कर्नाटक चुनाव: बेंगलुरु का ट्रैफिक कैसे बदल रहा है मतदाताओं का मन

  • 24 अप्रैल 2018
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बेंगलुरु के सिल्क बोर्ड जंक्शन का हाल क्यों है बेहाल?

अगर कोई कंपनी आपको एक ही शहर में आपके ही पद पर दोगुनी तनख़्वाह देने की पेशकश करे तो आप इसके लिए हां कहने में दो बार भी नहीं सोचेंगे.

लेकिन बेंगलुरुवासी ऐसी पेशकशों को एक शक भर मुस्कुराहट के साथ देखते हैं.

क्योंकि इनके लिए तनख़्वाह से ज़्यादा कंपनी के ऑफ़िस की लोकेशन और उनके घरों से ऑफिस पहुंचने में लगने वाला समय अहम है.

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आईटी पेशेवर सरोज गौड़ बताती हैं, "मैं अपने कुछ दोस्तों को जानती हूं जिन्होंने अपनी नौकरियां छोड़ दीं क्योंकि वे अपने ऑफ़िस पहुंचने के लिए ट्रैफिक में घंटों फंसे रहने का तनाव नहीं झेल सकते थे."

भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले इस उभरते हुए शहर बेंगलुरु में डेढ़ हज़ार से ज़्यादा बहुराष्ट्रीय सॉफ़्टवेयर कंपनियां मौजूद हैं.

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लेकिन ट्रैफिक की समस्या के चलते इस चमचमाते शहर की चमक थोड़ी फीकी हुई है.

खराब सुविधाओं और गाड़ियों की बढ़ती संख्या की वजह से ये समस्या और गंभीर हुई है.

Image caption ट्रैफिक में फंसे हुए अपनी कार में ऑफिस का काम करती हुईं सरोज

आईटी पेशेवर सरोज को हर रोज अपने घर से ऑफिस जाने और वापिस घर आने में कम से कम चार घंटे रास्ते में बिताने पड़ते हैं.

सरोज की तरह सैकड़ों आईटी पेशेवर बेंगलुरु में हर रोज सिल्क बोर्ड जंक्शन पर लगने वाले ट्रैफिक में फंसते हैं जो कि शहर के आईटी हब के गेटवे जैसा है.

किसी भी आईटी पेशेवर को यहां पर लगने वाले ट्रैफिक को क्रॉस करने में 25 मिनट का समय लगता है.

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रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इस जंक्शन पर ट्रैफ़िक 4.5 किलोमीटर प्रति घंटे के हिसाब से चलता है.

इस हिसाब से इसमें कोई अचंभे की बात नहीं है कि ये शहर हर साल ट्रैफिक जाम में 250 घंटे बिताता है.

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ट्रैफिक का सामना कैसे करते हैं आईटी पेशेवर?

ऐसे में कुछ लोग ट्रैफिक में फंसने के बाद अपनी कारों में लैपटॉप और स्मार्टफोन पर ऑफिस का काम करना शुरू कर देते हैं.

वहीं, कुछ लोग अपने दोस्तों के साथ कारपूल करते हैं ताकि ट्रैफिक में फंसने के बाद महसूस होने वाले अकेलेपन से निज़ात पाया जा सके.

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सरोज के लिए ऑफिस जाने के लिए गाड़ी में बैठते ही काम शुरू हो जाता है.

वह बताती हैं, "कम से कम कार में बैठकर मेरा बहूमूल्य समय नष्ट नहीं होता है. ऑफिस पहुंचने से पहले बहुत काम होता जिसे करना होता होता. लेकिन ट्रैफिक आपको बुरी तरह थका देता है. ट्रैफिक का शोर, प्रदूषण और तनाव आपको थका देता है और मैं ऑफिस पहुंचने से पहले ही थकी हुई महसूस करने लगती हूं."

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आईटी कंपनियां इस समस्या को समझते हुए ऑफिस के पास गेस्ट हाउस जैसी सुविधाएं देती हैं और घर से काम करने का विकल्प भी देती हैं.

लेकिन कुछ लोगों के लिए नौकरी इतनी जरूरी नहीं है कि ट्रैफिक में फंसने से पैदा होने वाला तनाव झेला जाए.

बेंगलुरु मेट्रो ने भी आईटी पेशेवरों को पूरा समाधान नहीं देते हैं.

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बीएमआरसी के अधिकारियों के मुताबिक़, आईटी ऑफ़िसों के इलाके इलेक्ट्रॉनिक सिटी तक मेट्रो पहुंचने में तीन से चार साल का समय लगेगा.

इस बीच एक उड्डयन कंपनी ने इस संकट को एक व्यापारिक अवसर के रूप में देखना शुरू किया है.

थंबी एविएशन ने इलेक्ट्रॉनिक सिटी और एयरपोर्ट के बीच हेली-टैक्सी सर्विस शुरू की है.

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ये सेवा एक बार में छह लोगों को सवारी दे सकती है जिसका खर्चा करों के अलावा 3,500 रुपये है.

थंबी एविएशन के बिजनेस डेवलपमेंट विभाग के प्रमुख गोविंद नायर इस मुद्दे पर साफ हैं कि इस सेवा के लिए उनके मुख्य ग्राहक आईटी पेशेवर हैं.

Image caption थंबी एविएशन की एक हेलि-टैक्सी

वह बताते हैं, "बेंगलुरु नए विचारों और समाधानों का स्वागत करने वाला शहर है. अगर आप पैसे के बदले सेवाओं की बात करें तो एक औसत आईटी पेशेवर एयरपोर्ट पहुंचने के लिए 1000 से 1500 रुपये खर्च करते हैं और 2-3 घंटे लगाता है. इस तरह की सेवा की वजह से वह अहम बैठकों पर और घरवालों के साथ बचने वाले दो घंटे बिता सकते हैं. ये उनके लिए समय बचाता है जोकि उनके लिए अहम है."

वहीं, बेंगलुरु वाले इस ट्रैफिक में फंसने के बाद व्यंग्य और हंसी मज़ाक करके समय बिताते हैं.

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जब मैंने एक युवा आईटी पेशेवरों से सिल्क बोर्ड जंक्शन पर होने वाले ट्रैफिक की कहानी बयां करने को कहा तो वह हंसने लगा और सिग्नल पर ग्रीन लाइट का इंतजार करते हुए मुझे चुटकुले सुनाए.

वह कहता है, "एक बार एक बेंगलुरु में रहने वाले ने सोशल मीडिया पर सवाल पूछा कि उसे अपनी गर्लफ्रैंड को कहां प्रपोज़ करे तो किसी ने सुझाया कि उसे सिल्क बोर्ड जंक्शन पर प्रपोज़ करना चाहिए क्योंकि ट्रैफिक में उसके पास प्रपोज़ करने के बाद शादी करने तक का समय होगा!"

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@silk_board जैसे पैरोडी ट्विटर अकाउंट ट्रैफिक की समस्या पर कई जोक्स से भरे पड़े हैं.

हालांकि, ये अलग बात है कि ट्रैफिक इन लोगों के लिए हंसी-मज़ाक का मुद्दा नहीं रहा है और इस बार मतदान करते हुए उनके ज़हन में इस समस्या के समाधान के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात भी होगी.

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