आंबेडकर और मैं: 'कभी जय भीम बोलने में भी शर्म आती थी'

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"मैं बाबा साहेब के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानती थी. बस उतना ही पता था जो स्कूली किताबों में सीखा था. पहले तो मैं जय भीम कहने में भी शर्म महसूस करती थी. मुझे लगता था कि वह दलितों के 'कोई' हैं जिन्होंने दलितों के लिए संविधान लिखा है. लेकिन अब मैं गर्व के साथ जय भीम बोलती हूं. और मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं."

ये शब्द उस महिला के हैं जिन्होंने तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए अपनी और अपने जैसी कई महिलाओं की ज़िंदगियों में बदलाव लाने की कोशिशें कीं.

इनका नाम मुमताज़ शेख है.

एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में जन्म लेने वाली मुमताज़ शेख जब सिर्फ सात साल की थीं तो उनका परिवार काम की तलाश में मुंबई आ गया.

इसके बाद नौवीं कक्षा तक पढ़ाई के बाद बस 15 साल की उम्र में मुमताज़ शेख़ की शादी कर दी गई.

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मुमताज़ बताती हैं, "मैं नौवीं कक्षा में फेल हो गई. इसके बाद 15 साल की होते ही मेरी शादी हो गई. अगले ही साल मैंने एक बेटी को जन्म दिया. मैं हमेशा सोचती हूं कि मेरी ज़िंदगी की कहानी कितनी फ़िल्मी रही है. मतलब...मेरी शादी हो गई, बेटी हो गई और मुझे लगा कि अब ये हैप्पी एंडिंग होगी. लेकिन ऐसा होना नहीं लिखा था."

जब एक एनजीओ ने बदली ज़िंदगी

मुमताज़ बताती हैं, "ये साल 2000 की बात है. हम सहयाद्रिनगर इलाके में रहते थे और वहीं कोरो (कमेटी ऑफ़ रिसॉर्स ऑर्गनाइजेशन) नाम की एक एनजीओ किसी सर्वे के लिए आई थी. मैं उन्हें अपने घर की खिड़की से देखा करती थी. मुझे बिना पूछे घर से निकलने की इज़ाजत नहीं थी, पानी लाने या शौचालय के लिए भी नहीं. मैं जानना चाहती थी कि आख़िर ये एनजीओ वाले लोग कर क्या रहे हैं. और फिर एक दिन मैं चुपके से उनकी मीटिंग अटेंड करने पहुंच गई."

जब मुमताज इस मीटिंग में पहुंची तो उन्होंने एक समाजसेवी को ये कहते सुना कि वह मुमताज की बस्ती में पानी और बिज़ली की समस्या का समाधान करने जा रहे हैं.

"मैंने जब महेंद्र रोकाडे को ये कहते सुना तो मैं अचरज में पड़ गई कि ये हमारी बस्ती है तो ये क्यों काम कर रहे हैं. और मैंने ये सवाल पूछ भी लिया. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि आप भी काम कर सकती हैं."

मुमताज कहती हैं कि ये लगता है कि ये कल की बात हो और इससे उनके जीवन को एक चुनौती मिली. इसके बाद उन्होंने परिवार की ओर से सामने आने वाली तमाम परेशानियों से जूझते हुए नौवीं से आगे की पढ़ाई करना शुरू किया.

जब पता चला कि संविधान क्या होता है?

इस संस्था के साथ काम करते हुए मुमताज को भारतीय संविधान और उसमें महिलाओं को मिले अधिकारों के बारे में पता चला.

वह बताती हैं, "संविधान में लिखा है कि सभी (महिला-पुरुष) एक समान हैं और इस बात ने उन्हें अपनी ज़िंदगी को देखने का एक नया नज़रिया दिया."

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"मेरी संस्था ने मुझे शिकायतों को सुलझाने की ज़िम्मेदारी दी थी. वहां पर एक परिवार आया जिनमें पति-पत्नी के बीच तनाव चल रहा था. मैंने उनसे कहा कि आपको एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए, किसी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए. हम सब एक बराबर हैं. इतने में पति बोल उठा कि तुम हमें क्या समझा रही हो, अपने घर में देखो क्या हो रहा है. इस कमेंट ने मेरे तन बदन में आग लगा दी. मैं गुस्सा थी लेकिन मुझे पता था कि वो सही हैं. क्योंकि अगर मैं खुद अपने घर में इसका पालन नहीं कर सकती तो दूसरों को क्या सलाह दूं."

यही वो मोड़ था जब मुमताज़ शेख के असली युद्ध की शुरुआत हुई.

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जब तलाक़ ही बचा रास्ता

उन्होंने अपने परिवार को समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई कुछ न माना. उनके ससुराल वाले ये समझ नहीं पा रहे थे कि जिस लड़की ने बचपन से घरेलू हिंसा पर कुछ नहीं कहा, वो अब क्यों अपनी आवाज़ उठा रही है.

इस बीच उन्होंने खुला जैसी परंपरा के रास्ते तलाक लेने के बारे में विचार किया. इसके एक साल बाद उन्होंने अपने पति से तलाक़ ले लिया.

इसके बाद कुछ समय बाद उन्होंने अपने साथ काम करने वाले एक साथी कर्मचारी से शादी कर ली.

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मुमताज़ शेख ने इस संस्था में काम करते हुए कई परियोजनाओं में काम किया. लेकिन जिस काम से उन्हें प्रसिद्धि मिली वो राइट-टू-पी प्रोजेक्ट था. इस काम के तहत उन्होंने महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए सामुदायिक शौचालय बनवाने के लिए संघर्ष किया.

मुमताज़ मानती हैं कि उनके अब तक सफर की प्रेरणा बाबा साहेब आंबेडकर रहे हैं.

वह कहती हैं, "मैंने उनकी कई तस्वीरें देखी हैं लेकिन मेरे पास एक तस्वीर है जो आपको उनकी शख़्सियत से इश्क करने पर मजबूर कर देती है. इस तस्वीर में उनकी बोलती हुई आंखें हैं. वह सब कुछ देखती है और मुझे संघर्ष करने की शक्ति देती हैं. मेरे पास बोलने की जो भी शक्ति है वो आंबेडकर की वजह से हैं."

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