कठुआ मामले पर अपने रुख़ से पीडीपी कितनी मज़बूत हुई

महबूबा मुफ़्ती इमेज कॉपीरइट AFP

मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने को मजबूर हुए बीजेपी नेता लाल सिंह ने जम्मू-कश्मीर सरकार में साझेदार और सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को फिर से निशाने पर लिया है.

मंगलवार को कई नुक्कड़ सभाओं में पूर्व वन मंत्री ने केस की जांच सीबीआई को सौंपे जाने की मांग दोहराई और कहा कि जो सूबे में सांप्रदायिक 'फ़िज़ा तैयार करने के लिए ज़िम्मेदार हैं उन्हें अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुननी चाहिए' और पद छोड़ देना चाहिए.

लाल सिंह के रुख़ को बीजेपी की ओर से महबूबा मुफ़्ती पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. ख़ासतौर पर इसलिए भी कि कठुआ मामले में राजनीतिक तौर पर फ़िलहाल पीडीपी बीजेपी को पीछे घकेलने में कामयाब रही है.

राजनीतिक विश्लेषक बशीर मंज़र कहते हैं, 'पीडीपी के जनाधार में जो दरार आ गई थी, महबूबा उसे कुछ हद तक भर पाने में कामयाब रही हैं.'

इमेज कॉपीरइट MOHIT KANDHARI/BBC
Image caption लाल सिंह

आरोप

हालांकि बीजेपी पर मामले को सांप्रदायिक रंग देने का इल्ज़ाम है और कहा जा रहा है कि पीडीपी ने इसमें घाटी में अपने खिसकते जनाधार (जो मुख्यत: मुस्लिम है) को थामने के सुनहरे अवसर के तौर पर देखा. पूरे मामले में दूसरे दलों और ख़ासतौर पर कांग्रेस का रुख़ भी दोहरा रहा है.

कांग्रेस ने वकीलों के संगठन जम्मू हाई कोर्ट बार असोसिएशन के जम्मू बंद समर्थन दिया था. पार्टी प्रवक्ता रविंदर शर्मा ने अपने बयान में अनुसूचित जनजाति विभाग की बैठक में चर्चा में आए एक विवादास्पद मुद्दे का ज़िक्र भी किया जिसे जम्मू में मुस्लिम आबादी को बसाने की साज़िश के तौर पर पेश किया जा रहा है.

सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी के जम्मू-कश्मीर इकाई के प्रमुख ग़ुलाम अहमद मीर का एक वीडियो भी घूम रहा है जिसमें वो 'असल मुजरिमों के बाहर होने' और जांच पर सवाल उठा रहे हैं.

क्षेत्रीय पैंथर्स पार्टी ने भी वकीलों के हड़ताल का समर्थन किया था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

मुश्किल

जम्मू हाई कोर्ट बार असोसिएशन आठ साल की बच्ची के अपहरण, हफ़्ते भर क़ैद में रखने, सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले की जांच सीबीआई को देने की मांग उठाता रहा था जो बीजेपी के मंत्री या हिंदूत्व विचारधारा से संबंध रखने वाले संगठन जैसे हिंदू एकता मंच करते रहे हैं.

रोहिंग्या मुसलमानों की ग़ैर-क़ानूनी बसावट और अनुसूचित जनजाति विभाग की बैठक में जो चर्चा हुई, उनका ज़िक्र भी बार असोसिएशन के बंद आयोजन की वजहों में गिनाए गए.

मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़ विभागीय बैठक में ये बात हुई थी कि अनुसूचित जनजाति के किसी भी व्यक्ति को वन भूमि से हटाने के पहले अनुसूचित जनजाति विभाग से सलाह-मशविरा ज़रूरी है.

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जनजाति के तौर पर चिन्हित गुज्जर बकरवालों का संबंध मुस्लिम समुदाय से है.

जम्मू एक हिंदू-बहुल इलाक़ा है और उस स्थिति में किसी तरह के बदलाव की कोशिश क्षेत्र में आसान नहीं होती है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption फाइल फोटो

सामाजिक कार्यकर्ता और हाई कोर्ट के वकील अंकुर शर्मा मुस्लिमों की इस बढ़ती आबादी को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी 'आईएसआई और इस्लामीकरण की साज़िश' के तौर पर देखते हैं.

जम्मू में बातचीत के दौरान उन्होंने दावा किया कि 'जम्मू में मुसलमानों की संपत्ति ख़रीदने के लिए कई इस्लामिक संगठनों से सब्सिडी मिलती है.'

कठुआ रेप-हत्या मामले में बचाव पक्ष के वकील अंकुर शर्मा ने राज्य के रोशनी क़ानून को भी अदालत में चैलेंज किया था. इस क़ानून के तहत सरकारी ज़मीनों पर ग़ैर-क़ानूनी ढंग से बसे लोगों से बाज़ार दर लेकर उसका मालिकाना हक़ देना था.

इस मामले में भी उनका तर्क है कि इस क़ानून के तहत सिर्फ़ उन मामलों में कार्रवाई हुई है जो मुस्लिमों का था. इस क़ानून पर सीएजी ने भी अपनी एक रिपोर्ट में सवाल उठाए थे मगर उसमें धार्मिक आधार वाले फ़ैसलों का कोई ज़िक्र नहीं था.

इमेज कॉपीरइट MOHIT KANDHAR/BBC
Image caption बकरवाल समुदाय

मामले

ये सभी मामले सीधे तौर पर कठुआ बलात्कार-हत्या कांड से नहीं जुड़े हैं लेकिन एक पृष्ठभूमि के तौर पर ये बहुत सारे मामलों को साफ़ करते हैं. ख़ासतौर पर उस फिज़ा को जो इस केस के बाद क्षेत्र में साफ़ नज़र आते हैं.

मैजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई क्राइम ब्रांच की चार्जशीट में कहा गया है कि ये मामला कहीं न कहीं ज़मीन और इलाक़े में बकरवालों की बसाहट से भी जुड़ा है, मुख्य और दूसरे अभियुक्त जिसके ख़िलाफ़ थे.

हाल के दिनों में जम्मू के कई ज़िलों में गुज्जर बकरवालों ने घर बना लिए हैं. साथ ही जम्मू शहर में ही घाटी के लोगों के जायदाद ख़रीदने का सिलसिला भी पहले के मुक़ाबले तेज़ हुआ है.

मवेशियों (गायों) की आवाजाही का मामला और उस पर हुई झड़पें भी हाल के दिनों में इस इलाक़े के कई जगहों से सुनी गई हैं. इसके लिए भी कुछ लोगों ने कठुआ में बकरवालों पर आरोप लगाया था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जी-तोड़ कोशिश

बशीर मंज़र मानते हैं कि घाटी के लोगों ने हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में जायदाद ख़रीदी हैं, लेकिन उनका कहना है कि ये आर्थिक तौर पर बेहतर हालात वाले वो लोग हैं जो पहले भी जाड़ों का मौसम जम्मू में काटते थे.

वो कहते हैं, 'अब किराए के घरों में रहने की बजाए उन्होंने वहां घर बना लिए हैं. लेकिन इस तरह के घर या फ़्लैट तो कश्मीरियों के एक तबक़े ने बेंगलुरु और गुड़गांव में भी बनाए हैं.'

घाटी और जम्मू के बीच मौजूद दूरियां, अमरनाथ जैसे मुद्दों के साथ और बढ़ती गई है और उसका राजनीतिक पक्ष तब बिल्कुल साफ़ देखने में आया जब पिछले चुनाव में जम्मू क्षेत्र की 37 में से 25 सीटें बीजेपी के खाते में गईं.

उधर पीडीपी की ज़्यादातर सीटें घाटी की ओर रहीं.

आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े गुज्जर बकरवाल के साथ हुई घटना उस कश्मीर में गूंज रही है, जहां से उनके संपर्क बहुत सीमित रहे हैं.

जम्मू क्षेत्र का एक तबक़ा इसे मुस्लिम-हिंदू की रोशनी में देख रहा और समुदाय को भारत विरोधी पेश करने की जी-तोड़ कोशिश में लगा रहा. जबकि सच ये है कि गुज्जर बकरवालों ने कश्मीर के अलग करने के आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)