नज़रिया: क्या सम्मेलनों से लौटेगा सीपीएम का स्वर्णिम इतिहास

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सीपीएम के एक सम्मेलन के दौरान ईएमएस नंबूदरीपद ने अपने सहज, मज़ाकिया और व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा था, "आज भी साम्राज्यवाद में जकड़े हुए, ठेके वाले सामंतों के नेतृत्व में जी रहे भारत को कामगारों के नेतृत्व से तोड़े जाने की ज़रूरत है और मेहनत करने वाले वर्ग द्वारा रखी गई आधारशिला समेत मिडिल क्लास बुद्धिजीवियों द्वारा लोगों का लोकतांत्रिक राज्य बनाने की जरूरत है."

इन शब्दों को कहने से पहले ही उन्होंने पूछा कि क्या कोई संकल्प लिख सकता है.

भाषण सुनने वालों में आंध्र प्रदेश से आने वाले आयोजक सदस्य के रूप में मैंने और मेरे कर्नाटक के एक साथी (शायद कामरेड रामी रेड्डी) से मैंने पूछा, "क्या आप लिख सकते हैं"

वह मुस्कुराए और सहमति में सिर हिलाया.

ये साम्यवादी शब्द-जाल का प्रभाव है!

गठबंधन कोई नया मसला नहीं

जब मैं 22वीं अखिल भारतीय सीपीएम सम्मेलन के बारे में लिखने बैठा तो मुझे अपने ये शब्द याद आए. मुझे याद नहीं कि इस शानदार सम्मेलन में कौन से मुद्दों पर बात की गई. लेकिन प्राथमिक रूप से इस सम्मेलन में साल 2019 के चुनाव में बीजेपी को हराने को लेकर लिए संकल्प लिया गया.

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लेकिन इस राजनीतिक संघर्ष में कांग्रेस को शामिल किया जाए या नहीं, ये एक दूसरा प्राथमिक मुद्दा है. मीडिया सूत्रों के मुताबिक़, अखिल भारतीय सीपीआई (एम) सचिव सीताराम येचुरी उस समूह के अगुआ थे जो इसके पक्ष में थे. वहीं, पार्टी के पूर्व सचिव प्रकाश करात इसका विरोध करने वालों में मुख्य नेता थे.

दरअसल, इस विचार-विमर्श में नया कुछ भी नहीं है. लगभग चालीस साल पहले जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था तब जालंधर में हुई पार्टी के 10वें सम्मेलन में गंभीर बहस हुई थी.

मैं उन दिनों प्रतिनिधि हुआ करता था. तब ये चर्चा की गई थी कि जनसंघ की सहयोगी जनता पार्टी को इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस को हराने में सहयोगी बनाना चाहिए या नहीं.

तब तत्कालीन सीपीआई संस्थापक सचिव पुच्चलापल्ली सुंदरैया जनता पार्टी के साथ गठजोड़ के ख़िलाफ़ थे. वहीं पोलित ब्यूरो के दूसरे सदस्यों ने इसका समर्थन किया था. आख़िर में मतदान के बिना एक बीच के रास्ते वाला प्रस्ताव पेश किया गया और स्वीकार किया है.

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संकल्प चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन बहस होनी चाहिए

बीते चालीस सालों में सीपीआई (एम) मजबूत हुई कमज़ोर? क्या विशाखापट्टनम में हुए 21वें सम्मेलन में स्वीकार किया गया संकल्प अभी भी स्वीकार्य है या नहीं?

सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्बाचेव पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लास्नोस्त (खुलापन) जैसी नीतियों से भौतिक और असल स्थिति का आकलन करने को कहा करते थे ताकि उसके अनुसार बदलाव लाए जा सकें.

ये अलग मामला है कि लोग आज गोर्बोचेव को सोवियत संघ को तोड़ने वाला नेता और स्टालिन को तानाशाह कहते हैं. लेकिन आज की भौतिक और तथ्यात्मक स्थिति का आकलन किया जाना पहली प्राथमिकता है.

देश में संसद के पहले कार्यकाल में संगठित साम्यवादी पार्टी के नेता पुचलापल्ली सुंदरैया विपक्ष में बैठने वाले अकेले नेता थे. लेकिन वर्तमान लोकसभा में 10 साम्यवादी सांसद हैं. दरअसल 1955 में एक स्थिति ऐसी पैदा हुई कि पुचलापल्ली साम्यवादी सरकार के मुख्यमंत्री बनने वाले थे.

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मगर आज जब हम तेलुगू राज्यों में कम्युनिस्ट पार्टी की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाएंगे, जवाब मिलेगा, "किसने कहा कि हम कमज़ोर हुए हैं? हम आज भी लड़ रहे हैं. क्या सिर्फ चुनाव, सीटें और वोट ही सब कुछ हैं? जो कुछ दिख रहा है, वह अस्थायी है."

क्या भारत के वामपंथियों ने कभी करीबी से आत्मावलोकन की कोशिश की है और हमारे देश में नए तरीकों से मार्क्सवाद की व्याख्या करने की कोशिश की है? अगर हमारे लिए चुनाव सब कुछ नहीं भी हैं, तब भी क्या वे लोकतंत्र के लिए मील के पत्थर नहीं हैं? वामपंथी संघर्ष के कारण क्या लोगों का सशक्तीकरण परिणामात्मक और रचनात्मक रहा है?

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क्या उन्होंने कभी हिंदुत्व के आदर्शों को निशाने पर लिया है?

अगले चुनावों के लिए अभी भी एक साल का समय है. इस बीच किस तरह के जनांदोलनों का आयोजन किया गया?

वर्तमान में विभाजन पैदा करने वाली उन आर्थिक प्रणालियों का मुकाबला कैसे करना चाहिए जिनसे लोगों का जीवन प्रभावित होता है?

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हम कैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत को हिंदुत्व राज्य में बदलने की योजनाओं को रोक सकते है? जन सांस्कृतिक आंदोलन कैसे खड़े किए जा सकते हैं? कम्युनिस्टों को इस तरह के मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए और फिर चर्चा करनी चाहिए.

उन मुद्दों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता, जिनकी चर्चा बड़े अधिवेशनों मे होनी चाहिए.

उदाहरण के लिए 'सामाजिक न्याय' को ही एक विषय के तौर पर लीजिए.

ऐसा नहीं है कि इस पर चर्चा ही नहीं हुई है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि तेलंगाना सीपीएम के महासचिव तमिनेनी वीरभद्रम के नेतृत्व में वामपंथियों ने पहला मार्च सामाजिक न्याय के लिए ही किया था.

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वाम के नेतृत्व में हुए मार्च में अच्छा-खासा बदलाव हुआ है. समापन समारोह में सीताराम येचुरी ने लाल-नील (वाम, अनुसूचित जाति-जनजाति, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला और अन्य के राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संघर्ष) का नारा दिया. यह नारा सौ में अस्सी आम लोगों की एकता का प्रतीक है.

वामपंथियों ने इन मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी, इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आर्थिक नींव बदलने से देश के सामाजिक मसले अपने आप हल हो जाएंगे. इस प्रक्रिया में जाति व्यवस्था जैसे मुद्दे, जो कि कई दशकों से मौजूद हैं, वे पीछे छूट गए.

इस डर के साथ कि जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई से वर्ग व्यवस्था की लड़ाई कमजोर हो जाएगी, वामपंथियों ने इस मुद्दे को कम महत्व दिया. नतीजा यह रहा कि सामाजिक शोषण के खिलाफ लड़ने वाले लोग आज वामपंथियों से काफी दूर जा चुके हैं.

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वास्तव में भारत में 30 से ज्यादा वामपंथी दल हैं. क्या वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया ही इन समूहों मे विभाग की मुख्य वजह नहीं है?

हाल के समय मे कुछ बदलाव देखे गए हैं. मगर ये काफी नहीं हैं. जैसे कि तेलंगाना पीपल्स ऑर्गनाइज़ेशन का गठन किया गया है, जिसमें राज्य के अंदर के ही 100 संगठन सदस्य हैं. इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन और वाम के गठबंधन की ज़रूरत है.

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क्या जातियों के प्रभाव पर बात हुई?

जिस तरह ऊंची जातियां और उच्च वर्ग प्रभुत्व बनाए हुए हैं, ये साफ नहीं है कि ऐसे बड़े सम्मेलनों में ऐसे मुद्दों पर बात हुई.

हालांकि, ये स्वीकार किया जाता है कि भारत आज़ादी से पहले भी कई नस्लों का संगम रहा है (1942-43 संगठित सीपीआई संकल्प). लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी में इसका महत्व कम होने लगा है.

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आजकल भारत को कई राष्ट्रियताओं का संगम कहना भी आपराधिक और भारत-विरोधी के रूप में दिखाया जाता है. ऐसी स्थिति में इस मुद्दे को अहम प्राथमिकता दिया जाना जरूरी था. वो पार्टी जिसे कई राष्ट्रियताओं, साम्यवादी पार्टियों की विशिष्टता को जाहिर करना था, वो आज अपनी कमियों के चलते ऐसा करने में समर्थन नहीं है.

हमें कभी भी रवींद्रनाथ टैगोर की पंक्तियों 'पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल, वंगा' को नहीं भूलना चाहिए.

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अब कम्यूनिस्ट पार्टी में सिर्फ वरिष्ठ नेता सीपीआई महासचिव सुरवराम सुधाकर रेड्डी कभी-कभी इस मुद्दे का ज़िक्र करते हैं.

लगभग दस साल पहले सीपीआई (एम) प्रदेश महासचिव रघुवुलू सुनने वालों की तालियों के बीच कहा था, "आगामी सम्मेलन अलग-अलग आयोजित नहीं किए जाएंगे. ये सभी पार्टियों के एकल कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में आयोजित किए जाएंगे." इसके बाद इन प्रयासों के बारे में किसी को पता नहीं चला.

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22वें सम्मेलन से पहले उन्होंने कहा कि विलय बहस का मुद्दा नहीं होगा.

मार्क्स ने कहा था, "दुनिया के सभी कामगार एकजुट हो जाएं"...कामगारों के वर्ग की सफलता इसकी एकता में ही निहित है.

सीपीआई और सीपीएम के बीच में विचारधारा से जुड़े जो मतभेद हैं वो सिर्फ संबंधित नेताओं को ही पता हैं.

लेकिन आम लोगों को लगता है कि 'साम्यवादी पार्टियों ने अलग होकर अपना नुकसान किया नहीं तो वो शासन कर रही होतीं.'

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आख़िरकार कई टुकड़ों में बंटने के बाद भी साम्यवादी पार्टियां लोगों के आंदोलनों को अपनी क्षमताओं से परे जाकर आगे ले जा रही हैं.

इसीलिए शासक वर्ग कम्युनिस्ट पार्टियों और माओवादी संघर्षों में मतभेदों की आलोचना करती हैं लेकिन वे अपनी निस्वार्थ भावना सामने नहीं ला सकतीं.

अगर इस देश में अभी भी साम्यवादी आंदोलन है तो वो बस इसलिए क्योंकि लाखों कार्यकर्ताओं ने अभी भी अपने हाथों में लाल झंडा पकड़ा हुआ है. मैं आशा करता हूं कि कुछ समर्पित भावनाओं और अपनी गलतियों को सुधारते हुए साम्यवादी लोग अपने स्वर्णिम दौर को वापस लाएंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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