नौकरियों के विज्ञापन में महिलाओं के साथ होता है भेदभाव?

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दिल्ली की रहने वालीं जसप्रीत को कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश थी. वो कुछ ऑनलाइन जॉब पोर्टल के ज़रिये भी नौकरी ढूंढ रही थीं.

जसप्रीत बताती हैं, ''मुझे एक नौकरी काफ़ी अच्छी लगी थी. वो अकाउंट्स से जुड़ा काम था और सैलरी भी बहुत अच्छी थी. लेकिन, उसमें नाइट शिफ़्ट लिखी हुई थी. मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई कि अकाउंट्स के काम में नाइट शिफ़्ट क्यों है. पर कारण जो भी हो मैं उस नौकरी के लिए अप्लाई नहीं कर पाई.''

''मैं नाइट शिफ़्ट नहीं कर सकती थी. साथ ही उसमें ये भी नहीं लिखा था कि रोज़ाना नाइट शिफ़्ट है या कभी-कभी और क्या वो कैब सर्विस देंगे या नहीं. इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया.''

ऐसे ही कई लड़कियां नाइट शिफ़्ट या ट्रैवल करने वाली नौकरियां नहीं कर पातीं. यहां तक कि उच्च पदों पर भी महिलाएं बहुत कम मिलती हैं. आख़िर इसके क्या कारण हैं?

वर्ल्ड बैंक 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक नौकरियों के ऑनलाइन विज्ञापनों में पुरुषों को तरजीह दी जाती है.

इस रिपोर्ट में भारत में निकलने वाले तकरीबन 8 लाख नौकरियों के ऑनलाइन विज्ञापनों का अध्ययन किया गया.

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इसमें पाया गया कि दरअसल नौकरियों के ऑनलाइन विज्ञापन में ही भेदभाव किया जाता है और कई बार महिलाओं को आवेदन का मौका नहीं मिलता.

विज्ञापनों में महिलाओं और पुरुषों के बीच ये भेदभाव वेतन से लेकर ख़ास तरह के कामों में पुरुषों को प्राथमिकता देने में दिखता है.

रिपोर्ट यह कहती है कि ज़्यादा वेतन वाली नौकरियों में पुरुषों को प्राथमिकता मिलती है और कम वेतन वाली नौकरियों में महिलाओं की मांग होती है.

एक ऑनलाइन जॉब पोर्टल बाबाजॉब्स डॉट कॉम से मई 2011 से अप्रैल 2017 के बीच लिए गए 8 लाख से ज़्यादा सैंपल के आधार पर ये रिपोर्ट दी गई है. बाबाजॉब्स का जून 2017 में क्विकरजॉब्स डॉट कॉम में विलय हो गया है.

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि 8 लाख में से करीब तीन लाख नौकरियों में लैंगिक प्राथमिकता दी गई है. यहां तक कि जिन नौकरियों में पुरुषों को तरजीह दी गई वो ज़्यादा वेतन वाली हैं और महिलाओं की कम वेतन वाली.

कई नौकरियों में महिलाओं को नौकरी की शिफ़्ट के हिसाब से भी कम मौका दिया जाता है.

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कैसे दी जाती है प्राथमिकता

भारतीय श्रम बाज़ार में महिलाओं की भागीदारी 27 प्रतिशत है. जबकि इस मामले में वैश्विक औसत 52 प्रतिशत और दक्षिण एशिया में 29 प्रतिशत है.

नौकरियों के ऑनलाइन विज्ञापनों में ये साफ़तौर पर लिखा हुआ तो कम ही दिखता है कि कंपनी को महिला चाहिए या पुरुष लेकिन दोनों के बीच ये चुनाव पहले ही हो चुका होता है.

रिपोर्ट कहती है कि जॉब पोर्टल पर कंपनियों के पास एक विकल्प होता है जिसमें वो किसी नौकरी के लिए महिला या पुरुष का चुनाव कर सकते हैं.

इस बात की पुष्टि क्विकर जॉब्स ने भी की. पोर्टल के एस्केलेशन विभाग में सीनियर एक्जिक्यूटिव हेमंत कुमारयम ने बीबीसी को बताया, ''हमारी वेबसाइट पर कोई भी कंपनी रजिस्ट्रेशन करके अपने विज्ञापन अपलोड कर सकती है. जब कंपनी विज्ञापन अपलोड करती है तो उसे कई तरह के फ़िल्टर मिलते हैं.''

''जैसे कंपनी शहर, लिंग, कार्य भूमिका, शिक्षा और अनुभव आदि का चुनाव कर सकती है. यानी अगर कंपनी विज्ञापन अपलोड करते समय पुरुष का चुनाव करेगी तो वो विज्ञापन सिर्फ पुरुषों को दिखाई देगा.''

इसमें 301,929 नौकरियों में से 180,058 में पुरुषों को चुना गया था और 121,324 में महिलाओं को चुना गया था.

अध्ययन में लगभग 23 हजार विज्ञापन ऐसे भी पाये गये हैं जिनमें स्पष्ट तौर पर लैंगिक प्राथमिकता तो नहीं दी गई लेकिन विज्ञापन लिखने का तरीका ऐसा था जिसमें अप्रत्यक्ष लैंगिक भेदभाव दिखता है.

क्या कहता है डाटा

अध्ययन के अनुसार नौकरी के विज्ञापनों में महिला और पुरुष का चुनाव अनुभव, कंपनी के प्रकार, शिफ़्ट और क्षेत्र के आधार पर किया गया है.

अनुभव की बात करें तो किसी पद पर अनुभव बढ़ने के साथ ही महिलाओं की मांग भी कम हो गई है. जैसे एक से दो साल के अनुभव के लिए 45 नौकरियों में लैंगिक प्राथमिकता दी गई. इसमें 26 विज्ञापनों में पुरुषों और 19 में महिलाओं को तरजीह मिली. यानी इसमें 7 विज्ञापनों का अंतर है.

वहीं, चार से पांच साल के अनुभव वाली नौकरियों में 56 विज्ञापनों में से 40 में पुरुषों और 16 में महिलाओं को प्राथमिकता मिली. इसमें 24 विज्ञापनों का अंतर है. ये आंकड़े औसतन प्रति 100 नौकरियों के आधार पर दिया गया है.

इससे पता चलता है कि ज़्यादा अनुभव की नौकरियों में पुरुषों की मांग ज़्यादा है. किसी भी कंपनी में अनुभव के अनुसार वेतन और पद भी तय होता है. ऐसे में अपने आप महिलाएं निचले और कम वेतन वाले पदों के लिए चुनी जाएंगी क्योंकि ऊंचे पदों के विज्ञापन उन तक पहुंचेंगे ही नहीं .

शिफ़्ट की बात करें तो नाइट शिफ़्ट में महिलाओं को सबसे कम चुना गया है. वहीं, पार्ट टाइम नौकरियों में महिलाओं को पुरुषों से ज़्यादा तवज्जो दी गई है.

नाईट शिफ़्ट वाली 14 नौकरियों में पुरुषों और 5 में महिलाओं को प्राथमिकता मिली. पार्ट टाइम नौकरी में ये आंकड़ा 20(पुरुषों) और 25 (महिलाओं) का है.

फ़ुल टाइम नौकरियों में भी ज़्यादातर पुरुषों की ही मांग है.

घरेलू कामों में महिलाओं की मांग

अगर क्षेत्र के अनुसार बात करें तो प्रोफ़ेशनल, मशीन और सेल्स से जुड़ी नौकरियों में पुरुषों की ज़्यागा मांग होती है. मशीन के काम से जुड़ी नौकरियों के 52 विज्ञापनों में लैंगिक प्राथमिकता दी गई और इसमें सिर्फ़ 1 विज्ञापन में महिलाओं को तरजीह मिली.

आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं को सर्विस, बीपीओ, क्लरिकल नौकरियों में ज़्यादा महत्व मिलता है.

प्रोफ़ेशनल नौकरियों में मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, आईटी, फाइनेंस से जुड़ी नौकरियां आती हैं. वहीं, सर्विस सेक्टर में ब्यूटीशियन, कुक, नैनी, नर्समेड और स्टूअर्ड शामिल हैं.

इसके अलावा घरेलू कामों के लिए भी महिलाओं को प्राथमिकता मिलती है. वहीं, बीपीओ क्षेत्र में लैंगिक विभाजन भी बहुत कम है.

वेतन का भेदभाव समान पद के लिए भी होता है. जिन नौकरियों में लैंगिक प्राथमिकता दी गई है उनमें एक ही पद के लिए पुरुषों का औसत वेतन 7,926 रुपये और महिलाओं का 6,598 रुपये रखा गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके पीछे नियोक्ताओं का महिलाओं को लेकर पारंपरिक नज़रिया ज़िम्मेदार है. इससे पता चलता है कि आज भी नियोक्ताओं में क्षमताओं, कुशलता और कार्य प्रदर्शन को लेकर पुरुष को बेहतर मानने की एकतरफ़ा धारणा बनी हुई है.

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