नज़रिया: 'पत्रकार-सरकार के बीच होनी चाहिए चीन की दीवार'

पत्रकारों से घिरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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2015 में प्रधानमंत्री के पत्रकार मिलन समारोह की तस्वीर

फ़र्ज़ी ख़बरों के लिए पत्रकारों को ब्लैकलिस्ट करने के फैसले पर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया हुई कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दख़ल देना पड़ा और सूचना-प्रसारण मंत्रालय यह फैसला वापस लेने को बाध्य हुआ.

कई पत्रकारों ने मंत्रालय के इस फैसले का यह कहते हुए विरोध किया था कि यह मीडिया पर नियंत्रण लगाने की सरकारी कोशिश है.

इसी दिन यानी दो अप्रैल को ही प्रेस क्लब में कई पत्रकार जुटे और वहां इसके आयामों पर चर्चा की गई. यह भी कहा गया कि इस सर्कुलर के आधार पर फ़र्ज़ी ख़बरों की मनमाफिक व्याख्या करके सरकार मुश्किल सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ठिकाने लगा सकती है.

प्रधानमंत्री ने यह फैसला तो वापस ले लिया, लेकिन यह सवाल अब कुछ अरसे से फिज़ा में तैर रहा है कि क्या मोदी सरकार मीडिया की बांहें मरोड़ना चाहती है?

इस संबंध में बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने भारत के मशहूर टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई से बात की.

आगे पढ़िए, इस विषय पर राजदीप सरदेसाई का नज़रिया:

मुझे लगता है कि सरकार को इसलिए नहीं चुना जाता कि वह मीडिया को कंट्रोल करे. सरकार को सिर्फ एक वातावरण बनाना है जहां मीडिया को आज़ादी मिले. उस आज़ादी का अगर मीडिया दुरुपयोग करे तो उसके लिए क़ानून और न्यायपालिका है.

हम चीन तो नहीं हैं. हमारे यहां लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सरकार को मीडिया की आज़ादी पर भरोसा रखना चाहिए. लेकिन यह कहना कि आप स्वयं को वह ताक़त देंगे, जहां आप मीडिया को सस्पेंड करेंगे और पत्रकारों की मान्यता छीनेंगे, ये सब लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए.

लेकिन पत्रकार संगठनों ने ऐसी नौबत आने क्यों दी?

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मीडिया के कैमरों से घिरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे पत्रकारों में कई ऐसे लोग आए हैं जो बिल्कुल पेशेवर नहीं हैं. मैं उन्हें पत्रकार नहीं मानता. वे केवल प्रोपेगैंडा की पत्रकारिता कर रहे हैं. वे किसी पार्टी या विचारधारा से जुड़े होते हैं और उससे जुड़ी फ़र्ज़ी ख़बरें प्रसारित करते हैं.

आपकी विचारधारा होनी जायज़ है. आप अपनी विचारधारा लोगों के सामने रख भी सकते हैं, लेकिन अपनी विचारधारा के प्रसार के लिए ख़बरों को ग़लत या फर्ज़ी या भड़काऊ रूप में सामने रखना बिल्कुल ग़लत है.

ऐसे लोगों की वजह से जनता में मीडिया की विश्वसनीयता कम हुई है और उसी का फायदा उठाकर सरकार मीडिया को काबू करने की कोशिशें कर रही है.

मीडिया पर नियंत्रण की कोशिशों के संकेत?

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आप देखें कि फेक न्यूज़ पर जो सर्कुलर जारी किया गया, उसमें कहा गया कि अगर किसी पत्रकार के ख़िलाफ़ शिकायत भी हो तो सरकार उसे सस्पेंड कर सकती है. ये सरासर मीडिया पर हमला है.

इस तरह की कोशिशें राज्यों में भी हो रही हैं. राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने भी मीडिया पर काबू करने की कोशिशें की थीं. दूसरे राज्यों में भी पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं. त्रिपुरा, बंगाल, मध्य प्रदेश और कश्मीर में पत्रकारों पर हमले हुए हैं. मैं समझता हूं कि ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि पत्रकार पूरी तरह आज़ाद है.

बात सिर्फ इस सर्कुलर की नहीं है, एक माहौल ऐसा बनाया गया है जहां पत्रकारों पर हमले, ख़ास तौर से छोटे शहरों में ज़्यादा बढ़ गए हैं. छोटे शहरों में पत्रकारों को वैसा संरक्षण भी नहीं मिलता.

पत्रकारों और सरकार का रिश्ता कैसा हो?

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पत्रकार और सरकार के बीच रिश्ते में एक 'चीन की दीवार' होनी चाहिए. मतलब एक ऐसी दीवार होनी चाहिए, जिसमें सरकार न्यूज़रूम में न आए. न्यूज़रूम हमारा घर है. आप वहां नहीं आ सकते, आप ज़रूर हमसे संवाद कर सकते हैं, सलाह-मशविरा कर सकते हैं, लेकिन आप हमें हुक्म नहीं दे सकते.

पत्रकार को भी ये समझना चाहिए कि नेता को हम अपना सूत्र मानें, उससे ख़बरें लें, लेकिन उसके दोस्त न बनें. ये दोस्ती और भाईचारे का जो वातावरण हो गया है, जिसमें हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बोलते नहीं हैं. हमारे कुछ पत्रकार बंधु हैं जो आज कल राजनीतिक दलों की बैठकों में भी शामिल होते हैं. मुझे लगता है कि वे लोग दीवार को तोड़ने का काम कर रहे हैं. जबकि ये दीवार बनी रहनी चाहिए.

मुझे लगता है कि हम पत्रकार कॉकरोच की तरह हैं और नेता बड़ी तितलियों की तरह हैं. हमें इन तितलियों को आईना दिखाना चाहिए. यही हमारी जवाबदेही है.

फेक न्यूज़ को रोकना भी तो ज़रूरी है

फेक न्यूज़ को रोकना भी बिल्कुल ज़रूरी है. पर इसके लिए सरकार के बजाय हमें एक नियामक संस्था अपने आप बनानी है और उस संस्था को आप ताक़त दीजिए ताकि वो फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने वालों पर कार्रवाई कर सके.

सरकार का इसमें क्या काम है? सरकार तो ख़ुद फेक न्यूज़ और प्रोपेगैंडा करती है. सरकार तो उन्हीं तत्वों को बढ़ावा देती है जो फेक न्यूज़ फैलाते हैं. सरकार इस बहस में कहां आ गई?

पत्रकारों को ख़ुद ऐसा रास्ता निकालना है, जिसमें किसी सरकार की भूमिका न हो. सिर्फ इसी सरकार को मैं दोष नहीं दूंगा, हर सरकार मीडिया को कंट्रोल करना चाहती है. लेकिन नियंत्रित मीडिया के माहौल में हम फेक न्यूज़ नहीं रोक सकते. फेक न्यूज़ तब रोक सकते हैं जब एक पारदर्शी नियामक व्यवस्था लाएं, जिसमें पत्रकार और उनके संगठन शामिल हों.

अगर आप ख़ुद फेक न्यूज़ फैलाने वाली संस्थाओं, चैनलों और वेबसाइट्स को बढ़ावा देंगे तो आप कैसे इस बहस में शामिल हो सकते हैं. लोग आप पर भी विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि हर सरकार अपना प्रोपेगैंडा जनता के सामने रखना चाहती है.

क्या प्रेस काउंसिल और एनबीए भरोसे के क़ाबिल नहीं?

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मैं समझता हूं कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एनबीए को भी सोचना पड़ेगा कि इस समस्या से निपटने में वो किस तरह अपनी भूमिका निभाएंगे. आज की तारीख में इन दोनों संस्थाओं ने उतनी पहल नहीं की है, जिससे विश्वास हो कि वे वाक़ई फेक न्यूज़ पर लगाम लगाने में कामयाब हैं.

कई समाचार संस्थाएं हैं, जिन्होंने एनबीए की कार्रवाई को मानने से इनकार किया है और उसका विरोध किया है.

तो हम पत्रकारों और पत्रकार संगठनों को भी इस बारे में सोचना है कि क्या वाक़ई आपकी कार्रवाई से कोई फ़र्क़ पड़ रहा है या नहीं, क्या आप भी पक्षपात कर रहे हैं या क्या आप में वो क्षमता ही नहीं है इस समय?

तो मीडिया कंट्रोल को रोकेंगे कैसे?

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अगर हम अपना काम करें तो सब कुछ ठीक होगा. पत्रकार आज कल अपना काम करने के सिवा सब कुछ करते हैं. हम अगर अपना लेख लिखें, सही ख़बर दें, अपना कार्यक्रम करें, बग़ैर ये सोचे हुए कि नेता हमारे बारे में क्या सोचते हैं तो नियंत्रण की ये कोशिशें अपने आप नाकाम हो जाएंगी.

अगर हम प्रभावशाली लोगों को सच्चाई का आईना दिखाएं तो ये समस्या हल हो जाएगी. लेकिन हम दूसरे कामों में लगे रहते हैं. हम नेटवर्किंग और राज्यसभा की सदस्यता चाहते हैं तो हम पत्रकार नहीं रहते और इसी वजह से कंट्रोल करने के लिए सरकार आ जाती है.

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