चीफ़ जस्टिस को प्रो-बीजेपी या प्रो-कांग्रेस कहना कितना उचित?

  • 23 अप्रैल 2018
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सुप्रीम कोर्ट में अंतर्कलह, चीफ़ जस्टिस पर लगे गंभीर आरोप और फिर उन पर महाभियोग के प्रस्ताव के बाद अब चर्चा हो रही है पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण की याचिका की.

सुप्रीम कोर्ट में किस केस की सुनवाई जजों की कौन सी बेंच करेगी, इसका फ़ैसला 'मास्टर रोस्टर' चीफ़ जस्टिस करते हैं.

शांति भूषण ने इस व्यवस्था के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.

उनका मानना है इस बारे में फ़ैसला पांच जजों के समूह या कॉलेजियम को करना चाहिए.

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याद रहे जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने इतिहास में पहली बार पत्रकारों से बातचीत में कहा था, "लोकतंत्र खतरे में है."

उन्होंने कहा था कि चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने चुने हुए मामलों को बिना किसी औचित्य के चुने हुए जजों को सुनवाई के लिए दिया.

शांति भूषण की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इस बारे में सर्वोच्च कानून अधिकारी अटॉर्नी जनरल के विचार सुनना चाहेंगे और मामले की अगली तारीख 27 अप्रैल तय की गई है.

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में शांति भूषण ने कहा है, "ऐसा नहीं हो सकता कि मास्टर ऑफ़ रोस्टर के पास बिना किसी रोकटोक के मनमानी शक्ति हो जिसे माननीय चीफ़ जस्टिस चुने हुए जजों को चुनकर और किसी विशेष जज को मामला देकर इस्तेमाल करें."

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अधिकार पर सवाल

याचिका के मुताबिक, ऐसा करने से लोकतंत्र का नाश होगा और संविधान ने आर्टिकल 14 के अंतर्गत जो कानून की गारंटी दी है उस पर असर पड़ेगा.

याचिका में कहा गया है कि चीफ़ जस्टिस को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ जजों के साथ बातचीत और पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुसार करना चाहिए.

याचिका में उन आरोपों की ओर इशारा किया गया है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को सिर्फ़ चुनी हुई बेंच को सौंपा गया, हालांकि कई वरिष्ठ वकील और संविधान मामलों के जानकार ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं.

याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट पहले कह चुका है कि किस बेंच को कौन से केस दिया जाए, ये अधिकार सिर्फ़ चीफ़ जस्टिस के पास है.

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आरोप-प्रत्यारोप

ऐसे में शांति भूषण की याचिका पर संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में हमेशा से ये परंपरा रही है कि रोस्टर चीफ जस्टिस के हाथ में होता है."

"वो ही ये तय करते हैं कि कौन सा मामला किस बेंच में जाना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ये परंपरा है."

उधर, शांति भूषण का मानना है कि रोस्टर बनाना इतना "महत्वपूर्ण काम है कि उसे एक व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. कोलिजियम इस बात को तय करे कि क्या बेंच बनेगी, कौन सा केस कहां जाएगा."

शांति भूषण कहते हैं, "ये पहली बार हो रहा है कि चीफ़ जस्टिस स्वयं अपने अधिकार का प्रयोग करके कह रहे हैं, ये केस इस बेंच में जाएगा, ये उस बेंच में जाएगा और (वो मामलों को) सीनियर जजों को नहीं भेज रहे हैं."

सरकार कर रही 'ब्लैकमेल'

वो आरोप लगाते हैं, "सरकार को ऐसे जज सूट करते हैं जिन्हें सरकार जब चाहे धमका सकती है कि हमारे पास आपके खिलाफ़ ये सबूत हैं. ब्लैकमेल हो रहा है और वो हो ही रहा है."

सरकार के मंत्री ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के मीडिया में आने के बाद ऐसे आरोप लगे कि उच्चतम न्यायालय में सब कुछ ठीक नहीं है.

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के भेजे महाभियोग प्रस्ताव में भी जस्टिस मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए थे.

हालांकि ये प्रस्ताव रद्द हो गया. जानकार मानते हैं कि इस पूरे विवाद से न सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट की छवि पर असर पड़ रहा है, मध्य और निचली अदालतों पर काम कर रहे न्यायाधीशों के मनोबल पर भी असर पड़ा है.

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छवि को नुकसान

राजनीतिक झुकाव के आरोपों पर संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं, "मैं नहीं समझता कि चीफ़ जस्टिस की छवि कभी प्रो-बीजेपी रही है. और किसी न्यायाधीश के लिए ये कहना कि वो किसी राजनीतिक दल का पक्ष ले रहा है. उसके लिए बहुत पर्याप्त सबूत होना चाहिए."

"मैंने जो कुछ सुना है उनको प्रो-कांग्रेस शायद ज़्यादा कहा जाता रहा है. लेकिन प्रो-कांग्रेस या प्रो-बीजेपी किसी न्यायाधीश को कहना अनुचित है और नहीं होना चाहिए."

सुभाष कश्यप कहते हैं, "जो कुछ हो रहा है, हुआ है उससे न सिर्फ़ चीफ़ जस्टिस की छवि को आघात पहुंचा है लेकिन जो चार जज हैं उनकी भी छवि खराब हुई है."

सुभाष कश्यप कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में मचे घमासान का हल अदालत के भीतर ही होना चाहिए.

वो कहते हैं, निजी तौर पर, नाइट क्लब और घरों में बैठकर लोग बहुत कुछ कहते रहे हैं लेकिन खुले में प्रेस कान्फ़्रेंस में ऐसी बातों का उठना ऐसा कभी नहीं हुआ. अभी तक हम कहते थे कि लोकतंत्र की अंतिम पतवार न्याय पालिका है और वो पतवार भी टूटती नज़र आ रही है."

उधर शांति भूषण कहते हैं, अगर उनकी याचिका रद्द होती है तो वो पुनर्विचार याचिका और फिर क्यूरेटिव याचिका अदालत में दाखिल करेंगे.

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