गायत्री प्रजापति और कुलदीप सेंगर, दो कैरेक्टर, दो डायरेक्टर, एक ही स्क्रिप्ट

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कुलदीप सिंह सेंगर और गायत्री प्रजापति, दो नेता, दो रसूखदार लोग, दोनों पर ही बलात्कार के आरोप और उनको बचाती राज्य सरकारें.

ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारों के बदलने से कुछ भी नहीं बदला.

आज जिस तरह से उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुलदीप सिंह सेंगर के मामले से राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है, उसी तरह फरवरी, 2017 में यूपी की राजनीति में ऐसे ही एक बलात्कार मामले की गूंज थी.

अखिलेश सरकार में ताक़तवर मंत्री माने जाने वाले गायत्री प्रजापति पर जब बलात्कार का आरोप लगा तब उनके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई शुरू होने में टालमटोल किया गया.

कैसे ख़बरों में आया था पिछला मामला?

तब पीड़िता ने आरोप लगाया था कि गायत्री प्रजापति के सरकारी आवास पर उन्हें नशीला पदार्थ चाय में पिलाकर बेहोश किया गया, फिर उनका रेप हुआ. लेकिन आरोपों पर तत्कालीन राज्य सरकार ने कोई सुध नहीं ली थी.

लेकिन केंद्र के स्तर पर ये मुद्दा ख़ूब उछला और मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया था. बावजूद इन सबके राज्य पुलिस ने 17 फ़रवरी को तभी मामला दर्ज किया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई.

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इसके बाद हद तो तब हो गई जब गायत्री प्रजापति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज होने के बाद वे अमेठी में अपना चुनाव प्रचार करते रहे. ज़ाहिर है इन सबने मिलकर अखिलेश सरकार की छवि को और भी दाग़दार बनाया था.

जिस तरह से योगी आदित्यनाथ ने कुलदीप सिंह सेंगर मामले के उछलने पर ये बयान दिया कि इस मामले में किसी को बख़्शा नहीं जाएगा, उसी तरह से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि गायत्री प्रजापति को सरेंडर कर देना चाहिए.

सेंगर की गिरफ़्तारी क्यों नहीं?

लेकिन ऐसे बयान नीयत पर सवालिया निशान ही लगाते हैं, उस वक़्त ये पूछा जा रहा था कि जब मुख्यमंत्री भी गायत्री प्रजापति की गिरफ़्तारी चाहते हैं तो पुलिस उन तक क्यों नहीं पहुंच पा रही है. इस बार भी सवाल बना हुआ है कि जब मुख्यमंत्री किसी को नहीं बख़्शने की घोषणा कर चुके हों तो राज्य सरकार ने कुलदीप सिंह सेंगर की गिरफ़्तारी क्यों नहीं की?

गायत्री प्रजापति के मामले के वक्त दलील दी जा रही थी कि वे मुलायम सिंह यादव के ख़ासमख़ास हैं, लिहाज़ा अखिलेश उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं कर सकते. भ्रष्टाचार के मामले में उनकी कथित संलिप्ता को देखते हुए जब अखिलेश यादव ने उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया भी, तो कुछ ही दिनों के अंदर वे उन्हें सरकार में वापस लेने को मजबूर हो गए थे.

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ये भी कहा जाता रहा कि गायत्री प्रजापति, समाजवादी पार्टी के लिए खनन के धंधे से फंड जुटाने वाले नेता रहे थे, लिहाज़ा उनकी पहुंच पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक सीधे थी, सार्वजनिक मंच पर मुलायम सिंह के पांव के पास बैठकर फोटो खिंचाकर इसका वे प्रदर्शन भी कर चुके थे.

इस दौरान मीडिया की सुर्खियों में 2014 के आम चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव का वो बयान भी फिर से लौट आया था जिसमें उन्होंने मुरादाबाद की चुनावी रैली में कहा कि लड़के हैं, ग़लती हो जाती है, तो क्या फांसी पर लटकाओगे.

दूसरी ओर कुलदीप सिंह सेंगर सरकार में कोई मंत्री भी नहीं हैं, ना ही भारतीय जनता पार्टी में उनकी ऐसी हैसियत है, तो ऐसा क्या है कि जिसके चलते ऐसे लग रहा है कि योगी आदित्यनाथ का सरकारी महकमा उन्हें बचाने में जुटा रहा.

कुलदीप सिंह सेंगर ना तो संघ की शाखाओं में निखरे हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी के मूल्यों में उनकी कोई आस्था रही है. वे पूरी तरह से अवसरवादी राजनीति का चेहरा हैं, पहले 2002 में बहुजन समाज पार्टी से विधायक बने थे, फिर 2007 और 2012 में समाजवादी पार्टी के विधायक रहे और 2017 में वे बीजेपी में जमा हुए नेताओं की कतार में आ गए.

बीते 16 साल से विधायकी और 50 साल से परिवार की पंचायती और प्रधानी ने कुलदीप सिंह सेंगर को वो दबंगई तो दी ही है जिसके चलते बलात्कार के आरोपों के बीच कभी वो मुख्यमंत्री सचिवालय में खिलखिलाते नज़र आए और कभी लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आवास के बाहर कहते कि आरोप ही लगा है, भगोड़ा तो नहीं हूं.

कुलदीप की 'दबंगई'

इस मामले में गायत्री प्रजापति भी एक ही तराज़ू में थे. लेकिन उनकी ऐसी तस्वीरें तब नहीं आई थीं, उलटे पुलिसिया दबिश के सामने वे फ़रार हो गए थे. प्रजापति ने राजनीति में आकर पैसों का साम्राज्य भले जुटा लिया हो लेकिन ऐसी दबंगई लाने वाली सामाजिक पृष्ठभूमि तो उनके पास नहीं ही है.

गायत्री प्रजापति पर महिला के साथ बलात्कार करने का आरोप था और महिला की नबालिग़ बेटी के साथ बलात्कार की कोशिश का आरोप था, जिसके चलते उन पर भी प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज़ एक्ट (पोक्सो) के तहत मामला दर्ज हुआ था.

कुलदीप सिंह सेंगर पर नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगा है. ये मामला भी पोक्सो क़ानून के तहत दर्ज किया गया है. हालांकि, राजनीतिक तौर पर दोनों के ख़िलाफ़ साज़िश होने की बात भी होती रही है, लेकिन ऐसी आशंकाओं की भी कोई ठोस वजह नज़र नहीं आती. प्रजापति और सेंगर दोनों अपने साथ पीड़ित महिला का नार्को टेस्ट कराने की मांग करते रहे थे.

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दोनों मामले में बारीक अंतर के आधार पर किसी के साथ रियायत नहीं बरती जा सकती, बावजूद इन समानताओं के कुलदीप सिंह सेंगर पर प्रथम दृष्टया आरोप ज़्यादा संगीन हैं क्योंकि पहले तो पीड़िता ने इस मामले में मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की और दूसरी अहम बात ये है कि पीड़िता के पिता को पीट-पीटकर मौत के मुंह में पहुंचा दिया गया है.

सोशल मीडिया में जिस तरह की तस्वीरें और वीडियो पीड़िता के पिता के आए हैं, उससे इतना यही ज़ाहिर होता है कि जब सत्ता आपके हाथ में हो तो सिस्टम का आप कैसे मखौल उड़ा सकते हैं और आम आदमी सत्ता में मदांध तंत्र के सामने कितना निरीह हो सकता है.

इस झलक उस बानगी में भी दिखी है कि योगी आदित्यनाथ के बयान कि किसी को भी बख़्शा नहीं जाएगा, बावजूद राज्य के गृह विभाग के सचिव और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कुलदीप सिंह सेंगर को विधायक जी और माननीय विधायक जी कहते नज़र आए.

गायत्री और कुलदीप में कितना अंतर

जब पत्रकारों ने पुलिस महानिदेशक के माननीय कहने पर आपत्ति जताई तो राज्य के पुलिस प्रमुख ये बताने लगे कि अभी तो उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता, अभी तो आरोप लगे हैं.

वहीं गायत्री प्रजापति के ख़िलाफ़ राज्य पुलिस की छह टीमें दिन रात लगी हुई थीं, उनके ख़िलाफ़ लुक आउट नोटिस जारी किया जा चुका था, उनका पासपोर्ट रद्द किया जा चुका था, कुलदीप सिंह सेंगर के ख़िलाफ़ राज्य पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह कहते हैं कि विधायक की गिरफ़्तारी नहीं हो सकती, वो सीबीआई करेगी.

हालांकि, पुलिस महानिदेशक और यूपी सरकार को तो ये भी बताना चाहिए था कि पुलिस हिरासत में पीड़िता के पिता की मौत कैसे हुई? लेकिन इसका जवाब देने के बदले सिस्टम और सरकार कुलदीप सेंगर के साथ नज़र आते रहे.

इसकी क्या वजह हो सकती है, फौरी तौर पर दो वजहें दिख रही हैं- एक तो कुलदीप सिंह सेंगर, योगी आदित्यानाथ की बिरादरी से आते हैं. संयोग ऐसा है कि जिस थाने ने पीड़िता का मामला दर्ज नहीं किया था, वहां के थानेदार से लेकर ज़िला पुलिस प्रमुख से लेकर राज्य पुलिस के मुखिया तक, सब ठाकुर हैं.

ऐसे में लग तो यही रहा है कि योगी आदित्यनाथ की ठाकुरवादी राजनीति से उनके हौसले बुलंद हैं और योगी आदित्यनाथ की सरकार उनको बचाने की कोशिश करती दिखी भी है.

हालांकि, एक बात ये भी कही जा रही है कि जिन लोगों के दामन के सहारे कुलदीप सिंह सेंगर बीजेपी में आए थे, वो योगी आदित्यनाथ के दूसरे खेमे के लोग हैं. माना जाता है कि राज्य में बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या, कुलदीप सेंगर को बीजेपी के पाले में लेकर आए थे.

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ये दो बातें ही ऐसी हैं जिसके चलते 325 विधायकों के समर्थन वाली सरकार पर एक विधायक के सामने बैकफ़ुट पर दिखाई दे रही है. इस पूरे मामले में सीबीआई भी कुलदीप को गिरफ़्तार करेगी.

पॉक्सो क़ानून की संवदेनशीलता कुलदीप सिंह सेंगर पर कार्रवाई की मांग करता था, ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि ये काम उत्तर प्रदेश की पुलिस ने क्यों नहीं किया?

योगी आदित्यनाथ सरकार इस मामले में सख़्त कार्रवाई करके छवि चमकाने की राजनीति में एक माइलेज ले सकती थी, जिसमें वो चूक गई है.

राज्यपाल राम नाइक की चिट्ठी?

दिलचस्प ये भी है कि राज्यपाल राम नाइक ने गायत्री प्रजापति के मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चिट्टी लिखकर सवाल उठाए थे. उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा था, 'कार्रवाई नहीं किए जाने से लोकतांत्रिक शुचिता, संवैधानिक मर्यादा व संवैधानिक नैतिकता का गंभीर प्रश्न उत्पन्न होता है.'

राम नाइक अभी भी राज्यपाल हैं, लेकिन ऐसी किसी शुचिता और मर्यादा की चिंता उन्होंने अब तक कुलदीप सिंह सेंगर मामले में नहीं जताई है.

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस दौर में जौनपुर में अपनी चुनावी रैली में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर निशाना साधते हुए कहा था, "किसी नए काम से पहले गायत्री मंत्र का जाप होता है, लेकिन गठबंधन 'गायत्री प्रजापति मंत्र' का जाप करता है."

लेकिन उन्नाव मामले में अब तक उनके किसी बयान का इंतज़ार ही है.

बहरहाल, गायत्री प्रजापति भी तो मामला दर्ज होने और पुलिस से आंख मिचौली खेलने के बाद करीब 27-28 दिन बाद गिरफ़्तार हो पाए थे. हालांकि, उनके ख़िलाफ़ लगे आरोप को भी साज़िश के तौर पर देखने वाले कम नहीं थे, जिन महिला ने उन पर आरोप लगाए थे वह तीन साल से उनके संपर्क में थीं. बावजूद इसके, उन पर पुलिस कार्रवाई में हुई देरी ने राज्य सरकार को सवालों को घेरे में ला दिया था, आम लोगों का भरोसा तार-तार अलग हुआ था.

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उत्तर प्रदेश में वो भरोसा एक बार फिर से तार तार हो रहा है, इस बार इसके लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है. इस बार बलात्कार के साथ साथ एक मजबूर पिता की हत्या का मामला भी है.

तो क्या माना जाए, दो सरकारों के लिए लगभग एक पैटर्न वाले रेप के मामलों में ढिलाई बरतने के तौर-तरीके में कोई बदलाव नहीं आया है. प्रचंड बहुमत की सरकार हो तो अपने दुलारों को बचाने का खेल अश्लीलता के साथ सामने आ जाता है.

ऐसी सरकारें ही एक दिन उत्तर प्रदेश को 'उत्तम प्रदेश' बनाएगी.

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