नज़रिया: बच्चियों से बलात्कार पर सरकार का 'फ़ौरी समाधान' कितना कारगर होगा?

  • 23 अप्रैल 2018
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कोई सलाह-मशविरा नहीं. कोई संवाद नहीं. ऐसी आफ़त आन पड़ी थी, जिससे बच्चियों से बलात्कार करने वालों को मौत की सज़ा देकर ही निपटा जा सकता था.

इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि जांच की प्रक्रिया बहुत ख़राब है. आरोपियों को दोषी साबित करने की दर बेहद कम है.

केवल 28.2 फ़ीसदी मामलों में ही आरोपी को मुजरिम साबित किया जाता है. और तो और मुक़दमे के तयशुदा निपटारे के क़ानून के बावजूद 89.6 फ़ीसद मामले लटकते रह जाते हैं.

जनता के दबाव का तर्क देकर किसी को भी फांसी दी जा सकती है.

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पहले की सज़ाओं पर सवाल

बच्ची से बलात्कार के मामले में आख़िरी बार 2004 में फांसी दी गई थी. जब धनंजय चटर्जी नाम के शख़्स को 14 बरस की एक बच्ची से रेप और क़त्ल के लिए सूली पर लटकाया गया था.

हाल के कुछ बरसों में ये मांग उठी है कि धनंजय चटर्जी को जिस जुर्म का दोषी पाया गया था, उसकी नए सिरे से जांच होनी चाहिए और धनंजय को दोषमुक्त घोषित किया जाना चाहिए.

ये मांग करने वालों का तर्क है कि धनंजय को घटिया और अधूरी जांच, मीडिया के दबाव और ग़रीब अपराधियों के प्रति दुर्भावना के चलते फांसी दी गई थी.

अदालत-मीडिया-समाज और धनंजय की फांसी' नाम की 2016 में बंगाली में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, 'धनंजय को फांसी की जो सज़ा हुई, उसने हमारे सिस्टम की कमियों, इसकी मानवीयता में ख़ामी और न्यायिक प्रक्रिया में अधूरेपन को उजागर करती है.'

'अब ये बिल्कुल साफ़ है कि ये कमियां इतनी ज़्यादा गंभीर हैं कि इनसे एक बेगुनाह को न्याय की सूली पर चढ़ा दिया जाता है'.

वैसे ये पहला मामला नहीं है, जब किसी के मौत की सज़ा पर सवाल उठे हैं.

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असली मुद्दों की अनदेखी

धनंजय को अब दोबारा इस दुनिया में नहीं लाया जा सकता. लेकिन हम ऐसी घटनाओं पर पागलों जैसा जो बर्ताव करते हैं, उस पर जरूर चर्चा कर के भविष्य में उसमें ज़रूरी बदलाव लाया जा सकता है.

भारत गणराज्य के नागरिक कठुआ और उन्नाव में बलात्कार की घटनाओं की जांच से बुरी तरह नाराज़ थे.

इसीलिए इन लोगों ने इस समस्या के समाधान के तौर पर दोषियों को फांसी की सज़ा देने की मांग की.

सरकार के लिए भी ये बहुत आसान रहा कि जनता की मांग का हवाला देकर वो फांसी की सज़ा का प्रावधान क़ानून में जोड़ दे. लेकिन, इससे असली मुद्दों की अनदेखी हो गई.

अगर बच्चों को इंसाफ़ देना ही ईमानदार और असल मक़सद है, तो इसका हल मौजूदा क़ानून को ही सही तरीक़े से लागू कर के निकाला जा सकता है.

इसके लिए क़ानून में दिखावे वाला बदलाव करना ज़रूरी नहीं था. सरकार ने जान-बूझकर इस क़दम के ज़रिए हमारी आपराधिक न्यायिक व्यवस्था की खामियों को ढंकने की कोशिश की है.

न्यायिक प्रक्रिया की ये कमियां ही बच्चों को ज़्यादा तक़लीफ़ देती हैं. जिससे वो अदालत में मुकर जाते हैं. जिसकी वजह से अदालतें, सज़ा देने से ज़्यादा आरोपियों को बरी करती हैं.

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आंकड़ों से समझिए असल परेशानी

सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि यौन उत्पीड़न के शिकार 10 में से 9 बच्चों का शोषण उनके परिचित करते हैं.

'हक़ः सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स' और FACSE की फ़रवरी 2018 में जारी हुई रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में यौन हिंसा के 85 फ़ीसद मामलों में आरोपी बच्चों के जानने वाले थे.

ये सभी अदालत से बरी हो गए. मुल्ज़िमों के ऐसे छूट जाने के ज़्यादातर मामले, पुलिस की घटिया जांच का नतीजा होते हैं. ये बात हम सब अच्छे से जानते हैं.

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कानून की 'कमियां'!

लेकिन ये जानना भी ज़रूरी है कि कई बार मुल्ज़िम इसलिए भी बरी हो जाते हैं, क्योंकि पुलिस उन्हें क़ानून की उचित धाराओं में आरोपी नहीं बनाती.

पॉक्सो एक्ट लागू होने के पांच साल बाद भी हम देख रहे हैं कि बच्चों के यौन शोषण के आरोपी, ग़लत धाराओं में आरोपी बनाए जाते हैं.

ये बात दिल्ली और मुंबई में हक़ और FACSE की जांच रिपोर्ट से पूरी तरह से उजागर होती है. जिन 126 मामलों में हक़ बच्चों को मनोवैज्ञानिक और क़ानूनी सहयोग दे रही है, उसमें से 56 फ़ीसद मामलों में ऐसे ही हैं.

इसीलिए ये सवाल पूछना तो बनता है कि क्या 12 बरस से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के लिए मौत की सज़ा इस चुनौती का सही समाधान है?

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मियाद को लांघता 'सुस्त' कानून

इस रिपोर्ट के दूसरे नतीजों पर गौर करें तो, दिल्ली में केवल 11 प्रतिशत मामलों में ही कोर्ट के मामला संज्ञान में लेने के 30 दिनों के भीतर बच्चों के बयान दर्ज किए गए.

89.4 फ़ीसद बच्चों के बयान 30 दिन की मियाद के बाद ही रिकॉर्ड किए गए. कई बार तो घटना के 27 महीने बाद बच्चों के बयान लिए गए.

देश में दिल्ली ही इकलौता राज्य है, जहां विशेष अदालतें पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुक़दमों की सुनवाई करती हैं.

देश के दूसरे हिस्सों में पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें तक नहीं गठित की गई हैं. अध्यादेश लागू करते वक़्त ज़ाहिर है, सरकार का ध्यान इस तरफ़ नहीं गया.

हड़बड़ी में अध्यादेश पर फैसला?

26 मार्च 2018 को 196 लोगों के दस्तख़त वाली एक अपील राष्ट्रपति के पास भेजी गई थी. इसमें बच्चों से बलात्कार करने वालों को मौत की सज़ा के प्रावधान वाले उन क़ानूनों पर चिंता जताई गई थी, जो कई राज्यों में पास किए गए थे.

इन 196 लोगों ने राष्ट्रपति से निजी तौर पर मुलाक़ात करके अपना पक्ष रखने की अपील की थी. राष्ट्रपति ने भी इस मुद्दे पर मशवरे की अपील अनसुनी कर दी और अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी.

सरकार के पास तो आज की तारीख़ में ऐसे तमाम सबूत हैं, जो ये कहते हैं कि ये फ़ैसला हड़बड़ी में नही लिया जाना चाहिए था.

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न्याय में देरी की वजहें

हक़, FACSE, सेंटर फॉर चाइल्ड ऐंड द लॉ, बैंगलोर स्थित NLSIU समेत कई और संस्थाओं के रिसर्च न सिर्फ़ ये बताते हैं कि बच्चों के यौन शोषण के कितने मामले अदालतों में लटके हैं, बल्कि वो इनकी वजहें भी बताते हैं.

इनमें से कई के लटके होने की वजह जांच एजेंसी की लापरवाही है. बहुत से मामलों में तो चार्जशीट दाखिल करने में ही बहुत देर कर दी गई.

इसके बाद आधी-अधूरी फ़ोरेंसिक रिपोर्ट अदालत में जमा की गई, या इसे भी कोर्ट को देने में देर की गई.

कई बार गवाहों को नहीं बुलाया गया. आरोपियों को अदालत में पेश करने में लापरवाही हुई. आरोपियों और पीड़ितों से जुड़े दस्तावेज़ सत्यापित नहीं हुए.

न्यायिक फ़ाइल में ज़रूरी दस्तावेज़ ही नहीं थे. आरोपी का बयान ही नहीं तैयार था. जांच अधिकारी लापता थे. सरकारी वक़ील अक्सर अगली तारीख़ मांग लेते थे. कई बार जज ही नहीं होते थे.

कोर्ट पर मुक़दमों का बोझ इतना था कि बचाव पक्ष के वक़ील अगली तारीख़ लगाने की गुहार लगा देते थे. बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मुक़दमों में लापरवाही और देरी की ये लिस्ट बहुत लंबी है.

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अध्यादेश में कितना है 'समाधान'?

इससे मुक़दमे खिंचते चले जाते हैं. जो अध्यादेश सरकार लाई है, उनमें इन दिक़्क़तों का कोई समाधान नहीं है. किसी नए क़ानून से ये दिक़्क़तें दूर भी नहीं की जा सकती हैं. क्योंकि ये क़ानून की ख़ामियां नहीं हैं. बल्कि क़ानून लागू करने की ख़ामियां हैं.

पॉक्सो एक्ट में साफ़ लिखा है कि एफ़आईआर उस भाषा में दर्ज होनी चाहिए, जो बच्चा बोलता हो. ये शायद ही कभी होता है. और यहीं से परेशानी शुरू हो जाती है.

जब बड़े लोग बच्चों के बयान को अपने तरीक़े से, अपनी सुविधा के हिसाब से बयां करते हैं, तो नाइंसाफ़ी तय है. घटिया और ख़राब जांच अक्सर घटिया एफआईआर का नतीजा होती है.

ये भी क़ानून लागू करने की ख़ामी ही है. सरकार अध्यादेश से इसका समाधान नहीं निकाल सकती.

कृष्णाभाई बनाम गुजरात सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि ऐसे मुक़दमों की समीक्षा की जाए, जिसमें पुलिस अधिकारियों की कमी और ख़राब जांच की वजह से आरोपी बरी हो जाते हैं.

अब तक हमारे पास ऐसे कोई आंकड़े नहीं हैं, जो ये बताएं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो रहा है.

लोगों को ऐसे आदेश की ख़बर ही नहीं है. मीडिया भी इस पर सवाल नहीं उठाता. सारी ताक़त बेवजह के मुद्दों में लगाई जाती है.

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अदालत में पीड़ित बच्चों के साथ 'सख्ती'

अगर हम क़ानून के ज़रिए वाक़ई कोई बदलाव लाना चाहते हैं, तो हमें हर हाल में गवाहों की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करनी चाहिए.

क़ानूनन गवाह की हिफ़ाज़त सिर्फ़ मुक़दमे की सुनवाई तक सीमित है, जब पीड़ित को अपना बयान देना होता है. इस बात का भी खुला उल्लंघन होता है कि अदालतें बंद कमरे में सुनवाई नहीं करतीं.

बच्चे और आरोपी के बीच पर्दा नहीं रखा जाता. बच्चों से सख़्त सवाल पूछने पर रोक नहीं लगती. बच्चों को सुनवाई के दौरान बहुत कम ब्रेक मिलता है. क़ानून के ऐसे ही प्रावधानों का ठीक से पालन ही नहीं होता.

मुक़दमे की सुनवाई से पहले गवाह की हिफ़ाज़त बेहद ज़रूरी है. क्योंकि आरोपी के रिश्तेदार और परिजन ताक़त और असर से पीड़ित पर बयान से मुकरने का दबाव बनाते हैं.

इसके अलावा बलात्कार जैसे मामलों में भी अदालत से बाहर सुलह-समझौते हो जाते हैं. हाल ही में 18 साल की एक लड़की के अपने मां-बाप के ख़िलाफ़ ही केस दर्ज कराने की ख़बर आई थी, क्योंकि उन्होंने 20 लाख रुपए लेकर आरोपी से समझौता कर लिया था.

ये इस बात की मिसाल है कि अपने मां-बाप के अधीन बच्चों के अधिकार सुरक्षित नहीं हैं.

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बच्चों की मदद के लिए कितने कानून?

पॉक्सो एक्ट के तहत ज़िला बाल सुरक्षा इकाइयों की स्थापना होनी ज़रूरी है. ताकि विशेषज्ञों और बच्चों की मदद में लगे समाजसेवियों को पीड़ित बच्चों की मदद में लगाया जा सके. जिससे वो क़ानूनी प्रक्रिया का सामना कर सकें.

अब तक एक भी ज़िला बाल संरक्षण इकाई ने ऐसे लोगों की फ़ेहरिस्त नहीं बनाई है, जो बच्चों की मदद करें. सरकार के पास ऐसी सेवाओं के लिए बजट तक नहीं है.

सरकार ऐसी चुनौतियों का फ़ौरी समाधान तलाशने की कोशिश करती हैं. जबकि असल में तो वो मौजूदा क़ानून ही सही तरीक़े से नहीं लागू कर पातीं.

ऐसे में ये अध्यादेश सरकार इसलिए लेकर आई है, ताकि क़ानून को लागू करने में अपनी नाकामी को छुपा सके.

माफ़ करना बच्चो, तुम्हें इंसाफ़ के लिए शायद अभी लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा, क्योंकि न तो इस देश की सरकार और न ही नागरिकों के पास वो क्षमता है, जो तुम्हारी हिफ़ाज़त कर सके.

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