ब्लॉग: दलितों का ग़ुस्सा और भाजपा की समरसता की उधड़ती सिलाई

  • 10 अप्रैल 2018
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एक दलित नेता ने कभी कहा था कि 'चुनाव की कड़ाही में दलित को तेजपत्ते की तरह डाला ज़रूर जाता है, लेकिन खाने से पहले उसे निकालकर फेंक दिया जाता है.'

दलितों के हितों-अधिकारों के लिए होने वाले संघर्षों में ईमानदारी से डटे रहने का नैतिक साहस शायद मायावती में भी नहीं है. रोहित वेमुला, उना कांड और सहारनपुर दंगों के मामलों में उनका रवैया पहले काफ़ी ढीला-ढाला रहा था. हालांकि बाद में उन्होंने जिग्नेश मेवाणी-चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नेताओं का उभार देखकर ख़तरे को भाँपा और दलितों के मुद्दे पर संसद से इस्तीफ़ा दे दिया ताकि अपने खोए हुए 'मोरल हाइ ग्राउंड' को हासिल किया जा सके.

बाक़ी दलों की तो बात कौन करे. दलित हमेशा छले गए हैं और उन पर होने वाला अत्याचार भी नया नहीं है.

दलितों के समर्थन में अनशन का कांग्रेसी पैंतरा उस भटूरे की तरह फूट गया जो उन्होंने भाजपा के मुताबिक़ अनशन से पहले खाया था और फ़ोटो भी खिंचाई थी. इमेज की लड़ाई में एक बार फिर बीजेपी ने बाज़ी मार ली. वैसे अनशन से पहले भटूरे खाने में क्या बुराई है?

फिर नया क्या है? नया ये है कि बीजेपी चार साल के सबसे गंभीर असमंजस और आशंका से गुज़र रही है.

नई है वो पीढ़ी, जो छला हुआ महसूस कर रही है; नया है ये ग़ुस्सा, और इस ग़ुस्से के नतीजे से पैदा हुआ डर. ये डर मामूली नहीं है.

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जो अब तक अघोषित था, 2014 के आम चुनाव में वो एलानिया हो गया. भाजपा ने तय किया कि उसे तक़रीबन 14 प्रतिशत मुसलमानों के वोट नहीं मिलते इसलिए उनको सीटों के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में 80 में से एक भी टिकट देने की ज़रूरत नहीं है.

सबका साथ, सबका 'माइनस मुसलमान' विकास

इस तरह 'सबका साथ, सबका विकास' में जो 'सब' था वो 'माइनस मुसलमान' हो गया.

बीजेपी ने अपना ध्यान ग़ैर-जाटव दलित वोटरों और ग़ैर-यादव ओबीसी वोटरों पर केंद्रित किया और इसके बेहतरीन परिणाम उसे मिले.

सामाजिक अध्ययन करने वाली संस्था सीएसडीएस ने अपने एक अध्ययन में बताया कि '2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को दलितों के 12 प्रतिशत वोट मिले थे और 2014 में ये दोगुने होकर 24 प्रतिशत हो गए. यही वजह है कि मायावती के हाथ एक भी सीट नहीं लगी.'

लेकिन 2019 के चुनाव में पाँच साल पहले वाले समीकरण नहीं होंगे. जहां विकास का नारा धार खो चुका है, वहीं मोदी की व्यक्तिगत अपील शायद नोटबंदी और जीएसटी के बाद भले न घटी हो, मगर बैंक घोटाले, 'पकौड़ा रोज़गार' जैसे बयान के बाद बढ़ी तो क़तई नहीं है. और मोदी नाम बीजेपी का अब तक सबसे बड़ा सहारा रहा है.

इसके साथ ही अगर बीएसपी-सपा-कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते हैं, जो लगभग तय है, तो ग़ैर-जाटव दलितों और ग़ैर-यादव पिछड़ों के वोट भाजपा को पहले की तरह नहीं मिलने वाले. ये फूलपुर और गोरखपुर में दिख चुका है.

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अब क्या बदलता दिख रहा है?

पिछले साल जून में सहारनपुर में राणा प्रताप जयंती के जुलूस के नाम पर हुई हिंसा को लेकर दलितों में आक्रोश था. ख़ास तौर पर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' को ज़मानत मिल जाने के बाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत अब तक जेल में रखे जाने को लेकर आक्रोश बना हुआ है.

मगर असली ग़ुस्सा 2 अप्रैल के भारत बंद के बाद भड़का है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र में लगभग 10 दलित मारे गए हैं और बड़ी संख्या में दलितों की गिरफ़्तारी हुई है.

जो बताया जा रहा है उससे लगता है कि दलित अद्भुत क़िस्म की हिंसा में ख़ुद को मार रहे हैं, अपने ही घर जला रहे हैं और इसी जुर्म में जेल भी जा रहे हैं.

ये ऐसा मौक़ा है जब बीजेपी की घबराहट दिख रही है. उसने अपने सांसदों से दलितों के घर में समय बिताने और उन्हें यह समझाने को कहा है कि पार्टी दलित विरोधी नहीं है, साज़िश के तौर पर उसकी दलित विरोधी छवि बनाने की कोशिश की जा रही है.

अब ये देखिए कि भाजपा की ऐसी छवि बनाने वाले लोग कौन हैं? सावित्री बाई फुले, अशोक दोहरे, छोटेलाल खरवार, उदित राज, डॉ. यशवंत; ये सभी भाजपा के अपने सांसद हैं जिन्होंने पीएम से शिकायत की है कि दलितों का उत्पीड़न रोका जाए.

अब तक चुप रहे रामविलास भी हवा का रुख़ भाँपकर कह रहे हैं कि दलितों के बीच बीजेपी की छवि ठीक नहीं है. इन सांसदों को ये सब काफ़ी दबाव में कहना-करना पड़ रहा है.

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Image caption सावित्री बाई फुले

बीजेपी की राह मुश्किल करते दलित

दलित कर्मचारियों के संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ ने गृह मंत्री को चिट्ठी लिखकर बताया है कि 'हिंसा सर्वण लोग कर रहे हैं और झूठे एफ़आईआर लिखकर दलितों को जेल में डाला जा रहा है.

पुलिस अधिकारी आंबेडकर के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और बंद की वजह से दफ़्तर न पहुँच पाए दलित कर्मचारियों को दंडित किया जा रहा है. हम इन सबके लिए वीडियो और स्क्रीनशॉट आपको देना चाहते हैं.'

Image caption दलित कर्मचारियों के संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ की चिट्ठी

दलित पिछले चुनाव में मोदी की अपील पर बीजेपी के साथ चले गए थे, लेकिन मौजूदा आक्रोश कायम रहा तो पार्टी के लिए गहरी दिक़्कतें हो सकती हैं. यही वजह है कि गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री सभी कह चुके हैं कि सरकार दलितों के हितों की रक्षा करेगी.

इसके बावजूद ऐसी छवि इसलिए बन रही है क्योंकि दलितों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की बात सरकार कर तो रही है, लेकिन उसने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव का समय पर पुरज़ोर विरोध नहीं किया और बाद में आक्रोश भांपकर दोबारा समीक्षा की अर्ज़ी डाल दी.

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दलित, हिंसा और सरकार

दूसरी ज़रूरी बात, क्या आपको याद है कि कभी किसी बड़े नेता ने कहा हो कि 'दलितों पर अत्याचार करने वालों को बख़्शा नहीं जाएगा'? 'कड़ी निंदा' के लिए मशहूर गृह मंत्री ने भी बड़ा सधा हुआ बयान दिया जिसमें दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा करने वालों की कड़ी निंदा तो क्या, उनका ज़िक्र तक नहीं था.

इन हालात में पैदा हुआ दलित आक्रोश बीजेपी को गहरी चोट दे सकता है. हालाँकि पार्टी को उम्मीद है कि अगले चुनाव तक सब ठंडा हो जाएगा. लेकिन ये उम्मीद इसलिए बेमानी है क्योंकि जिस तरह की ताक़तें पिछले चार सालों में सड़कों पर हथियार लेकर उतर आई हैं और उन्हें कहीं भी प्रभावी तरीक़े से नहीं रोका गया है, उससे शक ही है कि सारी खिंची हुई तलवारें म्यानों में चली जाएँगी.

हिंसक तत्व तो मानो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि वे हिंदुत्व के सिपाही हैं और देश में हिंदुओं का राज है.

ये हथियारबंद आक्रामकता सिर्फ़ मुसलमानों के ख़िलाफ़ सीमित रहेगी, यह सोचना नासमझी है. वे दलितों को भी निशाना बनाना शुरू कर चुके हैं.

ये साबित करना मुश्किल नहीं है कि करणी सेना, हिंदू युवा वाहिनी, हिंदू चेतना मंच, हिंदू नवजागरण और हिंदू महासभा जैसे नामधारी सगंठनों के आह्वान पर आक्रामक शोभायात्रा निकालने वाले लोग चाहे भागलपुर में हों, रोसड़ा में हों, नवादा में हों या ग्वालियर में, वे सब एकसूत्र में बंधे हैं.

मुसलमानों और दलितों पर संगठित तरीक़े से हमले करने वाले लोग अलग-अलग नहीं हैं. उनमें आरक्षण और मुसलमानों के कथित तुष्टीकरण को लेकर गले तक ज़हर भरा गया है. वे हिंसा के ज़रिए अपनी दमित कुंठाएँ निकाल कर गर्व महसूस कर रहे हैं, दलितों और मुसलमानों में डर पैदा कर रहे हैं.

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Image caption दलितों द्वारा 2 अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद के दौरान एक प्रदर्शनकारी को बेल्ट और डंडों से मारते हुए कुछ लोग

हिंदुओं में आखिर कितनी एकता?

आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी का हमेशा से कहना रहा है कि वे 'सामाजिक समरसता' के हामी हैं. 'समरसता' का मतलब है कि सभी हिंदू एक हैं और मिल-जुलकर रहें, ग़ैर हिंदू शत्रु हो सकते हैं, हिंदुओं के बीच शत्रुता ठीक नहीं है.

सब हिंदू अगर एक हैं तो हर दूसरी गाड़ी पर ब्राह्मण, जाट, राजपूत, गूजर लिखा हुआ स्टिकर क्यों लगा है? भाजपा के राज्यसभा सांसद बताएँगे कि उन्हें दलितों को एक मंदिर प्रवेश दिलाने की कोशिश में हिंदू भीड़ के हमले के बाद अस्पताल में क्यों भर्ती होना पड़ा था?

रोज़ाना जिल्लत झेलने वाले दलितों के लिए ये भूलना आसान नहीं कि यूपी के मुख्यमंत्री ने मुलाक़ात से पहले दलितों को नहाकर आने को कहा था और साबुन की टिकिया बँटवाई थी.

दलितों को पता है कि वे वहाँ नहीं हैं, जहाँ निर्णय लिए जाते हैं. वे राष्ट्रपति बन सकते हैं, मगर बीजेपी की साइट पर जाकर देखिए कितने दलित पदाधिकारी हैं; दो या तीन?

अब आरएसएस और भाजपा के सामने समरसता के बुलबुले को फूटने से बचाने की चुनौती है. जो लोग आरक्षण छीने जाने की आशंका से बेचैन हैं और जो उसके ख़िलाफ़ आक्रामकता से भरे हैं, उन दोनों को हिंसाकी फूटती चिंगारियों के बीच एक साथ साधना बेहद कठिन होगा.

'समरसता' के बिना सत्ता के सुर-ताल का सम भाजपा नहीं बिठा सकेगी क्योंकि देश में लगभग 16 प्रतिशत दलित हैं. दलितों और मुसलमानों को निकाल दिया जाए तो भाजपा सिर्फ़ 70 प्रतिशत वोटरों के बीच से समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी और ये जीत पक्की करने के लिए बहुत मुश्किल है.

हिंसा वो नौबत पैदा कर सकती है, जब भाजपा किसी एक की तरफ झुकती हुई दिखे. दलित उसकी नीयत पर पहले ही शक करने लगे हैं. अगर उसने दलितों को शांत करने की कोशिश में साथ खाने के अलावा, कुछ भी किया तो अगड़े वोटरों के भड़कने का डर बना रहेगा.

यही वजह है कि पार्टी दलितों के साथ खाने-पीने और उनका विश्वास जीतने की कोशिश तो कर रही है लेकिन अगड़ों को नाराज़ किए बिना. ये कब तक निभेगा, किसी को नहीं पता.

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