'कोई मुझे देवी समझता है कोई वेश्या'

  • 11 अप्रैल 2018
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जब मैं सड़क पर खड़ी होती हूं तो डर लगता है कि कोई लड़का सीटी मारेगा और बोलेगा तेरा रेट क्या है, चल...

कभी लगता कोई मेरे पांव छू कर आर्शिवाद मांगेगा.

कोई मुझे मेरे परिवार के लिए कलंक बताता तो कोई मुझे देवी कहता था. लोग मुझे वेश्या होने का ताना भी देते हैं.

लेकिन, मुझे 'रूपेश' से 'रूद्राणी' बनने की कोई शर्मिंदगी नहीं है.

मैं परिवार में सबसे बड़ी थी लेकिन मुझे अपने शरीर में कभी सहजता महसूस नहीं हुई. मैं खुद को लड़के के शरीर में कैद समझती थी. मेरी भावनाएं लड़की जैसे थी. मुझे सजना संवरना पसंद आता था.

मेरे लिए उस शरीर में रहना मुझे पागल कर रहा था, लेकिन मैं हार नहीं मानना चाहती थी.

मैंने अपने परिवार को अपनी भावनाएं बताईं और ये खुशक़िस्मती है कि मेरे माता-पिता और भाई ने इस बात को समझ लिया और मुझे मेरे तरीके से जीने की आज़ादी दी.

लेकिन ये इजाज़त केवल घर तक ही सीमित थी.

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Image caption रूद्राणी

दुनिया के सामने लड़का

मैंने कान्वेंट स्कूल से पढ़ाई की और मैं स्कूल में लड़कों की यूनिफ़ॉर्म पहन कर ही जाती थी. मुझे पेंट-शर्ट या जीन्स पहनना काफी असहज लगता था.

मैंने 12वीं तक एक कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई की. वहां भी छेड़छाड़ और मज़ाक का सामना करना पड़ा इसलिए कॉलेज जाने का मन नहीं किया. इसके बाद मैंने घर पर ही पढ़ाई की.

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Image caption रूद्राणी की बचपन की तस्वीर (बाईं ओर)

जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई मैं लड़कों की तरफ़ आकर्षित होने लगी. लेकिन, मैं अपनी भावनाएं ज़ाहिर नहीं कर सकती थीं क्योंकि मैं लड़की तो सिर्फ़ घर पर थी लेकिन दुनिया के लिए मैं अब भी 'रूपेश' ही थी. ये बात मुझे हर पल परेशान और बैचेन करती.

इसके बाद मैंने सेक्स बदलने की ठानी जो आसान नहीं था. हालांकि, मेरा परिवार मेरे साथ था लेकिन पहले मनोचिकित्सक ने मुझसे लंबी बात की ताकि वो जान सके कि वाक़ई में मैं एक लड़की बनना चाहती हूं कि नहीं.

डॉक्टर से मिल कर मुझे ये पता चला कि मैं लड़की की तरह दिखने लगूंगी, शरीर भी लड़की की तरह होगा लेकिन कई मायनों में मैं पूरी लड़की अब भी नहीं बन पाऊंगी.

मनोचिकित्सक ने मेरे परिवारवालों को रज़ामंदी दे दी जिसके बाद मैंने साल 2007 में ट्रांजिशन की प्रकिया शुरू की.

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जब बदलाव शुरू हुआ

ट्रांजिशन की प्रक्रिया में कई टेस्ट और सर्जरी से गुज़रने के बाद भी मेरे ज़ेहन में ये डर समाया रहता कि ये शारीरिक दर्द तो मैं सह लूंगी लेकिन अगर मुझे 'रूद्राणी' के रूप में लोगों ने मुझे स्वीकार नहीं किया तो क्या होगा?

लेकिन, जैसे ही मेरा ट्रांजिशन हुआ मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने एक संस्था के साथ काम करना शुरु कर दिया. अब मैं अपने परिवार के साथ भी नहीं रहती. मेरी ज़िंदगी ही बदल गई.

दोस्तों ने मेरा साथ दिया लेकिन लोगों ने हमेशा मेरे लुक्स का मज़ाक बनाया जो कई बार मुझे हीन भावना भर देता था. लेकिन फिर मैं अपने आपको को मनाती. मैंने इसे चुनौती के तौर पर लिया.

मैंने लोगों से मिलना शुरु किया. धीरे-धीरे मेरा दायरा बढ़ने लगा और जैसे ही लोगों ने जाना कि मैं ट्रांसजेंडर हूं तो मॉडलिंग के ऑफर मिलने लगे. मैं एक्टिंग भी करती हूं.

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मुझे विदेशों से भी मॉडलिंग के ऑफ़र मिलते हैं. छोटा ही सही अब मेरा अपना घर है जिसे मैंने अपने हाथों से संवारा है.

आज 'रूद्राणी' अपनी पहचान बना चुकी हैं. कभी भेदभाव करने वाला समाज भी सम्मान देता है, मेरे व्यवहार को पसंद करता है.

मैं अब अपने जैसे लोगों की मदद भी कर रही हूं एक मॉडलिंग एजेंसी की मालिक हूं. सेक्स ट्रांजिशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी मेरे जीवन में एक अधूरापन आज भी है.

ये कमी हमेशा खलती है. लोग मेरी ज़िंदगी में आते और चले जाते हैं. कोई मेरा हमसफ़र बनने को तैयार नहीं क्योंकि मैं 'मां' नहीं बन सकती.

(बीबीसी की वीडियो जर्नलिस्ट बुशरा शेख़ की रूद्राणी से बातचीत पर आधारित)

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