इस सिख संप्रदाय ने कहा- 'मंदिर वहीं बनाएँगे'

  • प्रभु दयाल
  • बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
मोहन भागवत और दिलीप सिंह

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नामधारी सिख संप्रदाय के प्रमुख डेरे भैनी साहब से अलग सुर रखने वाले नेता दिलीप सिंह ने घोषणा की है कि वे और उनके अनुयायी राम मंदिर निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएँगे.

वे सिरसा में नामधारियों के दिलीप सिंह गुट और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कराए गए हिंदू-सिख एकता कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

इस कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी शामिल हुए और हिंदू-सिख एकता की पैरवी की.

बाबरी मस्जिद की बात करते हुए दिलीप सिंह ने कहा, "मुग़लों ने तीन बार स्वर्ण मंदिर को गिराया था. मस्जिद को गिराना ग़लत नहीं है. हम राम मंदिर बनाएँगे, ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. हम राष्ट्रवादी हैं."

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी. वर्षों तक कई अदालतों में ये मामला चला. फ़िलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

'नहीं मिट सकता अस्तित्व'

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दिलीप सिंह ने नामधारी इतिहास की बात करते हुए कहा कि इस समाज ने अंग्रेज़ साम्राज्य से टक्कर ली है. उन्होंने कहा कि सिख एक पंथ है और इसका अस्तित्व कभी मिट नहीं सकता.

उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और पंजाबी हमारी मातृभाषा है.

इस संबोधन में दिलीप सिंह ने कई सवाल भी खड़े किए. उन्होंने कहा कि हिंदू-सिख एकता की आवश्यकता क्यों है. क्या हिंदू और सिख अलग-अलग धर्म हैं? उनका कहना था कि कुछ लोग हिंदू और सिखों में ज़हर घोल रहे हैं.

वे भगवान रामचंद्र को हिंदू और गुरु नानकदेव को सिख धर्म के साथ जोड़कर देख रहे हैं. लेकिन उन्होंने कभी भी ख़ुद को हिंदू और सिखों को अलग-अलग नहीं किया.

भागवत ने की राष्ट्रनिर्माण की बात

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इसलिए हिंदू और सिखों की एकता के कार्य के लिए वे सक्रिय हुए हैं. उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या सारे राष्ट्र को एक करना ग़लत है?

दिलीप सिंह का कहना था कि जोड़ना धर्म होता है और तोड़ना अधर्म. उन्होंने कहा, "मेरी ओर कुछ उंगलियाँ उठेंगी कि मैं आरएसएस को ख़ुश करने के लिए यह सम्मेलन करवा रहा हूँ, लेकिन मैं उन उंगलियों से डरने वाला नहीं हूँ."

इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारी संस्कृति सबको जोड़ने वाली है और दुनिया के लिए मार्गदर्शक है.

मोहन भागवत का कहना था कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए हमें मिलकर लड़ना होगा. उन्होंने अपने संबोधन में अपने रास्ते पर चलने और दूसरे का सम्मान करने की बात कही.

उनका कहना था कि आपसी मतभेदों को भुलाकर राष्ट्रनिर्माण में जुटना होगा.

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