लंदन में मिली 1857 के एक मुस्लिम विद्रोही की खोपड़ी

Image caption ये खोपड़ी है 32 साल के एक भारतीय सैनिक की जो ब्रिटिश सरकार से बग़ावत में मारा गया था.

ब्रिटिश इतिहासकार किम वैगनर बताते हैं कि ये क़िस्सा आज से चार साल पहले का है.

2014 में जब किम वैगनर लंदन के माइल्स एंड स्थित अपने दफ़्तर में बैठे थे, तो उस वक़्त उन्हें एक दंपति का ई-मेल मिला. इस दंपति ने वैगनर को लिखा था कि उनके पास एक खोपड़ी है.

डॉक्टर वैगनर लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में ब्रिटिश साम्राज्य के दौर का इतिहास पढ़ाते हैं.

उन्होंने बताया कि अपने ई-मेल में इस दंपति ने लिखा था कि उन्हें अपने घर में इस खोपड़ी से दिक़्क़त हो रही थी. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो उसका करें तो क्या करें.

इस खोपड़ी का नीचे का जबड़ा ग़ायब था. जो बचे-खुचे दांत थे, वो ढीले पड़ गए थे.

खोपड़ी का रंग थोड़ा पीला सा हो चला था, जो उसके पुराने होने की गवाही दे रहा था.

इस खोपड़ी की सबसे ख़ास बात जो उस दंपति ने इतिहासकार किम वैगनर को बताई वो ये थी कि उस खोपड़ी की आँख के सॉकेट में हाथ से लिखा एक नोट लगा था. इस नोट में उस खोपड़ी के बारे में लिखा था कि:

बंगाल नेटिव की 46वीं रेजिमेंट के हवलदार अलम बेग की खोपड़ी, जिसे तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था. जैसा अलम बेग की रेजीमेंट के बाक़ी साथियों के साथ किया गया था. वो 1857 की गुंडागर्दी वाली बग़ावत का प्रमुख नेता था. अलम बेग ने उस किले की तरफ़ जाने वाली सड़क पर क़ब्ज़ा कर लिया था, जिसमें बग़ावत के दौरान ख़ुद को महफ़ूज़ रखने के लिए सारे यूरोपीय जा रहे थे. अलम बेग और उसके साथियों ने अचानक हमला करके डॉक्टर ग्राहम को उनकी बग्घी में उनकी बेटी के सामने ही गोली मार दी थी. उसका अगला शिकार एक मिशनरी रेवरेंड मिस्टर हंटर बने थे. रेवरेंड हंटर भी अपनी पत्नी के साथ उसी तरफ़ जा रहे थे. अलम बेग ने मिस्टर हंटर और उनकी पत्नी को मार डाला था. इसके बाद उसने उनकी बेटियों पर पहले बेइंतिहा ज़ुल्म ढाए और फिर उन्हें भी सड़क के किनारे क़त्ल कर डाला था.

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अलम बेग की उम्र क़रीब 32 बरस थी. उसकी लंबाई पांच फुट साढ़े सात इंच के क़रीब थी.

उसकी सेहत अच्छी ख़ासी थी. ये खोपड़ी 7वीं ड्रैग गार्ड्स के कैप्टन ए आर कोस्टेलो स्वदेश लाए थे. जब अलम बेग को तोप से उड़ाया गया, तो कोस्टेलो वहां मौजूद थे.

The handwritten letter that tells the story of the skull
Image caption हाथ से लिखा हुआ ये नोट इस खोपड़ी की आँख के सॉकेट के भीतर रखा हुआ था.

इस नोट से साफ़ था कि ये खोपड़ी 1857 के बागी भारतीय सैनिक अलम बेग की थी.

अलम बेग बंगाल रेजिमेंट के सिपाही थे. उन्हें 1858 में पंजाब के स्यालकोट में तोप के मुँह से बांधकर उड़ा दिया गया था.

स्यालकोट आज पाकिस्तान के पंजाब सूबे में पड़ता है. नोट से ये भी साफ़ है कि अलम बेग को उड़ाने के गवाह रहे यूरोपीय सैनिक कैप्टन कोस्टेलो ही उसकी खोपड़ी को इंग्लैंड लेकर आए थे.

ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत

नोट में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है कि आख़िर अलम बेग़ ने यूरोपीय लोगों की हत्या क्यों की थी.

1857 में भारतीय मुस्लिम और हिंदू सिपाहियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी थी.

उन्हें ख़बर मिली थी कि जो कारतूस उन्हें दिए गए थे, उनमें जानवरों की चर्बी लगी थी, जिसे चलाने के लिए उसे मुँह में लगाना पड़ता था.

1857 का ग़दर इमेज कॉपीरइट Hulton Archive/Getty Images
Image caption 1857 के ग़दर के दौरान झांसी में तैनात मेजर स्कीन ने अपनी पत्नी की मौत के बाद ख़ुद को गोली से उड़ा लिया था.

इससे सिपाहियों को अपना धर्म भ्रष्ट होने का अंदेशा था. अंग्रेजों ने भारत पर क़रीब 200 साल राज किया. भारत को 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी मिली थी.

जिस दंपति के पास ये खोपड़ी थी, वो ब्रिटेन के एसेक्स इलाक़े में रहते हैं. पति-पत्नी ने इंटरनेट पर बहुत तलाशा, मगर उन्हें अलम बेग के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

जब इस दंपति को इतिहासकार किम वैगनर के बारे में पता चला कि उन्होंने 1857 के ग़दर के बारे में क़िताब लिखी है, तो उन्होंने किम से संपर्क साधने का फ़ैसला किया.

कमरे में बंद अलमारी

किम वैगनर इस दंपति से नवंबर में मिले. उस दिन तेज़ बारिश हो रही थी. संयोग से उस दिन किम का जन्मदिन भी था.

उस दंपति ने किम को बताया कि उन्हें ये खोपड़ी एक रिश्तेदार की विरासत के तौर पर मिली थी. उस दंपति के रिश्तेदार ने ब्रिटेन के केंट शहर में द लॉर्ड क्लाइड नाम का पब 1963 में ख़रीदा था.

ये खोपड़ी उसी पब की इमारत के पीछे स्थित एक कमरे में बंद अलमारी में मिली थी.

किसी को इस बात का ठीक-ठीक पता नहीं कि आख़िर ये खोपड़ी लॉर्ड क्लाइड पब तक कैसे पहुंची. हालांकि 1963 में जब ये खोपड़ी पब में मिली थी, तब स्थानीय मीडिया ने इस खोपड़ी के मिलने को बहुत बड़ी चीज़ मिल जाने के तौर पर प्रचारित किया था.

1857 का ग़दर इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 15 जुलाई 1857. जगह कानपुर. भारतीय सैनिकों की बग़ावत का एक दृश्य.

अख़बारों ने पब के मालिकों की इस खोपड़ी के साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें भी छापी थीं. मानो उन्होंने कोई ट्रॉफ़ी जीत ली हो.

बाद में इस खोपड़ी को पब में नुमाइश के तौर पर लगा दिया गया.

बेहद हिंसक इतिहास

जब पब के मालिकों की मौत हो गई, तो पब के साथ ये खोपड़ी भी उनके वारिसों को मिली, जिसे छुपा दिया गया.

डॉक्टर किम वैगनर कहते हैं कि और इस तरह एक दिन एसेक्स के रेलवे स्टेशन पर वो एक बैग में इस खोपड़ी के साथ खड़े थे.

ये खोपड़ी उस इतिहास का हिस्सा है जिसे किम वैगनर रोज़ अपने शागिर्दों को पढ़ाते हैं. जिसके बारे में उन्होंने किताब लिखी है.

वैगनर ने कहा कि ये खोपड़ी वाक़ई में एक ट्रॉफ़ी जैसी ही है. इसका बेहद हिंसक इतिहास से ताल्लुक़ रहा है.

लेकिन, पहले किम वैगनर को ये तस्दीक़ करनी थी कि क्या वाक़ई ये खोपड़ी उसी दौर की है, जिसका ज़िक्र इसकी आंख के सॉकेट में रखे नोट में किया गया था. ये नोट भी एक अनजान शख़्स ने ही लिखा था.

लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में एक शख़्स ने खोपड़ी का मुआयना करने के बाद कहा कि ये उन्नीसवीं सदी के मध्य से ताल्लुक़ रखने वाले शख़्स की है. ये एशियाई मूल के किसी मर्द की ही खोपड़ी है, जिसकी शायद तीस के दशक में मौत हो गई होगी.

The Lord Clyde pub in Kent where the skull was discovered in 1963 इमेज कॉपीरइट DOVER KENT ARCHIVES
Image caption पब की तस्वीर

इस एक्सपर्ट ने बताया कि खोपड़ी पर हिंसक बर्ताव के कोई निशान नहीं मिलते. ये बात बहुत सामान्य सी है. जब किसी को तोप से उड़ाया जाता था, तो गोले का असर आम तौर पर उस आदमी के पेट पर पड़ता था.

मंगल पांडे एक अपवाद

म्यूज़ियम के एक्सपर्ट ने बताया कि खोपड़ी पर कटने के कुछ निशान हैं. ये शायद इसलिए हैं क्योंकि इस खोपड़ी को उस इंसान के मरने के बाद उसकी लाश से या तो काटकर अलग किया गया, या फिर कीड़े-मकोड़ों के काटने का भी ये निशान हो सकता है.

ब्रिटिश राज के इतिहास में किसी ख़ास सिपाही को लेकर कम ही दस्तावेज़ मिलते हैं. मंगल पांडे जैसे कुछ लोग इसका अपवाद हैं.

मंगल पांडे ही वो सिपाही थे जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में 29 मार्च को कोलकाता में एक ब्रिटिश अधिकारी पर पहली गोली चलाई थी.

इसके बाद ही समूचे उत्तर भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत हो गई थी.

कोई वारिस नहीं आया

उस ब्रिटिश काल के किसी भी दस्तावेज़ में अलम बेग का ज़िक्र नहीं मिलता. न ही किसी रिपोर्ट में, न ही किसी के जीवन वृत्तांत में, न ही उस दौर में चले मुक़दमों के दस्तावेज़ों में.

1857 का ग़दर इमेज कॉपीरइट Felice Beato/Getty Images
Image caption भारतीय सैनिकों की क्रांति को विफल करने के बाद ब्रिटिश कंपनी ने बाग़ी सैनिकों को 1858 में फांसी दे दी थी.

भारत हो या ब्रिटेन, कहीं भी अलम बेग के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती. न ही अलम बेग के किसी वारिस का ज़िक्र मिलता है, जिसने इस खोपड़ी को लौटाने की मांग की हो.

लेकिन, पड़ताल से कुछ नई चीज़ें ज़रूर पता चलीं.

डॉक्टर वैगनर को अलम बेग के शिकार लोगों के अपने परिजनों को लिखे कुछ ख़त मिले. इतिहास की कड़ियां जोड़ने में उस दौर के एक अमरीकी मिशनरी एंड्र्यू गॉर्डन के ख़ुतूत ने काफ़ी मदद की.

खोपड़ी का ज़िक्र

गॉर्डन 1857 के ग़दर के दौरान और उसके बाद स्यालकोट में रहते थे. वो डॉक्टर ग्राहम और हंटर दंपति, दोनों को निजी तौर पर जानते थे.

दोनों ही अलम बेग के हाथों मारे गए थे. जब अलम बेग को तोप से उड़ाया गया, तो उस वक़्त एंड्रूय गॉर्डन भी मौजूद थे.

इसके अलावा ब्रिटेन से छपने वाले एक अख़बार 'द स्फ़ेयर' के 1911 के एडिशन मे भी लंदन के व्हाइटहॉल में लगी एक नुमाइश के हवाले से इस खोपड़ी का ज़िक्र मिला. इसमें लिखा था:

हमें बताया गया है कि रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन के व्हाइटहाल स्थित म्यूज़ियम में हिंदुस्तान के हिंसक ग़दर की याद दिलाने वाला एक स्मृति चिह्न रखा गया है. ये एक सिपाही की खोपड़ी है, जो 49वीं बंगाल रेजीमेंट से ताल्लुक़ रखता था. जिसे 1858 में 18 दूसरे लोगों के साथ तोप से उड़ा दिया गया था. जैसा कि हम देख रहे हैं कि अब इस खोपड़ी को सिगार बॉक्स बना दिया गया है.

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अख़बार ने लिखा कि, 'हालांकि हम इस खोपड़ी से उस ख़राब दौर को समझ सकते हैं. उस दौर की हिंसा और फिर उसे दबाने के लिए जो ज़ुल्म किए गए, उन्हें समझ सकते हैं. फिर भी ये ग़लत नहीं है कि हमारी बदले की भावना से की गई ऐसी कार्रवाई का एक सबूत, जिसे आज के दौर में क़तई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, वो एक महान सार्वजनिक जगह पर नुमाइश के तौर पर रखा गया है'.

A scene from the battle at Kanpur where an entire British garrison, including women and children, was wiped out during the Indian Mutiny इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 1857 के ग़दर पर बना एक चित्र

सबूतों की भारी कमी झेल रहे डॉक्टर वैगनर ने अलम बेग के बारे मे और तहकीकात करनी शुरू कर दी.

उन्होंने लंदन और दिल्ली के पुराने दस्तावेज़ खंगाल डाले. वैगनर ने पाकिस्तान के स्यालकोट शहर का भी दौरा किया, ताकि वो उस जगह के बारे में पता लगा सकें, जहां 1857 की जुलाई में चार दिनों तक त्रिमू घाट की लड़ाई लड़ी गई थी.

इतिहास की कड़ियों को जोड़ा

इस लड़ाई के दौरान ही स्यालकोट के बाग़ियों को जनरल निकोलसन ने हराया था.

वैगनर ने बाग़ियों के खतों, अर्ज़ियों, घोषणाओं और बयानों को खंगाला. ये 1857 के ग़दर के बाद के दौर के थे. उन्होंने उस दौर में छपने वाले अख़बारों और पत्रिकाओं की पड़ताल की. किताबें पढ़ीं.

वैगनर कहते हैं कि इस कहानी के बारे में ब्रिटेन से लेकर भारत-पाकिस्तान तक काफी रिसर्च करने के बाद उन्होंने इतिहास की कड़ियों को जोड़ा. तब उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि ये खोपड़ी सिर्फ अलम बेग की खोपड़ी नहीं, हिंदुस्तान के इतिहास का बेहद अहम हिस्सा है, जिसे बताया जाना चाहिए.

'जासूसी नॉवेल'

वैगनर के रिसर्च का नतीजा है उनकी नई किताब, जिसका नाम है, 'द स्कल ऑफ़ अलम बेग'. ये किताब ब्रिटिश भारत के इतिहास के एक अहम दौर को बयां करती है.

ये उन्नीसवीं सदी के सबसे बड़े साम्राज्य विरोधी ग़दर के बारे में हमें नई रौशनी दिखाती है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास के एसोसिएट प्रोफ़ेसर यास्मीन ख़ान कहते हैं कि ये किताब इतिहास की नहीं, बल्कि एक जासूसी उपन्यास जैसी लगती है. फिर भी इसकी मदद से हमें ब्रिटिश राज को समझने में काफ़ी मदद मिलती है. उस दौर की हिंसा का सबब हमें मालूम होता है.

डॉक्टर किम वैगनर कहते हैं कि उनकी किताब अलम बेग को वो सम्मान देने की कोशिश है, जिसके वो हक़दार थे. जो उन्हें नहीं दिया गया. ये ब्रिटिश भारत के बेहद नाटकीय दौर की कहानी है.

वैगनर कहते हैं, 'मुझे उम्मीद है कि मेरी कोशिशों से 160 बरस बाद ही सही, मगर आख़िर में अलम बेग की आत्मा को शांति तो मिलेगी'.

Historian Kim Wagner
Image caption किम वैगनर कहते हैं कि अलम बेग़ की कहानी का आख़िरी सफ़ा लिखा जाना अभी बाक़ी है

डॉक्टर वैगनर के मुताबिक़, अलम बेग का सही नाम अलीम बेग था. वो उत्तर भारत के एक सुन्नी मुसलमान थे. बंगाल रेजीमेंट के लिए यूपी के शहर कानपुर में भर्तियां की गई थीं. सो, शायद अलीम बेग भी इसी इलाक़े से ताल्लुक़ रखते थे.

यूं तो बंगाल रेजीमेंट में हिंदुओं की तादाद ज़्यादा थी, मगर इसमें बीस फ़ीसद मुसलमान सैनिक भी थे.

बेग के हवाले सैनिकों की एक पूरी टुकड़ी थी. उनके ज़िम्मे कैम्प की निगरानी का सख़्त काम था. इसके अलावा वो चिट्ठियां ले जाने का काम भी करते थे और बंगाल रेजीमेंट के अफ़सरों के चपरासी का रोल भी निभाते थे.

1857 के ग़दर के बाद वो अंग्रेज़ों की पकड़ से भाग निकले. क़रीब एक साल बाद अलीम बेग को पकड़ा गया था. फिर उन्हें तोप से उड़ा दिया गया.

खोपड़ी की सही जगह

जिस कैप्टन कोस्टेलो के बारे में ये माना जा रहा था कि वो अलीम बेग को तोप से उड़ाए जाने के दौरान मौजूद था, उसका पूरा नाम था रॉबर्ट जॉर्ज कोस्टेलो.

डॉक्टर वैगनर मानते हैं कि कोस्टेलो ही अलीम बेग़ की खोपड़ी को ब्रिटेन लेकर आया. कोस्टेलो, आयरलैंड में पैदा हुआ था. उसे 1857 में भारत भेजा गया था.

दस महीने बाद वो रिटायर होकर भारत से पानी के एक जहाज़ पर सवार होकर अक्टूबर, 1858 में ब्रिटेन के लिए रवाना हुआ था. क़रीब एक महीने बाद वो ब्रिटेन के साउथैम्पटन बंदरगाह पहुंचा था.

डॉक्टर वैगनर कहते हैं कि, 'मेरे रिसर्च का मक़सद है कि किसी भी तरह अलीम बेग की खोपड़ी को स्वदेश लौटाया जाए'.

वैगनर के मुताबिक़, अब तक उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि किसी ने अलीम बेग की खोपड़ी पर दावा किया है. लेकिन वैगनर लगातार भारतीय संस्थानों के संपर्क में हैं. भारत में ब्रिटिश उच्चायोग भी इस बातचीत का हिस्सा है.

डॉक्टर वैगनर कहते हैं, 'मेरी पुरज़ोर कोशिश है कि अलम बेग की स्वदेश वापसी पर कोई राजनीति न हो. न ही मैं चाहता हूँ कि लोग इसे एक म्यूज़ियम के बक्से में रखकर भूल जाएं'.

The site of the battle on the island of the Ravi river on the India-Pakistan border
Image caption डॉक्टर वैगनर मानते हैं कि अलम बेग को रावी नदी के बीच में स्थित उस जज़ीरे पर दफ़्न किया जाना चाहिए, जो भारत और पाकिस्तान के बीच में पड़ता है.

वैगनर को उम्मीद है कि आने वाले वक़्त में अलम बेग की खोपड़ी सम्मानजनक तरीक़े से स्वदेश लाई जाएगी, जहाँ उसका रीति-रिवाज़ के मुताबिक़ अंतिम संस्कार होगा.

वैगनर मानते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो अलम बेग को रावी नदी के बीच में स्थित उस जज़ीरे पर दफ़्न किया जाना चाहिए, जो भारत और पाकिस्तान के बीच में पड़ता है.

ये वही जगह है, जहाँ पर पहले दिन की जंग के बाद अलम बेग और उसके साथियों ने पनाह ली थी. आज ये जगह, भारत और पाकिस्तान की सरहद है.

वैगनर कहते हैं, 'आखिरी फ़ैसला मेरा नहीं होगा. मगर जो भी हो, अलम बेग के क़िस्से का आख़िरी सफ़ा लिखा जाना अभी बाक़ी है'.

फ़ोटोग्राफ़: किम वैगनर

(इस कहानी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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