नज़रिया: सरकार ने क्यों वापस लिया फ़ेक न्यूज़ पर फ़ैसला?

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फ़ेक न्यूज यानी फ़र्जी ख़बर रोकने के लिए जारी किया गया सूचना प्रसारण मंत्रालय का दो अप्रैल का आदेश महज़ कुछ घंटे ही वजूद में रहा. पत्रकारों के भारी विरोध का संकेत मिलते ही प्रधानमंत्री ने उक्त आदेश वापस लेने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय को हुक्म दे दिया.

राज्य सरकारों और भारत सरकार के विभिन्न महकमों को 'कवर' करने के अपने लगभग तीन दशकों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि मीडिया जैसे संवेदनशील मामले में पहले से चली आ रही किसी प्रशासनिक प्रक्रिया में मौलिक बदलाव का ऐसा आदेश आमतौर पर कोई मंत्रालय सिर्फ अपनी इच्छा से नहीं करता.

कोई भी कयास लगा सकता है कि आज के दौर में मुख्यमंत्री कार्यालय(सीएमओ) और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) हमारे कैबिनेट सिस्टम के बावजूद प्रशासनिक कामकाज के सर्वशक्तिमान केंद्र बनकर उभरे हैं. क्या ऐसा आदेश सिर्फ किसी एक मंत्री या सचिव की इच्छा से जारी हुआ होगा?

मेरा आकलन है कि यह आदेश उच्च-स्तरीय विमर्श या सहमति के बगैर जारी नहीं हुआ होगा. फिर वापस क्यों और कैसे हो गया?

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क्या सरकार कर रही थी पत्रकारों की आज़माइश?

प्रेस क्लब आॉफ इंडिया में मंगलवार को पत्रकारों की बड़ी सभा में कई वरिष्ठ संपादक और पत्रकार शामिल थे.

उनकी राय थी कि फ़ेक न्यूज रोकने के नाम पर देश के पत्रकारों की शासकीय मान्यता(एक्रिडिटेशन) सस्पेंड और फिर स्थायी तौर पर खत्म करने का प्रावधान करने वाला विवादास्पद आदेश मीडिया बिरादरी के भारी विरोध का संकेत मिलने के बाद वापस लिया गया.

कइयों का यह भी मानना था और स्वयं मैं भी इसी राय का हूं कि यह एक शासकीय आज़माइश थी.

भारत में प्रेस की आज़ादी का संवैधानिक दायरा वैसे भी दुनिया के कई समुन्नत या प्रौढ़ लोकतांत्रिक समाजों जैसा व्यापक और सुसंगत नहीं है. हमारे संविधान में प्रेस की आज़ादी के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है, वह नागरिक आज़ादी के दायरे में ही काम करता है.

इसके बावजूद समय-समय पर अलग-अलग सरकारों ने भारतीय प्रेस की आज़ादी या उसके अभिव्यक्ति की धार को कुंद करने के लिए तमाम तरह के क़ानूनी प्रावधान, अध्यादेश या आदेश जारी किये.

अभी कुछ ही समय पहले राजस्थान सरकार ने एक बेहद विवादास्पद विधेयक पेश किया था जिसे भारी विरोध के बाद स्थगित किया गया. एक ज़माने में कांग्रेस की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने एक बेहद निरंकुश किस्म का विधेयक पेश किया था जिसे भारी विरोध के बाद वापस लिया गया.

फ़ेक न्यूज़ रोकने के नाम पर जारी हाल के आदेश और उसकी वापसी के प्रकरण की व्याख्या से पहले यह बताना ज़रूरी है कि मौजूदा सरकार और प्रेस के रिश्ते सहज के बजाय बेहद असहज हैं.

असहज इसलिए कि प्रेस या मीडिया का बड़ा हिस्सा शासन की कमियों या विफलताओं की आलोचना, उनका पर्दाफ़ाश या समीक्षा करने से परहेज करता है. मीडिया का यह अभूतपूर्व प्रबंधन बेहद नियोजित लगता है.

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मान्यताप्राप्त पत्रकारों पर इतना गुस्सा क्यों?

हालांकि ऐसे दौर में भी हमारे मीडिया में कुछ बेहद शानदार अपवाद भी हैं, जो तमाम दबावों और तनावों के बावजूद बेहतर पत्रकारिता की कोशिश कर रहे हैं. कइयों पर सत्ता-संरचना से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद्धित लोगों ने मानहानि से लेकर आपराधिक मामले तक दर्ज कराये हैं.

पर यह बात सच है कि आज न्यूज़ चैनलों से लेकर अखबारों के एक बड़े हिस्से ने अपनी सरकार-पक्षिय छवि बना ली है. इसके पीछे उन संस्थानों के मालिकों-संपादकों की ज़्यादा भूमिका मानी जाती है.

आम पत्रकारों में इस रवैये से बेचैनी भी है. हाल के दिनों में कई अखबारों-पत्रिकाओं और चैनलों के संपादकों और एंकरों ने इस्तीफ़े तक दिए जबकि कइयों को जबरन हटाया गया. यही कारण है कि कई मीडिया समीक्षक, समाजशास्त्री या राजनीतिक टिप्पणीकार मीडिया के बड़े हिस्से के इस रवैये पर उसे व्यंग्यात्मक ढंग से 'गोदी मीडिया', 'भजन मंडली' या 'मृदंग मंडली' तक कह देते हैं.

ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि फिर सरकार ने फ़ेक न्यूज़ रोकने के लिए इस तरह के निरंकुश किस्म का आदेश जारी ही क्यों किया? वैसे भी सरकार को असहज करने वाली ख़बरें किसी बड़े मीडिया संस्थान या मान्यता प्राप्त संवाददाता से ज़्यादा न्यूज़ पोर्टल्स, वेबसाइटें या कुछेक पत्रिकाएं लिख रही हैं. सबसे ज़्यादा फ़ेक न्यूज़ सोशल मीडिया के ज़रिए आ रही है.

इसके लिए कुछ ख़ास वेबसाइटें कुख्यात हो चुकी हैं. इनमें कइयों के रिश्ते दक्षिणपंथी राजनीतिक सोच से है. फिर मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर इतना गुस्सा क्यों? मंत्रालय के आदेश में प्रावधान था कि कोई भी मान्यता प्राप्त पत्रकार फ़ेक न्यूज़ के मामले में आरोपित होते ही अपनी मान्यता कार्ड से पंद्रह दिनों के लिए वंचित हो जायेगा.

अगर वे आरोप सही पाये गये तो पहले छह महीने के लिए मान्यता ख़त्म होगी, दूसरा मामला सामने आया और आरोप सही साबित हुए तो एक साल के लिए और तीसरे आरोप के सही पाये जाने पर हमेशा के लिए पत्रकार की मान्यता(एक्रिडिटेशन) खत्म कर दी जायेगी.

इन आरोपों/शिकायतों की छानबीन और उनके सही या ग़लत होने के फ़ैसले का अधिकार प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया(पीसीआई) और न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन(एनबीए) को दिये गए. पीसीआई को प्रिंट के लिए और एनबीए को विजुअल मीडिया का नियामक बनाया गया.

अगर क़ानूनी प्रावधानों के हिसाब से देखें तो दोनों संस्थाओं को प्रेस या मीडिया से सम्बद्ध किसी संवाददाता की मान्यता खत्म करने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी स्थितियों में आमतौर पर अगर कोई सरकार अधिकार देना भी चाहे तो वह सिफ़ारिश, सुझाव या अनुशंसा का अधिकार दे सकती है.

पर ये दोनों संस्थाएं, जिसमें एनबीए स्वयं ही एक निजी संस्था है, किसी मान्यताप्राप्त पत्रकार की मान्यता कैसे ख़त्म करेगी? अगर सरकार ने इस आदेश को तत्काल वापस न लिया होता तो निश्चय ही इसे पत्रकारों के सामूहिक प्रतिरोध के अलावा क़ानूनी स्तर पर भी चुनौती दी जा सकती थी.

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Image caption दो समुदायों के बीच नफ़रत फैलाने के मक़सद से फ़र्ज़ी ख़बर फैलाने के आरोप में महेश विक्रम हेगड़े को गिरफ़्तार किया गया

कई संस्थाएं फेक़ न्यूज़ के धंधे में

एनबीए टेलीविज़न चैनलों की अपनी निजी संस्था है. उसकी अनेक सदस्य-संस्थाएं और यहां तक कि कुछ पदाधिकारी स्वयं ही ग़लत और फ़र्जी ख़बरों के आरोपी रहे हैं. कुछेक पर बाकायदा मामला चला और इन्हीं संस्थाओं के अलग से गठित प्राधिकार(एनबीएसए) ने इनके स्वामित्व या संपादकीय देख-रेख में चल रहे चैनलों को दंडित भी किया. लेकिन इनमें अधिकांश ने प्राधिकार के उक्त आदेश का पालन करने से ही इंकार कर दिया.

स्वयं अपने ही प्राधिकार के आदेश का पालन करने से इंकार करने वाले इन सदस्यों-संस्थाओं से या इनके पदाधिकारियों से मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर लगे फ़ेक न्यूज़ के आरोप की पड़ताल और सही व सुसंगत जजमेंट देने की अपेक्षा भला कैसे कर ली गई?

ऐसे में मुझे लगता है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय का दो अप्रैल को जारी आदेश ना सिर्फ क़ानूनी प्रावधानों के उलट था बल्कि प्रचंड मूर्खता से भरा हुआ भी था. उसके प्रारूप में विवेक और समझ का उपयोग बिल्कुल ही नहीं हुआ था. वह एक अहमन्य, निरंकुश और स्वेच्छाचारी मानसिकता से ग्रस्त था.

फिर ऐसा आदेश जारी ही क्यों हुआ? तथ्य और तर्क की दृष्टि से देखें तो यह बात साफ़ हो जाती है कि उक्त आदेश का मक़सद फ़ेक न्यूज़ या फ़र्जी ख़बर रोकना तो हरगिज नहीं था. वैसे भी फ़ेक न्यूज़ या फ़र्जी ख़बरों का इस वक्त देश में सबसे बड़ा स्रोत या 'कारखाना' कहां है, इसे लोग धीरे-धीरे जान गए हैं!

देश के कई निजी संस्थान या व्यक्ति-समूह फ़ेक न्यूज़ और 'हेट' न्यूज़ के धंधे में लगे हुए हैं. अभी हाल ही में कर्नाटक में एक बेहद विवादास्पद वेबसाइट ने एक जैन मुनि के घायल होने के कारण को रेखांकित करती एक फ़ेक न्यूज चलाई.

इस न्यूज़ का मकसद एक समुदाय विशेष के विरूद्ध नफ़रत फ़ैलाने और दो धार्मिक समुदायों के बीच तनाव पैदा करना था. झूठी खबर प्रकाशित करने के लिए उन्हें गिरफ़्तार किया गया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया सहित देश के सभी प्रमुख अखबारों में छपी ख़बर के मुताबिक महेश विक्रम हेगड़े नामक यह व्यक्ति 'पोस्टकार्ड न्यूज़' नाम से एक वेबसाइट चलाते हैं. उनके हज़ारों फालोअर हैं, जिनमें भारत सरकार के शीर्ष पदों पर आसीन बड़े राजनेता भी शामिल बताए गए हैं.

इसी तरह मशहूर कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश की नृशंस हत्या पर खुशी जताने वाले और सोशल मीडिया पर बेहद आपत्तिज़नक टिप्पणी लिखने वाले लोगों को सरकार के मंत्री और बड़े पदाधिकारी भी फॉलो करते रहे हैं.

हमारे आईपीसी और सीआरपीसी में ऐसे अनेक प्रावधान मौजूद हैं जिनके ज़रिए फ़ेक न्यूज़ या हेट न्यूज के कारोबारियों को गिरफ़्त में लिया जा सकता है और दंडित भी किया जा सकता है.

ताजा उदाहरण विक्रम हेगड़े का है, जिसे सरकार ने गिरफ़्त में लिया है. पहले भी कई लोगों पर कार्रवाई हुई है. फिर ऐसे आदेश की क्या जरूरत पड़ी? मुझे लगता है, यह आदेश खबरों पर अंकुश या फ़ेक न्यूज़ रोकने के लिए लाया ही नहीं गया था. इसका अभिप्राय निश्चय ही कुछ और रहा होगा.

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ख़तरा सिर्फ़ टला, ख़त्म नहीं हुआ

बहुत संभव है कि पारंपरिक मीडिया संस्थानों से सम्बद्धित या फ्रीलांस वरिष्ठ पत्रकारों को धीरे-धीरे सरकारी मान्यता से बाहर करने के लिये यह लाया गया हो. ख़ासकर ऐसे पत्रकारों को जिन्हें मौजूदा सत्ता-संरचना पसंद नहीं करती.

ज़ाहिर है कि मीडिया संस्थान में किसी पत्रकार की सरकारी मान्यता छिन जाए तो उसका संपादक या मालिक 'अब आपका कोई उपयोग नहीं' कहते हुए कभी भी उसे बाहर का रास्ता दिखा सकता है.

जहां तक फ्रीलांस वरिष्ठ पत्रकारों या स्तम्भकारों का सवाल है, उनकी मान्यता छिनने से वे सचिवालय, मंत्रालय सहित तमाम संवेदनशील जगहों पर आने-जाने से वंचित हो जायेंगे. ऐसे में सूचना से वंचित होकर उनका लेखन भी ठप्प सा हो सकता है. अगर यह प्रयोग सफ़ल हो जाता तो बहुत सारे प्रोफेशनल पत्रकारों की खाली जगहों पर अपनी पसंद के 'गोदी-पत्रकारों' के बिठाये जाने का रास्ता भी आसान होता.

वैसे भी मौजूदा सत्ता संरचना हर तरह की विविधता के विरूद्ध नज़र आ रही है. विश्वविद्यालयों में उसे अपनी पसंद के कुलपति, प्रोफेसर और पदाधिकारी पसंद हैं. कई परिसरों को सिर्फ इसलिये बर्बाद किया जा रहा है कि वहां सरकार से असहमति रखने वाले प्रोफ़ेसर अब भी ज़्यादा हैं.

मीडिया के पुराने और पारंपरिक संस्थानों के अलावा फ्रीलांस श्रेणी में आज भी विविधता और प्रोफेशनलिज्म को पसंद करने वाले पत्रकारों की संख्या ज्यादा है. हालांकि उनकी बातें आज के दौर में ज़्यादा छप नहीं पा रही हैं. जो ऐसा प्रयास करते हैं, उन्हें कई बार कोपभाजन भी बनना पड़ता है. कुछ समय पहले मान्यताप्राप्त पत्रकारों के एक समूह के 'प्रेस एसोसिएशन' के सरकारी भवन स्थित छोटे से कार्यालय कक्ष को खाली कराने का आदेश जारी हुआ था, जिसे माननीय न्यायालय ने फ़िलहाल स्थगित कर दिया.

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निरंकुश और मूर्खता भरे उक्त सरकारी आदेश की वापसी का मुझे तो एक ही मतलब दिखता कि शासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों को तत्काल संकेत मिल गया कि मीडिया में इसे लेकर बड़ा आक्रोश है और इससे माहौल खराब हो सकता है.

चुनावी-तैयारी के इस दौर में कोई भी सरकार मीडिया से 'फील-गुड' के बजाय बड़े पैमाने पर 'फील-बैड' का जोख़िम क्यों लेती. लेकिन पत्रकारों और अनेक मीडिया संस्थानों ने अगर इस आदेश पर तत्काल अपने कड़े विरोध का संकेत नहीं दिया होता तो निश्चय ही इसकी वापसी इतनी आसानी से नहीं होती.

ख़तरा फिलहाल टल गया है, पर ख़तरा ख़त्म नहीं हुआ है.

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