जाते-जाते भी चार लोगों को ज़िंदगी दे गए आशुतोष

आशुतोष शर्मा
Image caption 26 साल के आशुतोष शर्मा की सड़क हादसे में मौत हो गई

26 साल की उम्र, एमबीए की पढ़ाई और उसके बाद इंटर्नशिप.

एक युवा जो अपनी उम्र के उस पड़ाव की तरफ कदम बढ़ा ही रहा था, जहां ज़िंदगी नई चुनौतियों और रंगों के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी, वह अचानक एक रात हादसे का शिकार हो जाता है, और इसी के साथ ना रंग बाकी रह जाते हैं ना चुनौतियां.

यह हादसा दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले आशुतोष शर्मा के साथ हुआ.

वे 7 अप्रैल की रात नोएडा से घर लौट रहे थे जब रास्ते में एक सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए.

हादसा इतना ख़तरनाक था कि अस्पताल ले जाने तक ही आशुतोष की हालत बेहद गंभीर हो गई थी.

कुछ देर की जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड बता दिया.

ब्रेन डेड वह स्थिति होती है जहां मरीज़ के अंग तो काम कर रहे होते हैं लेकिन दिमाग़ साथ छोड़ देता है.

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एक बहादुर मां का दिलेर फ़ैसला

घर का जवान लड़का अस्पताल के बेड पर ब्रेन डेड पड़ा हो तो यह दृश्य किसी भी माता-पिता के लिए सबसे भयावह होता है.

लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में भी आशुतोष की मां ने बहादुरी से काम लिया और एक क़ाबिले तारीफ़ फ़ैसला किया.

उन्होंने तय किया कि वे आशुतोष के शरीर के चार प्रमुख अंग दान कर देंगी जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद हो सके.

अंगदान का ऑपरेशन दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में हुआ.

इसमें शामिल डॉक्टर मुकेश गोयल ने बताया, ''हमने दो दिन तक आशुतोष की हालत में बदलाव या बेहतरी का इंतज़ार किया लेकिन कुछ हुआ नहीं. फिर हमने दिमाग़ की जांच की जिसमें साफ़ हो गया वे अब कभी होश में नहीं आएंगे.''

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घर के अकेले बेटे थे आशुतोष

आशुतोष अपने माता-पिता के अकेले बेटे थे, उनसे बड़ी एक बहन है जो शादी के बाद अमरीका में रहती हैं.

उनके एक रिश्तेदार ने बताया कि आशुतोष ने हाल ही में नोएडा की एक कंपनी में इंटर्नशिप शुरू की थी. ''उन्होंने अपना एमबीए पूरा कर लिया था और जल्दी ही हम उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होते देखने का इंतजार कर रहे थे लेकिन इस हादसे ने सारे सपने तोड़ दिए.''

आशुतोष के शरीर से उनका हृदय, लिवर और दोनों किडनियां निकालकर चार अलग-अलग ज़रूरतमंद लोगों को दे दी गईं.

डॉक्टर गोयल ने बताया, ''आशुतोष का हृदय, लिवर और दोनों किडनियां बिल्कुल स्वस्थ अवस्था में थे, उनका दिल हरियाणा के जींद में रहने वाले 33 साल के एक युवक को लगाया गया, वह पिछले कई महीनों से हार्ट फेलियर से जूझ रहे थे, उनका लिवर एक 49 साल के व्यक्ति को लगाया गया और आशुतोष की दोनों किडनियां भी दो अलग-अलग मरीज़ों को लगाई गईं.''

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नहीं मिलते अंगदान करने वाले

डॉक्टर गोयल बताते हैं कि पिछले 6 महीने में उन्होंने पहली बार अंगदान के लिए तैयार होने वाले परिजन देखे, जबकि उनके अस्पताल में रोज़ाना कई लोग दुर्घटना के शिकार होकर आते हैं जिनमें से कई की मौत भी हो जाती है.

डॉक्टर गोयल के मुताबिक़, ''हमारे देश में सिर्फ़ हार्ट ट्रांसप्लांट की बात करें तो हर साल 10 हज़ार हार्ट ट्रांसप्लांट की ज़रूरत होती है, लेकिन मुश्किल से 100 हार्ट ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं. हर साल कम से कम 3 लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटना में हो जाती है और इनमें से अधिकतर की उम्र 60 साल से कम होती है यानी अंगदान के लिए ये बेहतर विकल्प हो सकते हैं. लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से ये तमाम लोग अंगदान के लिए तैयार नहीं होते.''

ऑर्गन डोनेशन इंडिया के आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग डेढ लाख लोगों को किडनी की ज़रूरत है लेकिन महज़ 3 हज़ार लोगों को ही किडनी मिल पाती है.

इसी तरह लिवर की ज़रूरत 25 हज़ार मरीज़ों को है लेकिन महज़ 800 लोगों को ही लिवर मिल पाता है.

अंगदान के इंतज़ार में लगभग 90 प्रतिशत मरीज़ों की मौत हो जाती है.

आशुतोष के परिजन और डॉक्टर मानते हैं कि मृतकों के अंगों से जुड़ी भ्रांतियों और मिथकों को दूर करने की ज़रूरत है जिससे एक सांस रुके तो कुछ और सांसों को चलते रहने का सहारा दे जाए.

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