राज्यों को कम पैसा देना चाहती है केंद्र सरकार?

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दक्षिण भारतीय राज्यों के वित्त मंत्रियों ने कहा है कि केंद्र उन पर नए प्रतिबंध लगा रहा है जिससे उन्हें मिलने वाले धन में कमी आएगी और इसका सीधा असर गरीबों के लिए राज्यों के लोकलुभावन और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर पड़ेगा.

कोच्चि में हुई इस बैठक में केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पुदुचेरी के वित्त मंत्रियों ने केंद्र और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच के आर्थिक संबंधों और उसके असर के बरे में बात की .

बैठक में ये फ़ैसला किया गया कि इस मुद्दे पर बात करने के लिए अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ दो सप्ताह बाद विशाखापत्तनम में एक और बैठक आयोजित की जाएगी.

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बैठक में तमिलनाडु और तेलंगाना ने 15वें वित्त आयोग के टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस के बारे में हो रही इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया. इस बैठक में केंद्र से राज्यों को मिलने वाले धन के संबंध में नए प्रतिबंधों पर चर्चा हुई.

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Image caption सरकारी राशन की दुकान से अनाज लेती एक महिला

राजनीतिक रूप से इस बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि जिन नेताओं ने इसमें भाग लिया, वो सभी ग़ैर भाजपा पार्टियां हैं, जैसे केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में लेफ़्ट डेमोक्रेटिक पार्टी, कर्नाटक और पुदुचेरी में कंग्रेस और आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी.

हालांकि केरल के वित्त मंत्री डॉ. थॉमस इसाक और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के प्रतिनिधि, कृषि मंत्री कृष्णा बायर गौड़ा ने कहा कि बैठक का उद्देश्य पिछड़े राज्यों के साथ प्रगतिशील राज्यों के शेयरों में हिस्सेदारी को नकारने का नहीं था.

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उन्होंने कहा, "ये बैठक इसलिए नहीं थी कि हम अधिक प्रगतिशील राज्यों के धन का कुछ हिस्सा पिछड़े राज्यों को देने के ख़िलाफ़ हैं, जिनमें से अधिकतर उत्तर भारत में हैं."

डॉ. थॉमस इसाक ने बीबीसी को बताया, "हम उत्तर भारत के राज्यों को ये कहना चाहते हैं कि हम चीज़ों के आबंटन में निष्पक्षता का समर्थन करते हैं. जो प्रगतिशील राज्य हैं उन्हें पिछड़े राज्यों की मदद करनी चाहिए. लेकिन जनसंख्या पर नियंत्रण रखने में अपनी सफलता के लिए प्रगतिशील राज्यों को इनाम का हिस्सा ना दिया जाना जायज़ नहीं है."

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कृष्णा बायर गौड़ा ने कहा, "जिन्होंने अपने प्रदेश की आबादी पर लगाम लगाने के लिए अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाया है उन्हें टर्म ऑफ़ रेफरेंस को बदल कर सज़ा दी जा रही है. इससे प्रगतिशील राज्यों को मिल रहे वित्त में कमी आएगी. ये राष्ट्रीय हित में नहीं है."

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"जो राज्य देश के विकास के इंजन हैं उन्हें कमज़ोर बनाया जा रहा है. देश के मज़बूत रज्यों को कमज़ोर बना कर भारत को कमज़ोर बनाने की कोशिश हो रही है."

हाल में केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग के लिए टर्म ऑफ़ रेफरेंस को 1971 से हटा कर 2011 किया है. बैठक इस बात पर चर्चा करने के लिए हुई थी कि ऐसा करने से राज्यों को मिल रहा धन 42 फ़ीसदी तक कम हो सकता है.

डॉ आइज़ैक ने कहा, "राज्यों के लिए राजस्व वसूल करने की शर्तों को बढ़ा दिया गया है."

देश के वित्त मंत्री ने इस बैठक को "अनावश्यक विवाद" बढ़ाने की कोशिश करार दिया औक कहा कि टर्म ऑफ़ रेफरेंस किसी प्रदेश के ख़िलाफ़ नहीं हैं. उन्होंने कहा,"टर्म्स ऑफ़ रेफरेंस में किसी तरह की ऐसी बात नहीं है जिसका ये मतलब निकाला जाए कि जनसंख्या पर नियंत्रण कर सकने वाले राज्यों के ख़िलाफ़ कुछ किया जा रहा है."

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डॉ आइज़ैक ने कहा, "वित्त मंत्री हमारी चिंताओं के उत्तर नहीं दे रहे हैं. हम अपने राज्यों के हकों और हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसके लिए हमारे संविधान में हमें हक दिए गए हैं."

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि दक्षिण भारत हमेशा से उत्तर भारत को फंड करता रहा है.

उनके मुताबिक दक्षिण भारत के छह राज्य ज़्यादा टैक्स देते हैं लेकिन उन्हें बदले में कम ही मिलता है. मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश में टैक्स के एक रुपए के बदले राज्य को 1.79 रुपए मिलते हैं जबकि कर्नाटक को एक रुपए के बदले 0.47 पैसे.

सिद्धारमैया ने कहा था कि क्षेत्रीय असंतुलन को कम किए जाने की ज़रूरत है ताकि विकास कार्य करने वाले राज्यों को कुछ तो फ़ायदा मिले.

आंध्र प्रदेश के वित्तमंत्री यानामल रामकृष्णाडू ने कहा, "हमारे पास 103 वेलफ़ेयर स्कीम्स हैं और हम अपने कुल बजट (1.90 लाख करोड़) में से 70 हज़ार करोड़ इन स्कीमों पर खर्च करते हैं. अगर केंद्र सरकार हम पर इतने लगाम लगाएगी तो हम ये खर्च कैसे उठा पाएंगे? उस आम आदमी का क्या होगा जो हमारी इन योजनाओँ पर निर्भर है?"

रामकृष्णाडू ने कहा कि केंद्र उनसे वो फ़ंड लेना चाहता है जिस पर संविधान के मुताबिक राज्य का हक़ है.

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