सलमान ख़ान की ज़मानत याचिका क़तार में क्यों नहीं लगी?

  • 6 अप्रैल 2018
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सलमान खान को ब्लैकबक (काला हिरण) शिकार मामले में जोधपुर सेशन कोर्ट ने गुरुवार को पांच साल की सज़ा सुनाई. लेकिन शुक्रवार से ही उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई.

लेकिन कोर्ट की ज़मानत के लिए तेज़ी को देखते हुए एक बहस पैदा होती है कि क्या न्यायिक प्रक्रिया में इतनी ही तेज़ी किसी आम नागरिक को भी मयस्सर होती.

जज की मर्ज़ी पर होता है निर्भर?

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील आलोक कुमार कहते हैं कि ये बात सही है कि देश की तमाम अदालतों में बहुत से मामले लंबित रहते हैं जिसमें ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई भी शामिल है. लेकिन अगर एक वकील के नाते कहा जाए तो इस असमानता के पीछे कुछ वजहें हैं.

वे बताते हैं कि अगर कोई होशियार वकील होता है तो वो मामले की सुनवाई से पहले ही ज़मानत याचिका के काग़ज़ बना कर रख लेता है. सज़ा हुई तो तुरंत याचिका दाख़िल भी कर देते हैं. लेकिन आमतौर पर वकील पहले सुनवाई का इंतज़ार करते हैं और फिर सोचते हैं कि फ़ैसला पढ़कर ही ज़मानत के लिए अपील करेंगे.

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"अगर सवाल ये है कि क्या जज की शक्ति है कि वो उसी दिन या अगले दिन या एक हफ़्ते बाद ज़मानत याचिका सुने तो इसका जवाब है हां. इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल कभी किया जाता है और कभी नहीं किया जाता है."

आलोक कुमार की बात इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुने गए अमरावती बनाम उत्तर प्रदेश सरकार(2004) के फ़ैसले से सही साबित होती है. इस फ़ैसले में कहा गया कि हाई कोर्ट को सामान्य तौर पर किसी निचली अदालत को आदेश नहीं देना चाहिए कि वो ज़मानत याचिका पर उसी दिन फ़ैसला दे क्योंकि ये कोर्ट के न्यायिक विशेषाधिकार में दख़ल देना होगा.

सीआरपीसी के सेक्शन 437 और सेक्शन 439 के तहत ये मजिस्ट्रेट का विशेषाधिकार है कि वह याचिका लगाए जाने के दिन ही उसे ज़मानत दे दे और अगर वह उसी दिन फ़ैसला नहीं देना चाहता तो लिखित में वजह रिकॉर्ड में रखे.

क्या जजों को 'एसीआर' की चिंता सताती है?

एक और दिलचस्प बात आलोक बताते हैं, "कई बार ज़िला कोर्ट किसी मामले में ज़मानत पर सुनवाई के लिए इसलिए भी इनकार कर देते हैं कि अगर हाई कोर्ट ने उनके उलट फ़ैसला कर दिया तो उनका एसीआर ख़राब हो जाएगा. एसीआर (एन्यूअल कांफिडेंशियल रिपोर्ट) एक सालाना रिपोर्ट होती है जो जजों की पदोन्नति पर प्रभाव डालती है."

आलोक कुमार कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में भी ज़मानत याचिकाओं के निपटारे में असमानता है. कई बार देखा गया कि एक ही तरह के मामलों में किसी एक में 4 साल तक ज़मानत नहीं मिली जबकि किसी में 4 महीने में मिल गई.

"ऐसे कुछ उदाहरण भी हैं जहां ज़िला कोर्ट जज या हाई कोर्ट जज ने किसी ग़रीब या साधनविहीन व्यक्ति के मामले को तरजीह दी. ऐसा भी होता है कि किसी वरिष्ठ वकील की याचिका पर जल्दी सुनवाई कर दी और किसी जूनियर वकील को कहा कि पहले ही हज़ारों मामले पड़े हैं कोर्ट के पास."

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आम लोगों के लिए कैसे होता है न्याय

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण मानते हैं कि सलमान ख़ान के मामले में प्रक्रिया से अलग कुछ नहीं हो रहा है. ज़मानत याचिका पर जल्द सुनवाई होनी ही चाहिए.

वो कहते हैं, "दरअसल किसी भी ज़मानत याचिका पर सुनवाई जल्दी ही होनी चाहिए. लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि ग़रीब और हाशिए पर रह रहे लोगों को ये नसीब नहीं हो पाता. ये तो सिस्टम ही ऐसा बन गया है हमारा. वीआईपी लोगों के पास बड़े वकील होते हैं, पैसा होता है, प्रभाव होता है तो उनके लिए न्याय सुलभ है."

वीआईपी लोगों के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दो टिप्पणियां न्यायिक सिस्टम के बारे में काफ़ी कुछ ज़ाहिर कर देती हैं.

2013 में सुप्रीम कोर्ट के जज बी एस चौहान ने कहा था कि वीआईपी लोगों के वकील कोर्ट का ज़्यादा समय ले लेते हैं जिससे आम लोगों के मामलों के लिए वक्त कम रह जाता है. जस्टिस चौहान और जस्टिस एस ए बोबड़े इशरत जहां एनकाउंटर मामले में गुजरात पुलिस अफ़सर पीपी पांडे की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.

उन्होंने कहा था, "मैं दावे से कह सकता हूं कि आम नागरिकों को हमारा समय बहुत कम मिल पाता है. ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. हम अग्रिम ज़मानत और समन जारी करने के मामले देख रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की हालत ट्रायल कोर्ट जैसी हो गई है."

वीआईपी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट 2014 में भी टिप्पणी कर चुका है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की ज़मानत को स्वास्थ्य कारणों से बढ़ाए जाने की याचिका पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी.

एच एल दत्तू और एस जे मुखोपाध्याय की बेंच ने कहा था,"जैसे ही कोई बड़ा व्यक्ति दोषी सिद्ध होता है, वो अस्पताल जाना चाहता है. सिस्टम फ़ेल हो जाएगा अगर हम इसे बढ़ावा देंगे."

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'जज पर भी होता है दबाव'

वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े कहते हैं, "सलमान ख़ान की ज़मानत के केस में अगर कोर्ट जल्द सुनवाई कर रहा है तो ये सामान्य है. ये कोर्ट का विशेषाधिकार है. कई बार जज पर भी एक दबाव होता है कि कोई मामला जिसमें मीडिया और लोगों की दिलचस्पी बहुत ज़्यादा होती है तो जज उसे जल्दी से निबटाने की सोचता है."

2009 में जस्टिस मार्कंडेय काटजू और दीपक वर्मा की बेंच ने अंतरिम ज़मानत को लेकर स्पष्ट किया था, "अगर कोई व्यक्ति ज़मानत के लिए याचिका लगाता है तो कोर्ट सामान्य तौर पर उस याचिका पर कुछ दिन बाद सुनवाई करता है ताकि कोर्ट पुलिस की केस डायरी देख सके और तब तक याचिकाकर्ता को जेल में रहना पड़ता है.

हो सकता है कि याचिकाकर्ता को बाद में ज़मानत मिल भी जाए लेकिन तब तक समाज में तो उसके मान-सम्मान को ठेस पहुंच चुकी होती है. किसी व्यक्ति का सम्मान उसके लिए बहुत कीमती होता है और आर्टिकल 21 के तहत उसका अधिकार भी. ये कोर्ट पर निर्भर करता है कि वो अंतरिम ज़मानत दे या ना दे लेकिन उसके पास विशेषाधिकार तो है."

ये स्पष्ट है कि कोर्ट के पास ज़मानत को लेकर विशेषाधिकार है लेकिन वरिष्ठ वकीलों से बातचीत के आधार पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस विशेषाधिकार के इस्तेमाल में असमानता भी है.

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