नज़रियाः क्या अपने घर में चीन मना पाएगा सुषमा-निर्मला को?

  • 21 अप्रैल 2018
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Image caption भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

भारतीय विदेश मंत्री सुषमा शनिवार से चार दिन के दौरे पर चीन पहुंच रही हैं.

इस दौरान वो चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात करेंगी. उम्मीद जताई ज रही है कि दोनों मंत्रियों के बीच आपसी रिश्ते मज़बूत बनाने और सहयोग बढ़ाने पर बात होगी.

भारत और चीन के बीच तनाव पैदा करने वाले ऐसे कई मुद्दे हैं जिनके कारण दोनों विदेश मंत्रियों की इस मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है.

चीन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता सुषमा स्वराज के इस दौरे की महत्ता को समझाते हुए कहते हैं कि सुषमा स्वराज की चीन की यात्रा शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गानाइनाइज़ेशन की बैठक में शिरकत करने के उद्देश्य से है.

इसके बाद जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चीन आने वाले हैं और शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गानाइनाइज़ेशन की राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में हिस्सा लेंगे.

पहली बार इस स्तर पर भारत इस बैठक में शिरकत कर रहा है क्योंकि भारत और पाकिस्तान अभी-अभी इसके स्थाई सदस्य बने हैं. अभी तक वो ऑबज़र्वर की भूमिका में ही थे.

इस बैठक में क्या बातें उठा जा सकती है इसका संकेत तो मोदी ने लंदन में ये कहते हुए दे ही दिया है कि पाकिस्तान चरमपंथ को शह दे रहा है.

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क्या है एससीओ?

शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइजेशन यानि एससीओ की यह बैठक कितनी महत्वपूर्ण है इस बारे में सैबल दासगुप्ता आगे बताते हैं कि एससीओ में मुख्य उद्देश्य है चरमपंथ से लड़ना. लेकिन इस फोरम में दो देश आपसी मतभेदों को सुलझाने पर बात नहीं कर सकते लेकिन पूरे प्रदेश के विकास की बात कर सकते हैं.

तो ऐसे में ये बड़ा सवाल है कि भारत किस तह उस मुद्दे को उठाएगा और इस पर पाकिस्तान का क्या जवाब होगा और चीन की क्या प्रतिक्रिया होगी.

इस पर शुक्रवार को चीनी विदेश मंत्रायल में सवाल उठाया गया जिसके जवाब में चीन ने कहा कि पाकिस्तान की निंदा ना करते हुए उसका समर्थन किया जाना चाहिए क्योंकि वह चरमपंथ का बड़ा नुकसान उठा रहा है और चरमपंथ की लड़ाई में सबसे बड़ा योगदान पकिस्तान का है.

चीन के लिए पाकिस्तान बेहद अहम है क्योंकि चीन का वन बेल्ट वन रोड परियोजना सिर्फ वहीं सफल हो पाया है और वो नहीं चाहेगी कि मतभेद के कारण एससीओ टूट जाए. चीन सुषमा स्वराज को समझाने की पूरी कोशिश करेगा.

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जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसहूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी घोषित करने के लिए भारत ने कई बार कोशिश की है लेकिन चीन हमेशा इसका विरोध करता रहा है.

इस मुद्दे पर मोदी थोड़ा भी पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि और कोई मुद्दा हो ना हो मोदी ने हर बैठक में इस मुद्दे को उठाया है.

चीन इस बात को लेकर दुनिया में काफ़ी बदनाम है कि जहां-जहां चरमपंथी हैं उन देशों के साथ चीन के मित्रतापूर्ण संबंध हैं.

चीन का अगर सामना करना है तो पाकिस्तान का मुद्दा उठाना लाज़मी है. और तालिबान के कारण दुनिया में चिंता है इसीलिए मोदी ने जानबूझ कर ये मुद्दा लंदन में उठाया.

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क्या एससीओ की बैठक में डोकलाम विवाद पर भी कोई बात हो सकती है?

एससीओ की बैठक में भारत की तरफ से रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण भी शामिल होने वाली हैं. भारत में कई लोग नहीं जानते हैं कि चीन में उन्हें काफ़ी पसंद किया जाता है, ख़ासकर, डोकलाम के वक्त उन्होंने जो कड़ा रवैया अपनाया उसके लिए उनकी काफी इज़्ज़त की जाती है.

लेकिन रूस के साथ बातचीत में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रहेगी क्योंकि रूस के लिए भारत रक्षा मामलों में उसका सबसे बड़ा ख़रीदार है लेकिन तेल के मामले में चीन उसका सबसे बड़ा ख़रीदार है. तो ऐसे में कशमकश की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता.

वन बेल्ट वन रोड परियोजना के मामले में भारत पर चीन दवाब बनाने की पूरी कोशिश करेगा क्योंकि भारत इसका समर्थन नहीं करता. फ़िलहाल चीन ने नेपाल से हाथ मिलाया है और वहां लुबिंनी तक अपना रेल नेटवर्क बिछानेवाला है जो भारत की सीमा से नज़दीक है. भारत पर आने वाले वक्त में दवाब बढ़ना लाज़मी है.

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चीन और भारत के बीच तनाव के मुद्दे

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डोकलाम मुद्दा और भूटान

डोकलाम विवाद

जून, 2017 में जब चीन ने जब विवादित डोकलाम इलाके में सड़क निर्माण का काम शुरू किया तो भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया था. ये एक विवादित पहाड़ी इलाक़ा है जिस पर चीन और भूटान दोनों ही अपना दावा जताते हैं और भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है.

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ओबीओआर पर भारत का विरोध

पूरी दुनिया में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए चीन एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के 65 देशों को जोड़ने की योजना बना रहा है. इस परियोजना का नाम दिया गया है 'वन बेल्ट वन रोड' यानी ओबीओआर परियोजना.

इसके तहत चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक सड़क निर्माण कर रहा है जो गिलगित-बलूचिस्तान के इलाक़े से हो कर गुज़रती है. ये हिस्सा फिलहाल पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में आता है लेकिन इसे भारत अपना हिस्सा मानता है.

इस मामले में एक तरफ़ चीन कश्मीर पर भारत के हक़ को नकारती है, वहीं दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के गिलगित-बलूचिस्तान के इलाक़े को ले कर किए दावे को चीन स्वीकार करती है.

साथ ही चीन ने हाल में भारत के पड़ोसी नेपाल से साथ रेल और सड़क मार्ग बढ़ाने पर सहमति बनी है.

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एनएसजी में भारत का विरोध

न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप यनी एनएसजी में भी भारत की एंट्री का चीन विरोध करता रहा है. इस गुट में 48 देश शामिल हैं. भारत को अमरीका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, मेक्सिको जैसे देशों का समर्थन हासिल है, लेकिन चीन भारत का विरोध करता रहा है जबकि वो इसके लिए पाकिस्तान का समर्थन करता है.

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मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ प्रतिबंध का विरोध

भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैशे मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ प्रतिबंध चाहता है. लेकिन चीन बार-बार भारत के इस प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र में विरोध कर चुका है जिसकी वजह से अज़हर के ख़िलाफ़ प्रतिबंध नहीं लग पा रहे हैं.

'मसूद अज़हर पर चीन के रुख़ से हैरान भारत'

मसूद अज़हर पर चीन का फिर वीटो

2016 में मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाए जाने के लिए चीन के अलावा सुरक्षा परिषद के बाकी 14 सदस्य पहले ही हामी भर चुके थे लेकिन चीन के वीटो से भारत की कोशिशों पर पानी फिर गया.

(चीन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता से बीबीसी संवाददाता मानसी दाश की बीतचीत पर आधारित.)

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