सलमान मामले के जज समेत 87 जजों का तबादला किसने किया?

  • 7 अप्रैल 2018
सलमान ख़ान इमेज कॉपीरइट Getty Images

काले हिरण के शिकार मामले में दोषी ठहराए गए बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान की ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे जज का तबादला हो गया है.

शुक्रवार को राजस्थान हाई कोर्ट की वेबसाइट पर डाले गए ट्रांसफ़र आदेश के मुताबिक, जोधपुर के डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रविंद्र कुमार जोशी का तबादला सिरोही हो गया है. उनकी जगह चंद्र शेखर शर्मा को जोधपुर ट्रांसफ़र किया गया है.

रविंद्र कुमार जोशी इकलौते नहीं हैं जिनका तबादला हुआ है. कुल 87 जजों के तबादले हुए हैं, जिनमें जज जोशी भी शामिल हैं.

इमेज कॉपीरइट hcraj.nic.in
Image caption तबादला आदेश की कॉपी का स्क्रीनशॉट

जोधपुर में मौजूद स्थानीय पत्रकार नारायण बारेठ ने बताया कि सलमान की ज़मानत पर शनिवार को सुनवाई होगी या नहीं, यह जज जोशी पर निर्भर करेगा.

उन्होंने कहा, "सामान्यत: तबादलों के बाद जज मामलों की सुनवाई नहीं करते हैं. अब इसका इंतज़ार है कि जज जोशी सलमान की ज़मानत पर सुनवाई करते हैं या नहीं. अगर वह सुनवाई नहीं करते तो नए जज के कार्यभार संभालने तक इसमें दो-तीन दिन और लग सकते हैं."

जब फ़िल्म स्टार सलमान की ज़मानत की सुनवाई पर सभी की नज़रें हैं, ऐसे में जज का ट्रांसफ़र कैसे और क्यों हुआ, इसे लेकर भी लोगों में उत्सुकता है.

तो आपको बताते हैं कि भारत में ज़िला जजों के तबादले कौन करता है और इसकी प्रक्रिया और आधार क्या हैं?

कौन करता है तबादले

इमेज कॉपीरइट hcraj.nic.in
Image caption राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर

भारत में ज़िला अदालतें ज़िला स्तर पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए काम करती हैं. ये अदालतें प्रशासनिक तौर पर उस प्रदेश के हाई कोर्ट के अंतर्गत और उसके न्यायिक नियंत्रण में होती हैं, जिस प्रदेश में वह ज़िला आता है.

यानी जज जोशी समेत इन 87 जजों का तबादला राजस्थान हाईकोर्ट ने किया है. तबादले पर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के हस्ताक्षर होते हैं जो इस संबंध में प्रशासनिक अथॉरिटी होते हैं. लेकिन तबादलों का फैसला हाई कोर्ट की ट्रांसफर कमेटी लेती है, जिसमें हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज शामिल होते हैं.

ट्रांसफर कमेटी में कितने और कौन से जज शामिल होंगे, इसका फैसला हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस लेते हैं.

ज़िला अदालत अथवा सत्र अदालत किसी ज़िले की सर्वोच्च अदालत होती है. ज़िला स्तर के जज प्रदेश सरकार के कर्मचारी नहीं होते, हालांकि उनका वेतन प्रदेश सरकार के ख़ज़ाने से जाता है. लेकिन उनका वेतनमान न्यायिक वेतन आयोग तय करता है, प्रदेश सरकार नहीं.

क्या प्रदेश सरकार की भूमिका है?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह बताते हैं कि प्रदेश सरकार किसी ज़िला या सत्र जज के तबादले की सिफारिश कर सकती है, लेकिन प्रदेश का न्यायिक प्रमुख हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस होता है और यह उन पर निर्भर है कि वह उस सिफारिश पर विचार करें या नहीं.

चूंकि न्यायपालिका एक स्वतंत्र संस्था है, इसलिए जजों के तबादले में सरकार की सीधी कोई भूमिका नहीं होती. सूरत सिंह बताते हैं, "हालांकि 1985 से पहले ऐसा नहीं था. तब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के तबादले भी सरकार ही करती थी. लेकिन 1992 में शुरू होकर 1998 में ख़त्म हुए 'थ्री जजेज़ केस' के नतीजे के तौर पर पांच जजों की कोलेजियम व्यवस्था बनी. तब से यह शक्ति न्यायपालिका के हाथों में आ गई है."

ट्रांसफर के आधार

इमेज कॉपीरइट hcraj.nic.in
Image caption जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट का नया भवन

किसी ज़िला जज के ट्रांसफर की सामान्यत: दो वजह होती हैं. एक, रुटीन प्रक्रिया और दूसरी, परफॉर्मेंस. आम तौर अगर कोई जज कहीं पर दो-तीन साल बिता चुके हैं तो उनका तबादला कर दिया जाता है.

डॉ. सूरत सिंह बताते हैं कि हर प्रदेश में ज़िला और सत्र जजों का सालाना तबादला होता है, जिसमें बड़े स्तर पर तबादले होते हैं. सिस्टम की एकरूपता को ध्यान में रखते हुए ज़्यादातर प्रदेशों में ये तबादले इसी सीज़न में होते हैं.

इमेज कॉपीरइट hcraj.nic.in
Image caption तबादला आदेश की कॉपी का स्क्रीनशॉट

हालांकि कई बार ऐसा होता है कि जब जज ख़ुद तबादले के लिए अपने पसंद की तीन जगहों के नाम देते हैं. अगर जज की दी हुई तीन वरीयताओं वाली जगहों में से कोई एक उन्हें मिल जाती है तो उसे 'ऑन रिक्वेस्ट' तबादला कहा जाता है और आदेश की कॉपी में इसका ज़िक्र भी होता है.

हालांकि हाईकोर्ट की ट्रांसफर कमेटी सभी जजों की 'ऑन रिक्वेस्ट' अनुरोध मानने की गारंटी नहीं लेती.

ज़िला और सत्र जजों के काम

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ज़िले स्तर का सर्वोच्च जज ज़िला एवं सत्र न्यायालय का जज होता है, जहां उससे निचली अदालतों के फैसले पर अपील की जाती है.

जब ज़िला स्तर की अदालत में सिविल मामलों की सुनवाई होती है तो उसे सिविल कोर्ट (व्यवहार न्यायालय) कहा जाता है. जब ज़िला स्तर पर आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है तो उसे सत्र अदालत कहते हैं. सत्र अदालत को सज़ा-ए-मौत तक देने का अधिकार होता है.

भारत में अदालतों का वर्गीकरण मामलों की प्रकृति के आधार पर होता है. सिविल प्रक्रिया संहिता का पालन करते हुए कुछ अदालतें सिविल मामलों की सुनवाई करती हैं और आपराधिक प्रक्रिया संहिता का पालन करते हुए आपराधिक मामलों की.

ज़िला अदालतों में लंबित काम-काज को देखते हुए सरकार अतिरिक्त ज़िला जज और अपर ज़िला जजों की नियुक्ति कर सकती है. अतिरिक्त ज़िला जजों के पास ज़िला जजों के बराबर शक्तियां होती हैं.

ज़िला और सत्र अदालतों के अधीनस्थ भी कई अदालतें होती हैं. सिविल मामलों के लिए सबसे निचली अदालत होती है एक सिविल जज की अदालत (जूनियर डिवीज़न). इसी तरह आपराधिक मामलों पर सुनवाई के लिए अधिकृत सबसे निचली अदालत न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत होती है. सिविल जज की अदालत (जूनियर डिवीज़न) छोटे सिविल मामलों पर सुनवाई करती है, इसी तरह न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ऐसे आपराधिक मामलों पर सुनवाई करती है, जिसमें अधिकतम सज़ा पांच साल तक हो सकती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए