जज लोया मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जांच की मांग ख़ारिज की

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सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के स्पेशल जज ब्रजगोपाल हरकिशन लोया की मौत की एसआईटी से जांच करवाने की मांग को ख़ारिज कर दिया है.

महाराष्ट्र सरकार के वकील निशांत कटनेश्वरकर ने बीबीसी को बताया, "कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह दिखाने की कोशिश की कि वे इस मामले की जांच चाहते हैं लेकिन यह न्यायपालिका के ख़िलाफ़ है."

सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला इस मामले में याचिका दायर करने वालों में से एक थे.

अदालत के फ़ैसले के बाद पूनावाला ने कहा कि फ़ैसले से उनका दिल टूट गया लेकिन अदालत का फ़ैसला सर आँखों पर.

न्यायपालिका में पारदर्शिता लाने की मुहिम चलाने वाले वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण इस फ़ैसले से नाख़ुश दिखे.

उन्होंने सवाल उठाया, "उन चार जजों के बयान के आधार पर फ़ैसला सुना दिया गया जिन्होंने कभी हलफ़नामा भी नहीं दिया. उस गेस्ट हाउस के तीन कमरे खाली थे, इस पर कहानी बना दी गई कि जज एक कमरे में सो रहे थे."

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जज लोया की मौत 2014 में हुई थी

सोहराबुद्दीन शेख के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे जज बीएच लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी. वे वहां एक शादी में शामिल होने गए थे. उस वक़्त उनकी मौत की वजह दिल का दौरा पड़ना बताई गई थी.

लेकिन नवंबर 2017 में अँग्रेजी पत्रिका 'द कैरेवन' ने एक ख़बर छापी जिसमें पहली बार जज लोया की मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाया गया.

27 नवंबर को महाराष्ट्र के लातूर शहर के बार एसोसिएशन ने लोया की मौत की जांच को लेकर एक न्यायिक आयोग के गठन की मांग की ताकि सब कुछ साफ़ हो सके.

4 जनवरी 2018 को बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने जज लोया की मौत की परिस्थितियों की जाँच के लिए मुंबई हाई कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल की.

इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल दी.

इसी मामले में महाराष्ट्र के पत्रकार बंधू राज लोन ने भी स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मुंबई हाई कोर्ट में लंबित लॉयर्स एसोसिएशन की याचिका को भी ट्रांसफ़र करवा लिया और सारी याचिकाएं मिलाकर एक मामला बना दिया.

सुनवाई ख़त्म होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

क्यों मचा है लोया की मौत की जांच को लेकर बवाल

जज लोया, सोहराबुद्दीन शेख के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष अमित शाह भी आरोपी थे. बाद में शाह को इस मामले में बरी कर दिया था. नवंबर 2014 में जस्टिस लोया की मौत हुई थी.

सोहराबुद्दीन अनवर हुसैन शेख़ की 26 नवंबर 2005 की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी. इस हत्या के एक चश्मदीद गवाह तुलसीराम प्रजापति भी दिसंबर 2006 में एक 'मुठभेड़' में मारे गए.

सोहराबुद्दीन की पत्नी क़ौसर बी की भी हत्या कर दी गई थी.

इन हत्याओं के आरोप गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह पर लगे. इन्हीं मामलों में बाद में उनकी गिरफ़्तारी भी हुई.

फिर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में जाँच चलती रही. अदालत के आदेश पर अमित शाह को राज्य-बदर कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करने, सुनवाई के दौरान जज का तबादला न करने जैसे कई निर्देश दिए.

सीबीआई के विशेष जज जेटी उत्पत ने अमित शाह को मई 2014 में समन किया. शाह ने सुनवाई में हाज़िर होने से छूट मांगी लेकिन जज उत्पत ने इसकी इजाजत नहीं दी, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 26 जून 2014 को उनका तबादला कर दिया गया.

इसके बाद ये मामला जज लोया को सौंप दिया गया, मामले में अमित शाह जज लोया की अदालत में भी पेश नहीं हुए. एक दिसंबर 2014 को लोया की मौत नागपुर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई.

जज लोया की जगह नियुक्त जज एमबी गोसावी ने जाँच एजेंसी के आरोपों को नामंज़ूर करते हुए अमित शाह को दिसंबर 2014 में आरोपमुक्त कर दिया था.

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