महाभियोग का नोटिस ख़ारिज होने की वजह क्या रही?

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ विपक्ष के महाभियोग नोटिस को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने ख़ारिज कर दिया है.

कहा जा रहा है कि उपराष्ट्रपति नायडू ने तकनीकी आधार और इसके लिए दिए जाने वाले तर्कों में मज़बूत आधार नहीं होने के कारण इसे ख़ारिज किया है. कांग्रेस समेत सात दलों ने महाभियोग का नोटिस दिया था.

विपक्ष के सात दलों के 71 सांसदों ने महाभियोग के नोटिस पर हस्ताक्षर किया था. इस पर सात रिटायर्ड सांसदों के हस्ताक्षर की भी बात सामने आ रही है. हालांकि सात सांसदों के हस्ताक्षर अमान्य होने के बावजूद ज़रूरी सांसदों का समर्थन था क्योंकि 50 से ज़्यादा सांसदों के ही हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं. लेकिन ऐसे प्रस्ताव पर कोई भी फ़ैसला सभापति के विवेकाधीन होता है.

सरकार का पहले से ही मानना था कि विपक्ष के पास इस क़दम के लिए कोई मज़बूत ज़मीन नहीं है और साथ ही राज्यसभा में उसके पास पर्याप्त सांसद नहीं हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इस मामले में नायडू ने पूर्व लोकसभा सचिव सुभाष कश्यप से भी संपर्क किया था. सुभाष कश्यप ने बीबीसी से कहा कि विपक्ष के नोटिस को उपराष्ट्रपति ने ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह नोटिस राजनीति से प्रेरित थी इसलिए स्वीकार नहीं किया गया.

क्या है तार्किक आधार

कश्यप का कहना है कि 'केवल ज़रूरी सांसदों का हस्ताक्षर ही एक मात्र शर्त नहीं है बल्कि नोटिस स्वीकार करने के मज़बूत तार्किक आधार भी होने चाहिए. उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रति अपने विवेक के आधार पर तय करते हैं कि नोटिस राजनीति से प्रेरित है या नहीं.

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मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ पूर्व क़ानून मंत्री शांतिभूषण ने भी याचिका दायर की है. शांतिभूषण ने सुप्रीम कोर्ट में केसों की सुनवाई के आवंटन में भेदभाव करने को लेकर दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ याचिका दायर की है. इस याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमों की सुनवाई का आवंटन जिन बेंचों को किया जाता है उसमें भेदभाव और भाई-भतीजावाद है.

कहा जा रहा था कि मसला सिर्फ़ इतना है कि विपक्ष के इस नोटिस को किस तरीक़े ख़ारिज किया जाता है. यह भी कहा जा रहा था कि अगर विपक्ष के इस नोटिस को नहीं स्वीकार किया जाता है तो भी अपने आप में असामान्य होगा.

क़ानूनविदों का कहना है कि इतिहास 6 में से चार ऐसी मिसालें हैं जब सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों के ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस दिया गया तो उन्हें स्वीकार किया गया. इन 6 में से पांच मामले में पैनल बनने से पहले जज ने अपने फ़ैसले को 'संशोधित' कर दिया था.

1970 में केवल एक बार महाभियोग का नोटिस ख़ारिज किया गया था. तब मुख्य न्यायाधीश स्पीकर के पास पहुंचकर इस बात को समझाने में कामयाब रहे थे कि मामला गंभीर नहीं है.

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