह स्वाभाविक उत्थान था."

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अधिकारी घबराते थे सिद्धारमैया से

सिद्धारमैया के "आंकड़ों की समझ" से वित्त विभाग के कई अनुभवी अधिकारियों को बहुत अचंभा होता था. बोलने के उनके असहज अंदाज से कई अधिकारियों को घबराहट होती थी क्योंकि वो मुश्किल मुद्दों पर महत्वपूर्ण सवाल उठाते थे.

सिद्धारमैया के वित्त मंत्री बनने के बाद के शुरुआती दिनों में उनके साथ काम करने वाले एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने अपना नाम ज़ाहिर ना करने की शर्त पर कहा, "शुरू में उनके साथ काम करना बहुत मुश्किल था, लेकिन बाद में हमें एहसास हुआ कि उनका दिल साफ़ था और चीज़ों को लेकर वो बिल्कुल स्पष्ट थे. बाद के दिनों में नौकरशाही के भीतर उनकी एक प्रतिष्ठा बन गई थी."

कांग्रेस के नेताओं को सिद्धारमैया के साथ अपना पहला अनुभव तब मिला जब देवेगौड़ा ने उन्हें 2004 में कांग्रेस-जनता दल (एस) की गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बनाया.

तत्कालीन दिवंगत मुख्यमंत्री धरम सिंह ने इस संवाददाता को बताया था, "वो एक अच्छे व्यक्ति हैं और मुझे नहीं पता था कि वो आंकड़ों में इतने कुशल हैं."

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कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव

हालांकि, जब देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी ने गठबंधन सरकार को गिरा दिया और भाजपा के साथ एक और गठबंधन सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाया तो सिद्धारमैया को लगा कि जब तक वो देवेगौड़ा परिवार के साथ रहेंगे वो मुख्यमंत्री बनने में कामयाब नहीं हो सकेंगे. वो भाजपा के साथ जुड़ने को लेकर खुश नहीं थे.

ये वो पल था जब 70 के दशक में दिवंगत देवराज उर्स के करीबी सहयोगी और अनुभवी राजनेता आरएल जालप्पा के संरक्षण में कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव लाने के लिए एक पुरानी अवधारणा को पुनर्जीवित करने का विचार आया.

यह उर्स ही थे जिन्होंने अब तक सत्ता में साझेदारी कर रही समाज की दो उच्च जातियों वोकालिग्गा और लिंगायत के बीच ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों की जगह बनाई और कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास से सदा के लिए जुड़ गए.

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अल्पसंख्यकों, ओबीसी और दलितों के नेता

जालप्पा ने 'अहिंदा' बनाया, जो अल्पसंख्यकों, ओबीसी और दलितों की कन्नड़ भाषा का एक संक्षिप्त रूप है. इस मंच पर जालप्पा और सिद्धारमैया ने एक साथ कम किया और इसने कांग्रेस में सिद्धारमैया का कद बढ़ा दिया क्योंकि उन्होंने जनता दल (एस) की कुरुबा जाति के वोट को कांग्रेस के वोट में तब्दील करने के साथ ही ओबीसी और दलित वोटों को और मजबूत किया.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एम के भास्कर राव कहते हैं, "उस मंच के साथ ही सिद्धारमैया का कद वोकालिग्गा नेता देवेगौड़ा और भाजपा के लिंगायत नेता बीएस येदियुरप्पा से बड़ा हो गया."

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रसाद कहते हैं, "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिद्धारमैया आज भी इस कारण से कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता हैं कि पार्टी के भीतर कई दशकों में कांग्रेस विधायक दल के लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले नेता हैं. उन्हें गुप्त मतदान से मुख्यमंत्री चुना गया था."

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ग़रीबों, महिलाओं के लिए योजनाएं

भास्कर राव कहते हैं, "मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धारमैया अपनी "सामाजिक-आर्थिक सुधार योजनाओं" से बदलाव लाए. उन्होंने गरीबों की सबसे बुनियादी समस्या "भोजन" को उठाया. उनकी अन्न-भाग्य योजना (सात किलो चावल), क्षीर-भाग्य (स्कूल जाने वाले सभी छात्रों के लिए 150 ग्राम दूध) और इंदिरा कैंटीन ने उन्हें गरीबों का समर्थन दिलाया."

वास्तव में, सिद्धारमैया ने भूख, शिक्षा, महिला और नवजात मृत्यु दर से निपटने वाली योजनाओं में सभी जातियों और समुदायों के ग़रीबों को कवर कर "अहिंदा" के आधार का विस्तार किया है.

पिछले पांच सालों के दौरान उन्होंने अपने सभी बजट में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कुछ नया जोड़ा है. जैसे कि स्नातक होने तक मुफ़्त शिक्षा, कॉलेज छात्रों के लिए लैपटॉप, पंचायतों में महिलाओं का होना अनिवार्य और गर्भवती होने के बाद से 16 महीने तक महिलाओं के लिए पौष्टिक भोजन आदि.

लेकिन, भाजपा मानती है कि सिद्धारमैया केवल एक क्षेत्रीय नेता बन कर रह गए हैं क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस कमज़ोर हो गई है.

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Image caption कर्नाटक का नया झंडा

तीसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे सिद्धारमैया?

कर्नाटक में भाजपा के प्रवक्ता डॉ. वामन आचार्य ने कहा, "यही कारण है कि कांग्रेस आलाकमान ने वहां सब कुछ सिद्धारमैया पर ही छोड़ रखा है. वो कांग्रेस को एक क्षेत्रीय पार्टी बनाना चाहते हैं और उन मुद्दों को उठाना चाहते हैं जो राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ (जैसे राज्य के लिए एक अलग झंडे की मांग) हैं."

वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रसाद कहते हैं, "उनकी आलोचनाएं समझ में आती हैं क्योंकि कांग्रेस वैसा ही कर रही है जैसा भाजपा पहले अपने स्थानीय नेता को मज़बूत बनाने के लिए अतीत में किया करती थी. और, भाजपा वो कर रही है जैसा पहले कांग्रेस में दिल्ली से नेतृत्व किया जाता था."

सिद्धारमैया के दोस्त से विरोधी बने पूर्व सांसद एएच विश्वनाथन कहते हैं, "हमने उन्हें कांग्रेस में लाने के लिए माहौल बनाया था. मैंने उन्हें कांग्रेस में आने में मदद की तो मल्लिकार्जुन खड़गे और एसएम कृष्णा और धरम सिंह ने भी उनका समर्थन किया. लेकिन वो एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो किसी के प्रति आभार व्यक्त नहीं करते."

इसलिए, सवाल यह है कि क्या कर्नाटक की जनता सिद्धारमैया को एक बार फिर इतना वोट देगी जिससे वो तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री चुने जाएं और इस पद पर काबिज होने वाले देवराज उर्स और रामकृष्ण हेगड़े के बाद तीसरे नेता बनें.

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