BBC SPECIAL: तिल-तिल मरते बंधक हाथियों की रुलाने वाली दास्तान

हाथी, मौत, जानवर, तमिलनाडु
Image caption मृत राजेश्वरी

42 साल की राजेश्वरी रेत पर बेजान पड़ी है. उसके आगे के पैर और जांघ की हड्डी टूटी हुई है, शरीर घावों से क्षत-विक्षत है. राजेश्वरी मंदिर में रखी जाने वाली एक हथिनी थी.

उसकी ख़राब सेहत की ख़बर मिलने पर एक पशुप्रेमी ने मंदिर से उसकी रिहाई के लिए अदालत में अर्ज़ी दी थी.

इसके बाद जानवरों के डॉक्टर ने राजेश्वरी का चेकअप किया और अदालत ने कहा कि उसकी हालत इतनी नाज़ुक है कि उसे इंजेक्शन देकर हमेशा के लिए सुला दिया जाना चाहिए.

लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी. शनिवार की दोपहर राजेश्वरी ख़ुद ही चली गई.

साल 1990 में तमिलनाडु के एक मंदिर को बेचे जाने के बाद से राजेश्वरी की ज़िंदगी मुश्किल हो गई थी.

श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने और दूसरे धार्मिक कर्मकांडों जैसे देवताओं को पानी से नहलाने के लिए उसे पत्थर के फ़र्श पर घंटों खड़े रहना पड़ता था.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

खुले ट्रक से गिर गई थी राजेश्वरी

2004 में वो उस वक़्त एक खुले ट्रक से गिर गई जब उसे बंधक हाथियों के लिए आयोजित एक कैंप में ले जाया जा रहा था. हादसे में उसका पैर टूट गया और वो तबसे टूटे हुए पैर के साथ ही जी रही थी.

हाल ही में उसके जांघ की हड्डी भी टूट गई क्योंकि लोगों ने डंपर से पलटकर उसका इलाज करने की कोशिश की.

जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि इसके बाद उसे मौत का इंतज़ार करने के लिए यूं ही छोड़ दिया गया.

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Image caption हाथियों की सवारी करते सैलानी

ये अकेली कहानी नहीं...

ये राजेश्वरी की अकेले की कहानी नहीं है. देश में ऐसे क़रीब 4,000 बंधक हाथी हैं जिनकी दास्तान इतनी ही दर्दनाक है. इनमें से ज़्यादातर हाथी असम, केरल, राजस्थान और तमिलनाडु में हैं.

वर्ल्ड ऐनिमल प्रोटेक्शन रिपोर्ट में भारत को ऐसा देश बताया गया है जहां हाथियों को इंसानी इस्तेमाल के लिए बंदी बनाकर रखा जाता है.

भारत में ये प्रथा हज़ारों साल से चली आ रही है. दक्षिण भारत में त्योहारों, शादियों और होटलों के उद्घाटन जैसे मौकों पर हाथियों को जुलूस और परेड के लिए किराये पर लिया जाता है.

उन्हें खुले वाहनों में लादकर दूर-दूर तक ले जाया जाता है. उन्हें तीखी धूप में तपती हुई सड़कों पर चलने को मजबूर किया जाता है.

कई बार बेचारे जानवर ये बर्दाश्त नहीं कर पाते और विचल जाते हैं. ऐसे कुछ हादसों में कुछेक बार लोगों को जान भी गंवानी पड़ी है.

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दो साल में 70 से ज़्यादा हाथी मर गए

दूसरी जगहों पर उन्हें ज़ंजीरों में जकड़कर रखा जाता है और सवारी के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

सैलानियों को उबड़-खाबड़ और तेज़ ढलान वाले क़िलों तक पहुंचाने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है.

साथ ही ये उन लोगों का मन बहलाने के लिए भी रखे जाते हैं जो हाथियों को नहलाना, छूना और उनकी सवारी करना चाहते हैं.

राजनीतिक पार्टियां भी उन्हें चुनावी रैलियों और जुलूसों के लिए किराए पर लेती हैं. व्यापार मेले में सामानों का प्रचार करने के लिए भी हाथियों का ही इस्तेमाल होता है.

इसके अलावा नेशनल पार्कों में पर्यटन के लिए, इंसानी बस्तियों में घुस आए जंगली जानवरों से निपटने के लिए, ढुलाई के लिए और हाइवे पर भीख मांगने के लिए भी लोग हाथियों का इस्तेमाल करते हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 2015 से 17 यानी दो साल के भीतर तमिलनाडु, केरल और राजस्थान में 70 से ज़्यादा बंधक हाथी बहुत कम उम्र में मर गए क्योंकि उनकी हालत बेहद ख़राब थी.

अकेले केरल में ही इस साल तक़रीबन 12 हाथियों ने दम तोड़ दिया.

वाइल्ड लाइफ़ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर की अध्यक्ष सुपर्णा गांगुली कहती हैं, "इनमें से ज़्यादातर मौतें टॉर्चर, शोषण, ज़रूरत से ज़्यादा काम और घटिया मैनेजमेंट की वजह से हुई हैं."

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कंक्रीट की छत के नीचे पथरीली ज़मीन पर...

बंधक हाथियों के रहने, खाने के लिए पर्याप्त जगह और चारा नहीं होता.

उन्हें लंबे समय तक कंक्रीट की तपती छतों के नीचे पथरीली ज़मीन पर ज़ंजीरों से बांधकर रखा जाता है. ये हालात किसी भी जानवर को बीमार करने के लिए काफ़ी हैं.

बेड़ियों में जकड़े और पत्थर के फ़र्श पर खड़े-खड़े उनके पैर की पैडिंग कम हो जाती है, पैर सड़ जाते हैं जो कई बार गंभीर संक्रमण में बदल जाता है. सूरज की तपती धूप में उनके आंखों की रोशनी कम हो जाती है.

सुपर्णा गांगुली हाथियों के बदतर हालात के लिए जानकारी की कमी और उन्हें रखने वालों की लापरवाही को ज़िम्मेदार ठहराती हैं.

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पान का शौकीन हाथी!

इन सबके बाद आती है खाने-पीने में कमी

हाथी धीरे-धीरे खाना खाते हैं. जंगली हाथी 100 से ज़्यादा तरह की जड़ें, कंद, घास और लताएं खाते हैं इसलिए जब उन्हें एक जगह बांधकर रखा जाता है तो उनके खान-पान में बुरी तरह कटौती होने लगती है.

मिसाल के तौर पर उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में उन्हें सिर्फ़ गन्ने का भूसा खाने को मिलता है जिसमें बहुत ग्लूकोज़ होता है.

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75 से घटकर 40 साल रह गई उम्र

जानवरों के डॉक्टर बताते हैं कि खाने-पीने की कमी और खराब खाने से उन्हें सेप्टिसीमिया के अलावा आंतों और फेफड़ों में इंफ़ेक्शन हो जाता है.

नतीजा, केरल में कुछ दशक पहले जिन हाथियों की औसत उम्र 70-75 साल हुआ करती थी, वो घटकर 40 साल से भी कम रह गई है.

बीमार हाथियों के लिए पर्याप्त शेल्टर हाउस भी नहीं हैं. भारत में ऐसे सिर्फ पांच शेल्टर हाउस हैं जिनमें से तीन प्राइवेट सेंटर हैं जिनमें 40 हाथी रहते हैं.

बंधक हाथियों की कुल संख्या के हिसाब से ये कुछ भी नहीं है.

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जंगल में भटके हुए हाथियों को ढूंढने में कैसे काम आ रहे दूसरे हाथी

सुप्रीम कोर्ट रोक लगा चुका है फिर भी...

हालांकि तमिलनाडु में मंदिर में रखे गए हाथियों के लिए महीने भर का कैंप लगाया जाता है जहां हाथी आराम कर सकते हैं. यहां उनका इलाज होता है और वो क़ुदरती महौल में दूसरे हाथियों के साथ रहते हैं.

लेकिन इन कैंपों में पहुंचना हाथियों के लिए आसान नहीं होता. उन्हें खुले ट्रकों में लादकर ले जाया जाता है और कई बार ट्रकों से गिरकर या तो वो हमेशा के लिए अपंग हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है.

ऐसी गंभीर स्थिति को देखते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक मशहूर मेले में हाथियों की बिक्री और नुमाइश को गैरक़ानूनी करार दिया और प्रशासन से धार्मिक कार्यक्रमों में हाथियों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के भी निर्देश दिए.

इसके बावजूद केरल और राजस्थान में 350 से ज़्यादा हाथियों को अवैध तरीके से क़ैद करके रखा गया है. उनके मालिकों के पास क़ानूनी कागज़ात तक नहीं है.

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कड़े क़ानून फिर भी मनमानी

ऐनिमल ऐक्विविस्ट्स का कहना है कि प्रभावी क़ानून और कड़े निर्देशों के बावजूद हाथियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए जा रहे हैं.

हाथियों को यूं बांधकर रखे जाने के पीछे एक बड़ी वजह है उनसे होने वाली कमाई. केरल में किसी धार्मिक त्योहार में हाथी ले जाने के एवज़ में उसका मालिक एक दिन में क़रीब 70 हज़ार रुपये आराम से कमा सकता है.

सुपर्णा गांगुली कहती हैं, "भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब हाथियों का ग़ैरक़ानूनी व्यापार इस तरह खुलेआम हो रहा है. दशकों से चली आ रही हाथियों की तस्करी, भ्रष्ट अधिकारियों की शह पर जवान हाथियों को निशाना बनाते शिकारी और उनका व्यापारियों के साथ गठजोड़ और सरकार की अनदेखी, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता ने आज हालात को बिल्कुल असंभव बना दिया है."

हालांकि उम्मीद अब भी बरक़रार है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट प्रताड़ित और बंधक हाथियों पर जल्द ही कोई फ़ैसला सुना सकता है.

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