वो दलित जिसने अपनी बारात को लेकर हाईकोर्ट में लड़ी जंग

  • 13 अप्रैल 2018
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आमतौर पर शादी तय होने के बाद लड़के और लड़की वालों के घरों में शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं.

लेकिन हाथरस के रहने वाले संजय जाटव को कासगंज की एक लड़की के साथ शादी तय होने के बाद स्थानीय प्रशासन से लेकर हाईकोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़े.

संजय जाटव को कोर्ट-कचहरी के चक्कर अपने या अपनी होने वाली पत्नी के घर वालों से या किसी और की वजह से नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही एक कथित परंपरा के कारण लगाने पड़े और आख़िरकार उन्हें इसके ख़िलाफ़ जीत हासिल हुई.

दरअसल हुआ ये कि संजय की शादी कासगंज के निज़ामपुर में तय हुई थी जो कि एक ठाकुर बाहुल्य गांव है.

और जाटवों की बस्ती में जाने का रास्ता ठाकुरों की बस्ती से होकर जाता है.

जाटवों के यहां आने वाली बारात इस बस्ती से होकर नहीं जाती बल्कि दूसरे रास्ते से जाती है और उसमें किसी तरह का धूम-धड़ाका या फिर गाना-बजाना भी नहीं होता.

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लड़कर हासिल की जीत

संजय अपनी बारात में घोड़ी पर चढ़कर उसी रास्ते से जाना चाहते थे जिस रास्ते से और जिस तरह से ठाकुरों के यहां बारात आती है.

संजय की ससुराल वालों ने जब इस बारे में उन्हें बताया तो क़ानून की पढ़ाई करने वाले संजय को ये बात नागवार गुज़री.

उन्होंने पहले ज़िला प्रशासन से और फिर हाईकोर्ट से इसकी अनुमति मांगी.

ज़िला प्रशासन ने शुरू में उन्हें 'शांति भंग' की आशंका के चलते उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी और हाईकोर्ट ने ये कहकर उन्हें वापस कर दिया कि ये स्थानीय प्रशासन का मामला है, इसमें कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा.

लेकिन आख़िरकार संजय को इसकी अनुमति मिल गई.

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प्रशासन ने निकाला बीच का रास्ता

बीबीसी से बातचीत में संजय जाटव बताते हैं, "कासगंज के ज़िलाधिकारी ने हमें और गांव के ठाकुरों को बुलाकर इस बारे में बैठक की और फिर दोनों ओर से लिखित तौर पर हमें ये आश्वासन दिया गया कि हम कुछेक शर्तों के साथ उसी रास्ते से बारात निकाल सकते हैं."

हाथरस के रहने वाले संजय जाटव ने स्थानीय डिग्री कॉलेज से बीए की पढ़ाई की है और अब वे क़ानून की पढ़ाई कर रहे हैं.

उनका परिवार काफी ग़रीब है और वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं.

संजय के मुताबिक, "मेरे मां-बाप दोनों मज़दूरी करते हैं और घर में मैं अकेला पढ़ा-लिखा व्यक्ति हूं. पढ़ाई के अलावा मैं राजनीति में भी सक्रिय हूं और बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा हूं."

संजय जाटव बताते हैं कि उनके यहां इस तरह की कोई परंपरा नहीं थी, इसलिए जब पहली बार उन्हें इसके बारे में पता चला तो यकीन ही नहीं हुआ.

संजय कहते हैं, "मेरे ससुराल वाले भी इस परंपरा का विरोध करने के इच्छुक नहीं थे लेकिन मुझे ये सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए एक बुराई जैसी दिखी और मैंने इसका विरोध किया."

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बारात पर विवाद से चर्चा में गांव

पिछले कई महीने से संजय की बारात को लेकर कासगंज का निज़ामपुर गांव चर्चा में है.

कासगंज के ज़िलाधिकारी आरपी सिंह ने एसपी के साथ मिलकर दोनों पक्षों के लोगों से लंबी बातचीत के बाद इस मामले का निपटारा किया.

ज़िलाधिकारी आरपी सिंह कहते हैं, "मामले को बेवजह तूल दिया जा रहा था. हमने हाथरस से संजय, उनके ससुराल पक्ष के लोगों और गांव के प्रधान सहित कई लोगों के साथ चर्चा की. ये तय हुआ कि शादी में बारात सामान्य तरीके से और सामान्य रास्ते से जाएगी."

"लेकिन किसी प्रकार का कोई हंगामा नहीं होगा. बीच का रास्ता निकाल दिया गया है, जिस पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई है. अब किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं रह गया है."

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प्रशासन की पहल

कासगंज के डीएम और एसपी की निगरानी में दोनों पक्षों में आठ शर्तों के बीच लिखित रूप से समझौता करा दिया गया है.

दोनों ही पक्ष बारात निकालने को लेकर राजी हो गए हैं और फिलहाल प्रशासन ने बारात निकालने का नया रूट मैप भी तैयार कर लिया है.

संजय बताते हैं कि वो और उनके परिवार वाले इस समझौते से खुश हैं.

दरअसल, जब संजय जाटव ने अपनी बारात को पूरे गांव में घुमाए जाने की मांग की तो सवर्ण जाति के लोग दशकों पुरानी चली आ रही परंपरा का हवाला देकर इसका विरोध कर रहे थे.

मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया लेकिन आख़िरकार आपसी बातचीत से रास्ता निकल आएगा और अब प्रशासन समेत दोनों पक्षों को उम्मीद है कि आगामी 20 अप्रैल को संजय जाटव की शादी सकुशल संपन्न हो सकेगी.

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