कर्नाटक में दलितों को ऐसे लुभा रही है भारतीय जनता पार्टी

  • 16 अप्रैल 2018
मोदी इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर प्रदेश में वो डॉक्टर बाबा साहब रामजी आंबेडकर हो सकते हैं लेकिन विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ रहे कर्नाटक में बीजेपी के लिए वो अभी भी डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर ही हैं.

क्योंकि कर्नाटक में बीजेपी सत्ता वापसी के लिए हर तरह के राजनीतिक हथकंडे अपना रही है.

बीजेपी ने 14 अप्रैल को डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की 127वीं जयंती के मौके पर ज़्यादातर अख़बारों में चौथाई पेज के विज्ञापन दिए थे.

इसमें उन्हें 'भारत रत्न' डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर के रूप में बताया गया है.

इस विज्ञापन में डॉक्टर आंबेडकर का एक विचार, 'लोकतंत्र सिर्फ सरकार का स्वरूप नहीं है. ये मुख्यत: सबके साथ जीने, सबको साथ लेकर चलने से जुड़ा अनुभव है. ये एक तरह का स्वभाव है जिसमें हम अपने साथ जीने वालों के प्रति सम्मान और पूजा का भाव रखते हैं', छापा गया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

डॉक्टर आंबेडकर और दलितों के घर भोजन

कर्नाटक में इसी रणनीति पर चलते हुए बीजेपी के सीएम कैंडीडेट बीएस येदियुरप्पा एक दलित के घर में वहीं का बना हुआ खाना खाने जाते हैं.

क्योंकि उन्हें पिछली बार दलित के घर में बाहर से आया खाना खाने के बाद आलोचना का सामना करना पड़ा था.

इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी इस तरह से केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े के संविधान बदलने वाले बयान के बाद दलित समुदाय में उपजे गुस्से को कम करना चाहती है.

केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने कहा था कि बीजेपी सत्ता में सिर्फ इसलिए आई है ताकि संविधान को बदला जा सके.

आंबेडकर जयंती के मौके पर आयोजित समारोहों में दलितों ने साफ तौर पर येदियुरप्पा से बात करते हुए हेगड़े के बयान से जुड़ी अपनी आपत्तियां साझा कीं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

दलितों की नाराज़गी

येदियुरप्पा को दलितों के सामने ये बताना पड़ा कि हेगड़े ने अपने उस बयान को लेकर माफी मांग ली है.

बीते महीने, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मैसूर में दलित नेताओं के साथ हुई एक बैठक में हेगड़े से जुड़े सवालों पर कन्नी काटते हुए दिखाई दिए थे.

इस मीटिंग में अमित शाह ने जब हेडगे के माफी मांगने की बात कही तो दलित नेताओं ने सवाल किया कि उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त क्यों नहीं किया गया.

इसके बाद दलित नेताओं को पुलिस की मदद से बैठक से बाहर निकाला गया. लेकिन कर्नाटक में बीजेपी के ख़िलाफ़ दलितों के गुस्से की वजह सिर्फ अनंत हेगड़े नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने जिस तरह से एससी/एसटी एक्ट के मामले में अपना पक्ष रखा, डॉक्टर आंबेडकर की मूर्तियों के असम्मान होने से जुड़ी घटनाएं, भीमा कोरेगांव हमला और उना में दलित युवाओं पर हमले जैसी घटनाओं की वजह से दलित समुदाय की नाराज़गी बनी हुई है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बीजेपी नेता अनंत कुमार हेगड़े

येदियुरप्पा की पुरानी रणनीति?

भरिपा बहुजन महासंघ पार्टी से जुड़े अंकुश गोखले ने बीबीसी हिंदी को बताया, "दलितों को पता है कि उनके समुदाय को राजनीतिक शक्ति नहीं देने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में दलितों में ये भाव पैदा हो गया है कि बीजेपी दलितों के ख़िलाफ़ हो गई है."

अगर इस गुस्से को कर्नाटक के चुनाव के लिहाज से देखें तो ये माहौल बीजेपी के लिए दिक्कत पैदा करने वाला है. साल 2008 में येदियुरप्पा की रणनीति से बीजेपी को बहुत फायदा हुआ था.

विधानसभा में रिज़र्व सीटों पर येदियुरप्पा ने लिंगायत समुदाय से दलित समुदाय के वाम धड़े को समर्थन दिलवाया. इसी तरह इनके साथ लगी हुई विधानसभा सीटों में उन्होंने सुनिश्चित किया कि दलित समुदाय के वाम धड़े से बीजेपी के लिंगायत कैंडीडेट का समर्थन करें.

लेकिन उन्हें इस समुदाय से जो समर्थन मिला था, वह इस बार कांग्रेस को मिलने के संकेत मिल रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कर्नाटक में दलितों के दो भाग

एक बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा है, "इस परिवर्तन से चौंकने की जरूरत नहीं है. हेगड़े के बयान को कई महीने बीत चुके हैं. लेकिन हम अभी तक उन्हें ये समझाने में सफल नहीं हुए हैं कि संविधान में आरक्षण से जुड़ा परिवर्तन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है."

दलित लेखक गुरप्रसाद केरागोडू कहते हैं, "दलितों के वाम पक्ष के लंबनी और वोद्दार समुदायों से बीजेपी ने कुछ लोगों को इन चुनावों में टिकट दिए हैं लेकिन अब ये लोग आशंकित नज़र आते हैं. मैं कहूंगा कि दलितों के वाम पक्ष का 60 से 80 फीसदी समर्थन बीजेपी से हटकर कांग्रेस को चला जाएगा."

कर्नाटक में दलितों को दो रूपों में देखा जाता है जिसमें एक रूप दायां पक्ष (लेफ़्ट सेक्ट) और एक बायां पक्ष (राइट सेक्ट).

'लेफ़्ट सेक्ट', 'राइट सेक्ट' के मुक़ाबले ज़्यादा है और राइट सेक्ट के बड़े नेता मल्लिकार्जुन खड़गे हैं.

'राइट सेक्ट' की बात करें तो वह 'लेफ़्ट सेक्ट' की तरह शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ नहीं है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसला

कांग्रेस सरकार ने दलितों में आंतरिक आरक्षण के लिए सदाशिव आयोग का गठन किया था.

इस आयोग की रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि आय़ोग ने आबादी के हिसाब से लेफ़्ट सेक्ट के लिए छह फीसदी आरक्षण और राइट सेक्ट को पांच फीसदी आरक्षण दिए जाने का सुझाव दिया है.

सिद्धारमैया सरकार ने इस राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसले पर अभी तक कोई भी फ़ैसला नहीं किया है.

क्योंकि अगर कर्नाटक सरकार आयोग की सिफारिशें मान लेती है तो राइट सेक्ट के मतदाताओं का कांग्रेस से मोहभंग हो जाएगा.

इमेज कॉपीरइट MANJUNATH KIRAN/AFP/Getty Images

दलित संघर्ष समिति के मावाली शंकर कहते हैं, "ये सच है कि कांग्रेस के प्रति एक तरह का असंतोष है लेकिन दलितों में युवा वर्ग उनके समुदाय पर देश भर में होते हमले और संविधान बदलने के बयान को लेकर ज़्यादा आशंकित हैं. कम से कम इस चुनाव में कांग्रेस की ओर एक बड़ा वोट बैंक खिसकेगा."

इस मामले में असली इम्तिहान इस पर निर्भर करेगा जब बीजेपी और कांग्रेस 36 आरक्षित सीटों को लेकर अपने उम्मीदवारों के नाम जाहिर करेगी.

मडिगा आरक्षण आंदोलन समिति के मपन्ना अदनूर ने बीबीसी को बताया, "दलित समुदाय में दोनों पार्टियों से निराशा का भाव है लेकिन ये इस पर निर्भर करेगा कि कौन सी पार्टी लेफ़्ट सेक्ट और विशेषत: अछूतों को प्रतिनिधित्व देती है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं.आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार