क्या रेप पर मौत की सज़ा का नया अध्यादेश खारिज हो सकता है?

  • 24 अप्रैल 2018
रेप, यौन हिंसा इमेज कॉपीरइट BBC Sport

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या उसने 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के दोषी को मौत की सज़ा का प्रावधान करने वाला अध्यादेश लाने से पहले वैज्ञानिक आंकलन किया था?

हाईकोर्ट ने एक पुरानी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सवाल किया. समाज सेविका मधु किश्वर की इस जनहित याचिका में 2013 के आपराधिक क़ानून (संशोधन) को चुनौती दी गई है.

आपराधिक क़ानून (संशोधन) में बलात्कार के दोषी को कम से कम सात साल की सज़ा और इससे कम सज़ा देने के अदालत के विवेकाधिकार के प्रावधान ख़त्म कर दिए गए थे.

केंद्र सरकार को हाई कोर्ट के इस सवाल का जवाब सितंबर तक देना है.

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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हाई कोर्ट बच्चियों से बलात्कार के अध्यादेश को खारिज़ कर सकता है?

सवाल ये भी उठता है कि क्या केंद्र सरकार के नए अध्यादेश से कठुआ रेप पीड़िता को इंसाफ़ मिलेगा?

संविधान के जानकार और पूर्व लोकसभा महासचिव पी डी टी आचार्य के मुताबिक़ इस सवाल के जवाब से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आखिर अध्यादेश होता क्या है?

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अध्यादेश क्या होता है?

पी डी टी आचार्य कहते हैं, "अध्यादेश छोटी समयावधि के लिए बनाया गया क़ानून होता है. जैसे हर क़ानून को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, उसी तरह से अध्यादेश को भी चुनौती दी जा सकती है."

किसी भी अध्यादेश को ख़ारिज करने का अधिकार कोर्ट के पास होता है लेकिन, इसके लिए एक लंबी क़ानूनी प्रक्रिया होती है.

कोर्ट में सरकार को अध्यादेश लाने की वजह साबित करनी पड़ती है.

उनके मुताबिक़, इस मामले में क्योंकि संसद का सत्र नहीं चल रहा है, ऐसी सूरत में सरकार अपने अध्यादेश लाने के पक्ष को मज़बूती से सही बता सकती है.

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कोर्ट अध्यादेश को ख़ारिज भी कर सकता है

लेकिन जहां तक अध्यादेश पर हाई कोर्ट के सवाल की बात है, उस पर पी डी टी आचार्य कहते हैं, "सरकार को इसके लिए सही तर्क सामने रखने होंगे. कोर्ट अगर सरकार के पक्ष से सहमत नहीं होता है और कोर्ट को लगता है कि इससे किसी के संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है तो ऐसी सूरत में वह केन्द्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश को ख़ारिज भी कर सकता है."

पी डी टी आचार्य बताते हैं, "अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद वो क़ानून बन जाता है. उस दिन से लेकर अगला संसद सत्र शुरू होने के छह हफ़्ते तक अध्यादेश वैध रहता है. सरकार चाहे तो इस बीच संबंधित मसले पर क़ानून बना सकती है या फिर अध्यादेश के लैप्स (ख़त्म) होने से पहले दोबारा उसकी अवधि बढ़ा सकती है."

तो क्या नए अध्यादेश से कठुआ रेप पीड़िता को इंसाफ़ मिल सकता है?

इसके जवाब में पी डी टी आचार्य कहते हैं, "पोक्सो क़ानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होता इसलिए अगर सरकार इस क़ानून को जम्मू-कश्मीर में लागू करवाना चाहती है तो जम्मू-कश्मीर सरकार को अध्यादेश को अपनी विधान सभा में पास करवाना होगा."

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अध्यादेश के पीछे सरकार का तर्क?

केंद्र सरकार की इस पहल से पहले चार राज्य बच्चियों के बलात्कारियों के दोषी को फांसी की सज़ा का कानून पारित करके राष्ट्रपति के पास भेज चुके हैं.

इसमें अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश शामिल हैं.

इसके अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकारों ने केंद्र से इस बारे में क़ानून बनाने की मांग भी की थी.

लेकिन सरकार ने इस अध्यादेश को लाने के पहले संबंधित पक्षों से कोई बातचीत नहीं की थी.

इस वजह से सोमवार को महिलाओं और बच्चों के अधिकार पर काम करने वाली अलग-अलग संस्थाओं ने मिल कर सरकार के इस फ़ैसले का विरोध भी किया.

उनकी मुख्य आपत्तियां थी:

  • पहले से मौजूद पोक्सो कानून पर्याप्त है, ज़रूरत है क़ानून का सही से पालन करने की.
  • इससे पीड़ितों पर बुरा असर पड़ेगा. क़ानून लागू होने के बाद रेप करने वाला इंसान बच्ची को ख़त्म करने की सोचेगा.
  • सरकार के फ़ैसले के विरोध में एक स्टडी का हवाला भी दिया गया. पांच साल पहले बच्चों के लिए पोक्सो एक्ट बना था. स्टडी के मुताबिक़ पोक्सो के बावजूद बच्चों से जुड़े यौन हिंसा के तक़रीबन 89 फ़ीसदी मामले पेंडिंग हैं, 28 फ़ीसदी मामलों में ही दोष साबित किया जा सका है.

इस आधार पर उन्होंने सरकार से अध्यादेश पर दोबारा विचार करने की गुज़ारिश की.

केन्द्र सरकार के नए अध्यादेश के मुताबिक:

• महिला के साथ बलात्कार की कम से कम सज़ा 7 साल से बढ़ा कर 10 साल तक सश्रम कारावास की गई है. इसे आजीवन क़ैद में बदलने का प्रावधान भी है.

• 16 साल की उम्र तक की लड़की का बलात्कार करने की कम से कम सज़ा 10 साल से बढ़ा कर 20 साल सश्रम कारावास कर दी गई है. इसे आजीवन कारावास तक भी बढ़ाया जा सकता है.

• 16 साल तक की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के सभी मामलों में आजीवन क़ैद की सज़ा का प्रस्ताव है.

• 12 साल तक की बच्ची के बलात्कार के केस में कम से कम 20 साल क़ैद या आजीवन क़ैद या फिर मौत की सज़ा का प्रस्ताव दिया गया है.

• 12 साल तक की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में आजीवन क़ैद या मौत की सज़ा का प्रावधान जोड़ा गया है.

• इसके अलावा किसी भी तरह के रेप के मामले में समयबद्ध तरीके से जांच पूरी करने का भी प्रस्ताव अध्यादेश में दिया गया है. इसमें 2 महीने के भीतर जांच पूरी करना, 2 महीने में ट्रायल और 6 महीने के भीतर अपील के निपटारे की बात कही गई है.

• अध्यादेश के मुताबिक़ 16 साल से कम उम्र की बच्ची के बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के मामले में किसी भी रेप के दोषी के लिए अंतरिम ज़मानत का कोई प्रावधान नहीं होगा.

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