'मोदी विरोध में यशवंत सिन्हा की दिक़्क़तें नहीं छुप पाईं'

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पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा की अगुआई वाले 'राष्ट्र मंच' का पटना सम्मेलन कोई सियासी हलचल मचा देने जैसा असरदार साबित नहीं हो पाया.

बहुत गरम-गरम दावे किए गए थे, मगर मामला अंतत: ठंडा ही रहा.

यशवंत सिन्हा की बातों में से एक ही किसी तरह खींचतान कर सुर्खी बन पाई, जब उन्होंने कहा, ''मैं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से आज अपने संबंध विच्छेद की घोषणा करता हूँ.''

इस घोषणा में भी उतना दम इसलिए नज़र नहीं आया क्योंकि बीजेपी से संबंध विच्छेद वाली उनकी स्थिति तो बीते कई सालों से दिख रही थी.

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ख़ैर, इस मौक़े पर किए गए उनके दूसरे एलान पर ग़ौर करिए.

उन्होंने कहा, ''मैं अब दलगत राजनीति से भी संन्यास ले रहा हूँ.''

लेकिन जिस मंच से वह बोल रहे थे, उस मंच पर उन्होंने चुन-चुन कर बीजेपी या मोदी विरोधी 'दलगत राजनीति' करने वाले नेताओं को ही आमंत्रित किया था.

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दलीय सियासत की परिभाषा!

कोई दल निरपेक्ष लोगों का तो यह सम्मेलन था नहीं कि यशवंत जी वहाँ दलगत राजनीति से ख़ुद को दूर बता पाते!

क्या किसी एक राजनीतिक संगठन के ख़िलाफ़ दूसरे राजनीतिक संगठनों को एकजुट करना दलीय सियासत के दायरे में नहीं आता?

यशवंत सिन्हा बोले कि यहाँ लोकतंत्र ख़तरे में पड़ गया है, इसलिए वह किसी दल में गए बिना लोकतंत्र बचाओ मुहिम चलाएँगे. और ये भी जोड़ दिया कि पटना चूँकि तानाशाही के ख़िलाफ़ लोकशाही के लिए हुए जेपी आंदोलन की भूमि है, इसलिए उन्होंने 'राष्ट्र मंच' के अभियान को यहीं से शुरू किया है.

यानी इशारा तो यही मिलता है कि अब यशवंत सिन्हा ख़ुद को लोकनायक जयप्रकाश की भूमिका में उतारने को इच्छुक या तत्पर हो गए हैं.

इसमें बीजेपी के दूसरे बहुचर्चित बाग़ी पटनिया सांसद शत्रुघ्न सिन्हा अपने सिन्हा बंधु के कंधे से कंधा मिला कर चलने को तैयार हैं.

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'बिहारी बाबू' की मुश्किल

तभी तो स्वयंभू बिहारी बाबू ने इसी मंच से बीजेपी को फिर ललकारा कि हिम्मत हो तो शत्रुघ्न को पार्टी से निकाल कर देखो. जबकि लोग तो यही समझते हैं कि बीजेपी से बारबार अपमानजनक उपेक्षा झेल कर भी यह अभिनेता अपनी संसदीय सदस्यता छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा.

उधर बीजेपी भी ज़िद पर अड़ी है कि इस 'शत्रु' के हमले को वह 'डैम केयर' के हथियार से ही कुंद करती रहेगी.

सिन्हा बंधुओं की सियासी दशा-दिशा बताने वाले इस सम्मेलन-मंच पर जो बैठे थे, उनमें प्राय: सभी सक्रिय भागीदारी वाले वक्ता के बजाय आमंत्रित प्रेक्षक की मुद्रा में नज़र आ रहे थे.

तेजस्वी यादव (आरजेडी), रेणुका चौधरी (कांग्रेस), जयंत चौधरी (आरएलडी), संजय सिंह (आप) और घनश्याम तिवारी (सपा) समेत अन्य वक्ताओं ने क्या कहा, वह सब यशवंत सिन्हा की दो-तीन घोषणाओं के नीचे दब कर रह गया.

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यानी सम्मेलन-मंच पर विपक्षी एकजुटता का कोई ताज़ा दमख़म नहीं दिखा. सिर्फ़ नरेंद्र मोदी और बीजेपी/संघ विरोधी पुराने जुमले ही ज़्यादा दोहराए गए.

वैसे भी, जब हज़ारीबाग़ (झारखंड) निवासी यशवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा मोदी मंत्रिमंडल में बड़े विभाग के साथ सुशोभित हो रहे हों, तब बिहार में आ कर मोदी-विरोध का समां बाँधने में यशवंत जी को दिक़्क़त तो होगी ही.

जब पटना संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधि शत्रुघ्न सिन्हा के प्रति यहाँ लोगों में बढ़ी निराशा जनाक्रोश की शक्ल में उभरने लगी हो, तब यहाँ जनाधार के अभाव वाले यशवंत की सियासी हैसियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

इनके सत्ताकालीन अतीत से जुड़े विवादों को बीजेपी भी नहीं पचा पा रही है, तो ग़ैरबीजेपी ख़ेमा इन्हें लोकशाही बचाने निकले योद्धा की शक्ल में कैसे क़बूल करेगा?

लेकिन हाँ, इनसे जुड़ी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो वित्तीय मामलों की समझ रखने वाले सियासतदां के रूप में इनकी पहचान कराता है.

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ख़ासकर ऐसे समय में, जब मोदी सरकार के वित्तीय फ़ैसलों या आर्थिक प्रबंधन से उत्पन्न समस्याओं को खुल कर बताने और सरकार को चेताने वालों की सख़्त ज़रूरत है.

दूसरी बात कि सरकारों की शासकीय मनमानी और परदे के पीछे चल रही गड़बड़ियों को पकड़ने वाली विपक्षी जमात में यशवंत सिन्हा जैसे जानकार का रहना ज़रूरी है़.

'लोकतंत्र बचाओ' नाम का अपने कद से भी बड़ा और भारी झंडा उठाने की कोशिश में औंधे मुँह गिरने का क्या फ़ायदा?

इन पर बीजेपी का सबसे प्रचारित आरोप यही है कि यशवंत जी जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं. मेरा मानना है कि खाने वाली थाली में भोजन विषाक्त होने लगे तो उसमें छेद कर ही देना चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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