भाजपा: अटल-आडवाणी से लेकर मोदी-शाह तक

  • प्रदीप सिंह
  • वरिष्ठ पत्रकार
मोदी के साथ अमित शाह

'अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा'- आज से सैंतीस साल पहले भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस अधिवेशन को संबोधित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी का यह आखिरी उद्घोष था.

कमल तो खिला पर उसे खिलाने वालों का राजनीतिक जीवन अस्ताचल की ओर है. एक नया नेतृत्व पार्टी को एक के बाद एक चुनावी जीत दिला रहा है.

शारीरिक रूप से अशक्त और 2005 से सक्रिय राजनीति से दूर होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी दोनों पीढ़ियों के बीच सेतु बन हुए हैं. अशक्त वाजपेयी भी पुरानी पीढ़ी के सबसे सशक्त व्यक्तित्व हैं.

जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन करते हुए वाजपेयी ने पार्टी की वैचारिक दिशा बदलने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राज़ी कर लिया था. इसलिए नवगठित भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को अपनी विचारधारा के रूप में स्वीकार किया.

'हिंदू' की जगह चुना 'भारतीय' शब्द

अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन सर संघचालक बाला साहब देवरस के सामने एक और मांग रखी. उनकी मांग थी कि संघ हिंदू की जगह भारतीय शब्द का प्रयोग करे. उनकी मांग पर देवरस ने कहा कि भारतीय शब्द है तो बहुत अच्छा, लेकिन हिंदू बोलने में हीनता का बोध क्यों?

जनसंघ से बरास्ते जनता पार्टी बनी भाजपा ने पहली बार कायिक (आर्गेनिक) विकास के साथ अजैव (इनआर्गेनिक) विकास का रास्ता स्वीकार किया. नतीजा यह हुआ कि एमसी छागला, शांति भूषण, राम जेठमलानी, सिकंदर बख्त, सुषमा स्वराज और जसवंत सिंह जैसे बहुत से नेता पार्टी में शरीक़ हुए जिनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नहीं थी.

भाजपा को बड़ा झटका

नवजात पार्टी को गठन के चार साल में ही ऐसा झटका लगा कि सब कुछ बदल गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. उसके बाद दिसम्बर 1984 में लोकसभा चुनाव हुए.

इस चुनाव में संघ के सामने एक दुविधा थी, भाजपा को चुने या हिंदुत्व को. उसने हिंदुत्व को चुना. भाजपा को सिर्फ़ दो सीटें मिलीं.

लोकसभा चुनाव के दो साल बीतते-बीतते भाजपा ने मध्यमार्ग छोड़कर फिर से दक्षिणमार्गी होने का फैसला किया और 1986 में पार्टी ने अपने सबसे लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी को अध्यक्ष पद से हटा दिया. उसने एकात्म मानववाद को फिर से अपना लिया. इसके ध्वजवाहक बने लाल कृष्ण आडवाणी.

आडवाणी जन नेता नहीं थे. पर हिमाचल के पालमपुर में 1988 में अयोध्या आंदोलन में शामिल होने का फ़ैसला और फिर सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के कार्यक्रम से मिली लोकप्रियता ने उन्हें संघ और पार्टी की नज़र में अटल से आगे कर दिया.

इसके साथ ही अब तक वाजपेयी के सहायक रहे आडवाणी के उनके प्रतिद्वन्द्वी बनने का सिलसिला शुरू हो गया. वाजपेयी पार्टी में अलग-थलग पड़ गए. छह दिसम्बर को अयोध्या में विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) गिरने के बाद पार्टी और संघ परिवार को फिर वाजपेयी की याद आई. पर यह बदलाव अस्थाई रहा.

किस्मत ने नहीं दिया आडवाणी का साथ

आडवाणी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आ गए. मुझे याद है 1994 में अटल ने एक इंटरव्यू के बाद अनौपचारिक बातचीत में आडवाणी का जिक्र करते हुए मुझसे कहा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए गोटियां बिछाई जा रही हैं.

लेकिन किस्मत ने आडवाणी का साथ नहीं दिया. उनका नाम जैन हवाला डायरी में आ गया. उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया और कहा कि बरी होने के बाद ही संसद में आएंगे. आडवाणी को पता था कि 1996 का लोकसभा चुनाव वो नहीं लड़ सकेंगे. इसलिए नवम्बर 1995 में मुम्बई अधिवेशन में उन्होंने वाजपेयी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. वो दिन और आज का दिन प्रधानमंत्री पद आडवाणी के लिए मृगतृष्णा ही साबित हुआ.

प्रधानमंत्री का पद तो आडवाणी को नहीं मिला पर पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना की मज़ार पर जाकर उन्होंने जो कहा उससे संघ परिवार और पार्टी कार्यकर्ताओं की नज़रों से वे उतर गए.

उसके बाद आडवाणी पार्टी में तो रहे, लेकिन अलग-थलग पड़ गए. हालांकि आडवाणी इस वास्तविकता को कभी स्वीकार नहीं कर पाए.

मोदी से मात खा गए आडवाणी

केंद्र में नेतृत्व के शून्य को नरेन्द्र मोदी ने भांप लिया. 2009 में उन्होंने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने दिया. 2012 में गुजरात में सद्भावना यात्रा से नरेन्द्र मोदी का दिल्ली अभियान शुरू हो गया था. आडवाणी उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो क्या चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष भी बनाने को तैयार नहीं थे.

कभी भाजपा के सबसे बड़े राजनीतिक रणनीतिकार रहे लाल कृष्ण आडवाणी बदलते समय की आहट नहीं पहचान पाए. मोदी के प्रति पार्टी के अंदर और बाहर समर्थन हवा से आंधी बन चुका था. आडवाणी अपने आखिरी रणनीतिक युद्ध में कभी उनके सारथी रहे नरेन्द्र मोदी से मात खा गए.

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही भाजपा की तीन धरोहर अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर के युग की समाप्ति हो गई. यह भाजपा का मोदी युग है. पार्टी का नेता ही नहीं संगठन, चुनाव लड़ने का तरीका, सरकार चलाने का तौर तरीका, फ़ैसले लेने और उन्हें शिद्दत से लागू करने की तत्तपरता, पार्टी की नई पहचना बन गई है.

अब अगर आप मोदी विरोधी हैं तो कह सकते हैं कि आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को जबरन वानप्रस्थी बना दिया गया. वरना आप प्रकृति के इस सिद्धांत को भी मान सकते हैं कि हर अच्छी चीज कभी तो अंत आता ही है.

समय से रिटायर हो गए अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के लिए अब भी नायक हैं. उनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट के सुनील गावस्कर से कर सकते हैं. आडवाणी और जोशी को आप कपिल देव मान सकते हैं, जिन्हें एक तरह से रिटायर ही करना पड़ा.

नई भाजपा मोदी-शाह की भाजपा है

2014 के बाद की भाजपा मोदी और शाह की भाजपा है. यहां फ़ैसले पार्टी नहीं नेता लेता है और पार्टी उसे लागू करती है. इसे आप सत्ता का केंद्रीयकरण भी कह सकते हैं.

पर जब तक कामयाबी मिल रही है किसी की बोलने की हिम्मत नहीं है. सबको पता है कि वोट एक ही आदमी के नाम पर मिल रहा है और वह हैं, नरेन्द्र मोदी.

यहां अपने विरोधी के लिए किसी तरह की माया-ममता नहीं दिखाई जाती. यह जोड़ी अपने पुराने नेताओं की तरह खरामा-खरामा चलने में नहीं दौड़ने में यकीन करती है.

चार साल में छह राज्यों से इक्कीस राज्यों में भाजपा अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता में है. आज भाजपा उस ऊंचाई पर है जहां पहुंचने का उसके संस्थापकों ने सपना भी नहीं देखा होगा.

शिखर पर पहुंचना जितना कठिन होता है उससे ज्यादा मुश्किल उस पर टिके रहना होता है. 2019 में इसी शिखर पर टिके रहने की चुनौती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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