नज़रिया: आसिफ़ा रेप केस पर जम्मू-कश्मीर में उबाल

बलात्कार पीड़िता का परिवार गांव छोड़कर जा चुका है
Image caption बलात्कार पीड़िता का परिवार गांव छोड़कर जा चुका है

17 जनवरी की सुबह मुहम्मद यूसुफ़ पुजवाला एक चारपाई पर अपने क़बीले के लोगों से घिरे हुए लेटे थे. तभी एक पड़ोसी दौड़ता हुआ उनके घर की तरफ़ आया.

लेकिन, वो पड़ोसी पुजवाला के घर तक नहीं आया. उसने फ़ोन पर ही उन्हें ख़बर दी. पड़ोसी ने बताया कि पुजवाला की बेटी की लाश उनके घर से कुछ दूरी पर ही झाड़ियों में पड़ी मिली है.

पुजवाला ने बीबीसी को बताया कि 'मुझे पता था कि मेरी बच्ची के साथ कुछ बुरा हुआ है'. जब पुजवाला बीबीसी से बात कर रहे थे, तब उनकी बीवी नसीमा बीवी पास में ही बैठी अपनी बेटी आसिफ़ा बानो का नाम ले-लेकर रो रही थीं.

पुजवाला एक घुमंतू जनजाति से ताल्लुक़ रखते हैं. गहरी आंखों वाले पुजवाला के सिर पर काली पगड़ी बंधी हुई रहती है. वो जम्मू शहर से क़रीब 45 मील दूर रसाना नाम के गांव में रहते हैं. जम्मू शहर कश्मीर के विवादित सूबे का हिंदू बहुल इलाक़ा है.

पुजवाला की दो बेटियां कुछ साल पहले एक हादसे में मारी गई थीं. अपनी पत्नी के इसरार पर पुजवाला ने अपने साले मुहम्मद अख़्तर की बेटी आसिफ़ा को गोद लिया था. अख़्तर के तीन बेटियां हैं.

इस इलाक़े में रहने वाले घुमंतू गुज्जर समुदाय के बाक़ी लोगों की तरह यूसुफ़ पुजवाला का परिवार भी अपने पालतू जानवरों को लेकर हिमालय की वादियों में घूमता रहता है. वो अपनी भेड़ों को चराने के लिए हरे-भरे चरागाह के क़रीब रहते हैं.

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जम्मू में गुर्जरों के आगमन पर तनाव

उनकी रातें ताज़े पानी की छोटी-छोटी नदियों के क़रीब गुज़रती हैं. वो अपनी बकरियों और भैंसों का दूध बेचकर गुज़र-बसर करते हैं. जब सर्दियां आती हैं, तो गुज्जर समुदाय के ये लोग जम्मू के मैदानी इलाक़ों में आ जाते हैं, जो कश्मीर के सर्द माहौल से थोड़ा गर्म होता है.

यूसुफ़ पुजवाला की बीवी नसीमा की उम्र 43 बरस है. वो बताती हैं कि उनकी आठ साल की बच्ची आसिफ़ा बहुत बातूनी थी. उसकी रंगत गोरी और आंखें भूरी थीं. वो हिरनी की तरह दौड़ती-भागती रहती थी. अपने सफ़र के दौरान वो परिवार की भेड़ों और भैंसों का बहुत ख़्याल रखा करती थी.

नसीमा बीबी कहती हैं कि, 'जानवरों से उसका लगाव देखकर पूरा गुज्जर समाज उसे बहुत चाहता था. हमारे लिए वही ज़िंदगी थी'.

17 जनवरी की उस सुबह ख़बर मिलते ही उसके परिजन और बाक़ी लोग दौड़ कर पास की झाड़ियों में गए, जहां आसिफ़ा की लाश मिली थी.

नसीमा बी कहती हैं कि, 'उन लोगों ने उस पर बहुत ज़ुल्म किए थे. उसके पैर टूटे हुए थे. उसके नाख़ून काले पड़ गए थे. उसकी बांहों और उंगलियों पर लाल और नीले निशान थे'.

10 जनवरी को आसिफ़ा दोपहर बाद घर लौटी थी. उसने दोपहर का खाना खाने के बाद मां को कहा कि वो जंगलों से घोड़ों को वापस लाने जा रही थी. घोड़े तो लौट आए, मगर आसिफ़ा उस शाम नहीं लौटी थी.

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पुलिस की ओर से मिली निराशा

जब शाम तक आसिफ़ा घर नहीं आई, तो नसीमा बी ने इसकी ख़बर अपने पति को दी. उस दिन यूसुफ़ अपने भाई के साथ ठहरे हुए थे. वो फ़ौरन अपने भाई आसिफ़ जान और दूसरे पड़ोसियों के साथ बेटी आसिफ़ा को खोजने निकल पड़े.

सारी रात वो लोग आसिफ़ा को तलाशते रहे थे. वो फ्लैश लाइट लेकर घने जंगलों में गए. उनके हाथों में लालटेनें और कुल्हाड़ियां भी थीं. आसिफ़ा के चाचा अली जान कहते हैं कि उस रात उनकी तलाश बेनतीजा रही.

12 जनवरी को यानी लापता होने के दो दिनों बाद, परिजनों ने आसिफ़ा की गुमशुदगी की रिपोर्ट हीरानगर पुलिस थाने में लिखाई. हीरानगर थाना, कठुआ ज़िले में पड़ता है. रसाना गांव भी इसी ज़िले में आता है. मगर आसिफ़ा के पिता बताते हैं कि पुलिस का रवैया बेहद बेरुख़ी वाला था.

इस मामले में अब आरोपी बनाए जा चुके पुलिस अफ़सर तिलक राज ने उस वक़्त अली जान से कहा था कि, 'हो सकता है कि वो अपने किसी दोस्त के साथ चली गई हो. उसे जंगल में तलाशने की कोशिश करो. तुम हमारा एक और सिरदर्द क्यों बढ़ा रहे हो'.

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तिलक राज ने अली जान पर चिल्लाते हुए उन सब को थाने से भगा दिया था.

जैसे ही ये ख़बर फैली, तो, गुज्जरों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया. उन्होंने हाइवे जाम कर दिया. इस पर मजबूर होकर पुलिस ने दो स्पेशल पुलिस अफ़सरों को आसिफ़ा की तलाश के लिए भेजा.

इनमें से एक पुलिसवाला 28 साल का दीपक खजूरिया था. अब वो भी इस मामले में अभियुक्त हैं. इन पुलिसवालों ने दो जगहों को छोड़कर बाक़ी सभी जगह अगले एक हफ़्ते तक आसिफ़ा को तलाशा.

अली जान बताते हैं कि इनमें से एक ठिकाना था सांजी राम का घर. सांजी राम एक रिटायर्ड सरकारी अफ़सर है. उस पर आसिफ़ा की हत्या की साज़िश रचने का आरोप है. दूसरी जगह एक देवस्थान यानी रसाना गांव का मंदिर थी. इसी मंदिर में आसिफ़ा को सात दिनों तक क़ैद रखा गया था.

जांचकर्ताओं के मुताबिक़, आठ बरस की आसिफ़ा को नशे की गोलियां खिलाकर उससे कई दिनों तक बलात्कार किया गया. उसका टॉर्चर किया गया. और, आख़िर में उसे क़त्ल कर दिया गया.

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अली जान बताते हैं कि उन्हें दीपक खजूरिया ने ये कहकर बरगलाया कि आसिफ़ा किसी के साथ भाग गई होगी.

आसिफ़ा के साथ इस बर्ताव का मक़सद गुज्जरों को डराकर उस इलाक़े से भगाना था. जबकि वो लोग लंबे वक़्त से हिंदुओं के साथ मिल-जुलकर रह रहे थे.

रेप केस के पीछे की हक़ीक़त

आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ऑल ट्राइबल को-ऑर्डिनेशन कमेटी की नज़ाकत ख़ताना बताते हैं कि, जब गुज्जर रसाना के पास के गांव कूटाग में आसिफ़ा को दफ़नाने पहुंचे, तो उन्हें हिंदू कट्टरपंथियों ने घेर लिया. उनके हाथों में त्रिशूल थे.

कूटाग गांव में गुज्जरों ने पिछले दिनों क़ब्रिस्तान के लिए कुछ ज़मीन ख़रीदी थी. नज़ाकत ने कहा कि, 'उन्होंने आसिफ़ा को वहां दफ़न करने का विरोध किया.

हिंदू कट्टरपंथी संगठनों ने ग़मज़दा गुज्जरों को धमकाया कि अगर वो आसिफ़ा को वहां दफ़नाने पर अड़े रहे, तो, सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठेगी'. आसिफ़ा के पिता पुजवाला ने बताया कि उन्हें अपनी बच्ची को सात मील दूर स्थित एक दूसरे गांव में जाकर दफ़नाना पड़ा.

नज़ाकत खतान कहते हैं कि आसिफ़ा की हत्या का मक़सद साफ़ था. ये क़त्ल इसलिए किया गया था ताकि मुसलमानों को डराकर कठुआ से भगा दिया जाए. जबकि इस ज़िले में महज़ दो फ़ीसद आबादी मुसलमानों की है.

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता और वकील तालिब हुसैन कहते हैं कि असल में मामला ज़मीन का था.

रेप केस पर क्यों भड़की राजनीति?

जब तालिब हुसैन ने इंसाफ़ की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन की अगुवाई की, तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. पुलिस ने उन्हें धमकियां दीं. इस घटना को जम्मू की मीडिया ने ज़रा भी तवज्जो नहीं दी.

जम्मू हिंदू बहुल इलाक़ा है. इसे दक्षिणपंथी बीजेपी का गढ़ माना जाता है. बीजेपी अभी राज्य की सत्ता में साझीदार है. हालांकि, इसे राजधानी श्रीनगर में प्रमुखता से छापा गया.

राज्य की विधानसभा उस वक़्त चल रही थी. जनवरी के आख़िर में असरदार माने जाने वाले गुज्जर नेता और विपक्षी विधायक मियां अल्ताफ़ ने विधानसभा में हंगामा मचाया.

वो अख़बारों की कतरनें लेकर विधानसभा के वेल में पहुंच गए और शोर मचाने लगे. अख़बारों में आसिफ़ा की तस्वीरें छपी थीं. मियां अल्ताफ़ ने मामले की जांच की मांग की. बीजेपी नेताओं ने अल्ताफ़ का कड़ा विरोध किया.

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कठुआ से बीजेपी विधायक राजीव जसरोटिया ने विधानसभा में कहा कि ये गुज्जरों का पारिवारिक विवाद है. गुज्जर नेता मियां अल्ताफ़ इस पर बेवजह की राजनीति कर रहे हैं.

क्या कहती है क्राइम ब्रांच की रिपोर्ट?

23 जनवरी को, यानी आसिफ़ा की लाश पाए जाने के छह दिन बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने मामले की जांच पुलिस की मशहूर क्राइम ब्रांच को सौंपने का एलान किया.

जांचकर्ताओं की विशेष टीम ने हीरानगर थाने के पुलिसवालों से पूछताछ के बाद पाया कि दीपक खजूरिया और दूसरे पुलिस अफ़सर, जो गुज्जर परिवार के साथ आसिफ़ा को तलाश रहे थे, उन्होंने बच्ची के ख़ून और मिट्टी से सने कपड़े, जांच के लिए भेजने से पहले धोए थे.

जांच से पता चला कि बच्ची को नशे की गोलियां देकर उससे बार-बार बलात्कार किया गया था. उसे रसाना गांव के मंदिर में क़ैद करके रखा गया था.

जांच के मुताबिक़, देवस्थान के संरक्षक सांजी राम ने अपने भतीजे और बेटे के साथ मिलकर ये साज़िश रची थी. उसके बेटे और भतीजे ने दो बार बच्ची से बलात्कार किया था. इसका मक़सद गुज्जरों को डराना था, ताकि वो अपनी ज़मीनें बेचकर वहां से चले जाएं.

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क्राइम ब्रांच की रिपोर्ट के मुताबिक़, आसिफ़ा को देने के लिए नशे की गोलियां खजूरिया ख़रीदते थे.

60 साल के सांजी राम, उनके बेटे विशाल और नाबालिग़ भतीजा, पुलिस कर्मी दीपक खजूरिया और सुरेंदर वर्मा, सब-इंस्पेक्टर आनंद दत्ता, हेड कॉन्स्टेबल तिलक राज और एक नागरिक परवेश कुमार को आसिफ़ा केस की चार्जशीट में अभियुक्त बनाया गया है.

क्राइम ब्रांच ने जो स्टेटस रिपोर्ट दाख़िल की है, उसके मुताबिक़, 'बच्ची को मारने से पहले, पुलिसकर्मी खजूरिया ने नाबालिग़ अभियुक्त को रोककर कहा कि उसे एक बार और रेप करना है. बलात्कार के बाद दीपक खजूरिया ने बच्ची का गला अपनी बांयी जांघ पर रखकर उसे अपने हाथ से दबाना शुरू किया. लेकिन वो उसे मार नहीं सके. इसके बाद नाबालिग़ आरोपी ने बच्ची की पीठ को अपने घुटनों से दबाकर उसका गला घोंट दिया. ये सुनिश्चित करने के लिए कि आसिफ़ा की मौत हो गई है, नाबालिग़ ने उसके सिर पर दो बार पत्थर से भी वार किया'.

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जब इस केस में पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार हो गए, तो, सांजी राम ने स्थानीय नेता अंकुर शर्मा के साथ मिलकर हिंदू एकता मंच के बैनर तले विरोध-प्रदर्शन भी आयोजित किया. प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा लहराते हुए नारेबाज़ी की. इस विरोध-प्रदर्शन में जम्मू-कश्मीर सरकार के दो मंत्री भी शामिल थे. उन्होंने अभियुक्त पुलिसवालों की रिहाई की मांग की.

आसिफ़ा के केस ने जम्मू-कश्मीर के दोनों इलाक़ों के बीद अलगाव को साफ़ ज़ाहिर कर दिया है. एक तरफ़ मुस्लिम बहुल कश्मीर है, जो आज़ादी के लिए लड़ रहा है. वहीं हिंदू बहुल जम्मू भारत में पूर्ण विलय की मांग कर रहा है. जबकि, मौजूदा मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के पिता मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने जब दक्षिणपंथी हिंदूवादी बीजेपी के साथ गठजोड़ किया था, तो उनका मक़सद राज्य के दोनों हिस्सों को क़रीब लाना था.

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निर्भया से भी ज़्यादा वीभत्स मामला

द प्रिंट वेबसाइट के प्रमुख वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने एनडीटीवी से कहा कि, 'अगर आसिफ़ा के केस से भी देश की अंतरात्मा नहीं जागती, तो पता नहीं फिर किस बात पर जागेगी. ये तो निर्भया केस से भी बदतर मामला है'.

अंकुर शर्मा लंबे वक़्त से जम्मू से मुसलमानों को निकालने की मुहिम चलाते रहे हैं. उनका तर्क है कि गुज्जर समुदाय की मौजूदगी से ये इलाक़ा जो अभी हिंदू बहुल है, वो मुस्लिम बहुल हो जाएगा. अंकुर शर्मा ने बीबीसी को बताया कि गुज्जर हमारे जंगलों और जल संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं.

वकील और बीजेपी के सचिव विजय शर्मा दावा करते हैं कि, 'गुज्जरों की दीपक खजूरिया से निजी दुश्मनी है. उन्होंने खजूरिया की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है. पुलिस इस मामले से जांच ही नहीं कर रही है'.

घटना के क़रीब तीन महीने बाद सोमवार को क्राइम ब्रांच की टीम इस मामले की चार्जशीट दाख़िल करने कोर्ट पहुंची. लेकिन कठुआ के वकीलों ने क्राइम ब्रांच की टीम का कड़ा विरोध किया. वो सरकार और क्राइम ब्रांच के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे थे. उनकी मांग थी कि मामले की जांच सीबीआई करे.

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वकील 'वापस जाओ, वापस जाओ' के नारे लगाकर अभियुक्तों का बचाव कर रहे थे. हालांकि क्राइम ब्रांच की टीम को आख़िरकार चार्जशीट दाख़िल करने में कामयाबी मिल गई. इस मामले के 8 अभियुक्तों में से सात के नाम चार्जशीट में हैं.

कठुआ बार एसोसिएशन के प्रमुख कीर्ति भूषण ने कहा कि उनके साथी इस मामले की क्राइम ब्रांच से जांच के ख़िलाफ़ हैं. भूषण ने कहा कि क्राइम ब्रांच की जांच के ख़िलाफ़ वकील पहले ही हड़ताल पर हैं. 'हम इस मामले की सीबीआई जांच चाहते हैं'.

वहीं तालिब हुसैन कहते हैं कि ये तो वकीलों की अदालत में खुली गुंडागर्दी है. वकीलों के बारे में कहा जाता है कि ये क़ानून के रखवाले हैं. लेकिन ये तो इंसाफ़ की राह में ही रोड़े खड़े कर रहे हैं.

आसिफ़ा के मां-बाप की वकालत कर रहीं दीपिका सिंह राजवत कहती हैं कि, 'ये विरोध प्रदर्शन अभियुक्तों को बचाने के लिए है. हम हाई कोर्ट में अपील करने जा रहे हैं कि इस केस को जम्मू के कोर्ट में ट्रांसफ़र किया जाए क्योंकि यहां मुक़दमे का ट्रायल नामुमकिन है'.

वहीं आसिफ़ा के पिता पुजवाला ने कहा कि जब प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा लेकर नारेबाज़ी की तो उन्हें लगा कि उनकी बेटी का फिर से बलात्कार करके उसे दोबारा क़त्ल कर दिया गया.

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