कठुआ और उन्नाव बाकी रेप मामलों से अलग कैसे?

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Image caption उन्नाव में विधायक अभियुक्त बनाए गए हैं, वहीं कठुआ में अभियुक्तों के समर्थन में रैली निकाली गई

कठुआ गैंगरेप और उन्नाव बलात्कार मामले में इंसाफ़ को लेकर गुरुवार को आधी रात कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब कैंडल मार्च निकाला तो इसका सोशल मीडिया पर भी ख़ासा ज़िक्र हुआ.

ट्विटर से लेकर फ़ेसबुक तक कई लोगों ने उन्हें सराहा तो कई ने उन पर राजनीति करने के आरोप लगाए. यहां तक कि कई लोगों का कहना था कि कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में हर साल सैकड़ों रेप होते हैं, उनके ख़िलाफ़ राहुल गांधी कैंडल मार्च क्यों नहीं निकालते?

साथ ही कई लोगों का कहना है कि हर साल भारत में सैकड़ों बलात्कार के मामले आते हैं, फिर इसे लेकर इतनी गहमागहमी क्यों है?

वह क्या है जो इन दोनों मामलों को बलात्कार के बाक़ी मामलों से अलग करता है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार मामले में जहां सत्तारुढ़ बीजेपी के विधायक अभियुक्त हैं. वहीं, जम्मू-कश्मीर के कठुआ में हुए आठ साल की बच्ची के साथ गैंगरेप के मामले में अभियुक्त बनाए गए लोगों के समर्थन में तिरंगा लेकर रैलियां निकाली गईं.

अगर इस लिहाज़ से भी यह बलात्कार के मामले किसी को साधारण लगते हैं तो इनकी पूरी पृष्ठभूमि समझनी होगी, जिसमें प्रथम दृष्टया सियासत की भागीदारी लगती है.

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Image caption कुलदीप सिंह सेंगर चौथी बार विधायक बने हैं

बीजेपी के विधायक बने अभियुक्त

उन्नाव से बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर इस बार चौथी बार विधायक बने हैं. सपा और बसपा से होते हुए वह बीजेपी में आए हैं. उन पर 17 वर्षीय लड़की ने जून 2017 में बलात्कार का आरोप लगाया था.

बलात्कार का यह मामला इस लिहाज़ से अलग समझा जा सकता है कि जब पीड़िता पुलिस के पास अपनी दरयाफ़्त लेकर गई तो उस समय सेंगर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई. साथ ही सेंगर के समर्थन में बीजेपी नेता भी उतर आए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें लखनऊ तलब भी किया लेकिन इस मामले में 'लीपापोती' ही नज़र आई.

इसके बाद पीड़ित परिवार ने अदालत का सहारा लिया जिसके बाद पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया कि उन पर मामला वापस लेने का दबाव बनाया जाने लगा. जब पीड़िता को कहीं भी इंसाफ़ की उम्मीद नहीं दिखी तो उसने मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह का प्रयास किया.

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Image caption सेंगर के मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा

इसके बाद उल्टा पीड़िता के पिता को जेल में बंद कर दिया गया. आरोपों के मुताबिक, इसके बाद पीड़िता के पिता की कुलदीप सेंगर के भाई ने तीन अप्रैल को पिटाई की जिसके बाद हिरासत में उनकी मौत हो गई.

इतना कुछ होने के बाद भी सेंगर पर कोई आंच नहीं आई. अंतत: उत्तर प्रदेश पुलिस से लेकर यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया जिसके बाद शुक्रवार सुबह सीबीआई ने उन्हें हिरासत में लिया और अब उनसे पूछताछ हो रही है.

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Image caption अभियुक्तों के समर्थन में रैलियां निकाली गईं

गैंगरेप पर कथित राष्ट्रवाद भारी?

कठुआ गैंगरेप मामले में अब तक की जांच में सामने आए तथ्य भी इसे असामान्य बनाते हैं.

आठ साल की मुस्लिम बच्ची, मंदिर में गैंगरेप और फिर हत्या, ये कुछ कड़ियां हैं जो जम्मू के कठुआ गैंगरेप की हैं. हालांकि, जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच की ओर से दायर की गई चार्जशीट से पता चलता है कि यह एक मुस्लिम घूमंतु जनजाति के ख़िलाफ़ सोची समझी साज़िश थी.

मुस्लिम गुर्जर समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाली पीड़िता 10 जनवरी को लापता हो गई थी और 17 जनवरी को जब उसका शव जंगलों से मिला तो उसके शरीर पर गहरी चोट के निशान थे.

उसके परिजनों का कहना था कि उसके पैर टूटे हुए थे और उसके नाख़ून काले पड़ गए थे.

पुलिस ने जांच शुरू की तो पाया कि आठ वर्षीय बच्ची को रसाना गांव के एक मंदिर में रखा गया था जहां उसके साथ पुलिसकर्मियों समेत एक नाबालिग़ ने कई दिनों तक बलात्कार किया था. इसके अलावा उसे नशीली दवाइयां दी जाती थीं.

क्राइम ब्रांच की जांच में पाया गया कि मंदिर के संरक्षक सांजी राम ने अपने नाबालिग़ भतीजे और बेटे के साथ मिलकर यह साज़िश रची थी.

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सांजी राम राजस्व विभाग से रिटायर्ड अधिकारी हैं. जांच के अनुसार, इस साज़िश का मक़सद मुस्लिम गुर्जरों को डराकर भगाना था ताकि वे अपनी ज़मीनें बेचकर वहां से चले जाएं.

इसमें थोड़ी कामयाबी भी होती दिखाई देती है क्योंकि पीड़िता के परिजनों समेत गुर्जर समुदाय के कुछ लोग उस इलाक़े को छोड़ चुके हैं.

मामला यहीं समाप्त नहीं होता है. जब आठ लोगों को इस केस में अभियुक्त बनाया गया तो उनके समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाली गई. इसे लेकर पूरी तैयारी की गई. अभियुक्त सांजी राम ने स्थानीय नेता अंकुर शर्मा के साथ मिलकर हिंदू एकता मंच बनाया और प्रदर्शन किया जिसमें जम्मू-कश्मीर सरकार के दो मंत्री भी शामिल हुए.

गैंगरेप मामले में अभियुक्तों के समर्थन में रैली निकालने जैसी घटना भारत में शायद पहली बार हुई होगी. इसके अलावा जम्मू और कश्मीर के बीच भी एक खाई चौड़ी होती नज़र आई.

जम्मू के कुछ लोग जहां अभियुक्तों के समर्थन में तिरंगा लेकर रैलियां निकाल रहे थे. वहीं, भारत प्रशासित कश्मीर में पीड़ित बच्ची को इंसाफ़ दिलाने को लेकर आम लोगों और अलगाववादियों ने भी प्रदर्शन किए.

गैंगरेप मामले को अभियुक्तों के समर्थकों ने राष्ट्रवाद का मसला बनाने की कोशिश की. क्राइम ब्रांच की टीम जब सोमवार को इस मामले की चार्जशीट दाख़िल करने अदालत पहुंची तो वकीलों ने हंगामा किया और चार्जशीट न दाख़िल हो पाए, इसकी पूरी कोशिश की.

साथ ही, गुर्जरों पर ज़मीन पर कब्ज़ा करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं और स्थानीय बीजेपी नेता विजय शर्मा का कहना है कि पुलिस ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिहाज़ से जांच नहीं कर रही है.

अगर सभी पक्षों को ध्यान में रखकर भी जांच की जाए तो पीड़िता के साथ हुई ज़्यादती मामले का सबसे बड़ा और मज़बूत पक्ष है. लेकिन इस मामले में अभियुक्तों के समर्थन में हुई रैली को जिस तरह राष्ट्रवाद का रंग दिया गया, उससे सियासत की बू ज़रूर आती है.

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