BBC SPECIAL: आसाराम के ख़िलाफ़ गवाही देने वाले की कहानी...

महेंद्र चावला
Image caption नारायण साई के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके महेंद्र ने तक़रीबन 10 साल तक एक 'सेवादार' की तरह आसाराम के आश्रमों में अपनी सेवाएं दी हैं

आसाराम और उनके बेटे नारायण साई पर लगे बलात्कार के आरोपों की सुनवाई के दौरान जिन नौ गवाहों पर जानलेवा हमला हुआ, महेंद्र चावला उनमें से एक हैं.

हालांकि तीन पुलिस वालों की एक टुकड़ी 24 घंटे उनके साथ चलती है लेकिन महेंद्र के चेहरे पर तनाव और डर साफ़ नज़र आता है.

पानीपत के सलोनी गांव में रहने वाले महेंद्र ने स्वघोषित धर्मगुरू आसाराम के ख़िलाफ़ जोधपुर और सूरत में जारी बलात्कार के दो बड़े मुकदमों में गवाही दी है.

महेंद्र के मुताबिक़ 'गवाही देने से पहले उन पर रिश्वत लेकर चुप हो जाने का दबाव डाला गया था. उन्होंने रिश्वत लेने से इंकार कर दिया तो गवाहियों के बाद 13 मई 2015 को अज्ञात हमलावरों ने उन पर पॉइंट ब्लैंक रेंज से गोली दाग कर हमला किया.'

कंधे में लगी इस गोली ने उन्हें जीवन भर के लिए आंशिक तौर पर विकलांग तो बना दिया पर किसी तरह उनकी जान बच गई.

'किसी ने बदला लेने के लिए हमला कर दिया तो?'

चालीस साल के महेंद्र को लगता है कि फ़ैसला आने के बाद उनकी जान को ख़तरा बढ़ सकता है.

"आमतौर पर सबके मामले अदालत से फ़ैसला आने के बाद ख़त्म हो जाते हैं पर मेरे लिए असली लड़ाई फ़ैसला आने के बाद शुरू होगी. अगर आसाराम को दोषी क़रार दिया जाता है तो मेरी जान को ख़तरा बढ़ जाएगा.".

नारायण साई के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके महेंद्र ने तक़रीबन 10 साल तक एक 'सेवादार' की तरह आसाराम के आश्रमों में अपनी सेवाएं दी हैं.

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'मुफ़्त में काम करवाते थे'

महेंद्र दावा करते हैं कि शुरुआत में आसाराम ने उन्हें 'ईश्वर प्राप्ति' का लालच देकर लुभाया.

वे बताते हैं, "कुछ मेरे घर के संस्कार थे और कुछ ईश्वर प्राप्ति की इच्छा, मैं समर्पित हो गया. उस वक़्त पानीपत में इनका एक आश्रम बन रहा था. उस आश्रम को बनवाने में मैंने मज़दूर की तरह काम किया. गारा-मिट्टी उठाई. ईंटे जमाई."

इसके बाद महेंद्र को आसाराम के अहमदाबाद आश्रम भेज दिया गया. वहां आश्रम के व्यापारिक गोडाउन में वह डिस्पैच का काम देखने लगे.

महेंद्र बताते हैं कि आश्रम में बन रही देसी दवाइयों, अगरबत्तियों और शहद जैसे सामान को 'पूजा गाड़ियों' में लदवाकर बेचना भी उनके काम में शामिल था.

इसके बाद उन्हें कोटा शहर के पास मौजूद लखावा गांव में आसाराम का एक नया आश्रम खोलने की ज़िम्मेदारी दी गई.

"2001 में लखावा का आश्रम बनवाने के दौरान मेरी लगातार आसाराम और साई से बात होने लगी. मुझे उन्हें आश्रम के काम के बारे में अपडेट देना होता था. यहीं से वे दोनों मेरे सीधे संपर्क में आए और साई ने मुझे अपना सचिव बना लिया'.

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'तंत्र-मंत्र करते थे नारायण साई'

महेंद्र का दावा है कि उन्होंने मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले में नारायण साई को तथाकथित तांत्रिक गतिविधियों में शामिल देखा है.

"2002 में दीवाली से पहले की रात थी. हम झाबुआ में थे जहां एक नए आश्रम का निर्माण चल रहा था. मैं रात को बाथरूम जाने के लिए उठा तो देखा कि आश्रम के बीच वाले आंगन में नारायण साई बैठे हैं. उनके सामने हवन की आग जल रही थी. मैंने देखा कि आग के सामने एक मानव शरीर रखा हुआ है और उस शरीर के ऊपर नरकंकाल की एक खोपड़ी रखी है. आश्रम के संस्कारों के अनुसार मैं साई को प्रणाम करके पीछे बैठ गया. तभी साई ने कहा- जाओ, विघ्न मत करो."

वह आगे जोड़ते हैं, "साई ने अगली सुबह आकर मुझे तंत्र विद्या से जुड़े कुछ मंत्र दिए. बहुत जल्दी मुझे यह भी पता चल गया कि साई घोर व्याभिचारी है. मैंने ख़ुद अपनी आंखों से साई को अलग-अलग आश्रमों में लड़कियां बुलाते हुए और व्याभिचार में लिप्त देखा है. यह सब देखकर मेरा अपने गुरुओं में विश्वास टूट गया."

2005 में महेंद्र ने आश्रम तो छोड़ दिया लेकिन आश्रम ने उन्हें नहीं छोड़ा.

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कैसा था आसाराम का 'सेवादार' होना

महेंद्र बताते हैं कि आश्रमों में बिताए गए उनके 10 साल बहुत कष्ट में बीते.

उनके मुताबिक़, "मज़दूरी से लेकर लिखा-पढ़ी तक सारे काम करवाते रहे पर दस साल में एक रुपया नहीं दिया. आसाराम और साई की जीवन शैली और हम सेवादारों की जीवनशैली में वही फ़र्क था जो एक राजा और ग़ुलाम की जीवन शैली में होता है. वे दोनों महंगे कपड़े पहनते, मेवे खाते, केसर मिला दूध पीते और हम सेवादारों को दोपहर में रोटी और बाकी वक़्त थोड़ी सी मूंग खिचड़ी दी जाती थी. ठंड में जब हम कपड़े मांगते तो आसाराम कहता कि तुम्हारा शरीर तो गुरू के लिए है. तुम्हें क्या करना कपड़ो का?"

Image caption अपनी मां गोपाली देवी के साथ महेंद्र चावला

'सब कुछ गुरू का है इसलिए गुरू को ही जाए'

महेंद्र की मां गोपाली देवी उस वक़्त को याद करके आज भी दहल जाती हैं जब महेंद्र आसाराम के आश्रम में थे.

वह कहती हैं, "इसे वहां कुछ नहीं दिया जाता था. सब कुछ घर से मैं भेजती जैसे किसी लड़की को विदाई के वक़्त सामान दिया जाता है न, उसी तरह मैं इसे सामान बांध कर देती थी. कपड़े, साबुन, तेल, शहद, घी सब कुछ. यहां तक कि सोने के लिए बिछौना और ओढ़ने के लिए कंबल भी घर से ही जाता था. दिन भर मज़दूरी करवाते लड़के से और एक रुपया नहीं देते. जो कुछ थोडा-बहुत पैसा मैं भेजती थी यहां से, उसे भी आश्रम वाले रख लेते. लड्डू बना के भेजती इसके लिए पर वो गायब हो जाते. आसाराम का कहना था कि सब कुछ गुरू का है इसलिए गुरू को ही जाए."

गोपाली देवी का कहना है कि उन्होंने बचपन में महेंद्र को आश्रम जाने से बहुत रोका था पर वो नहीं माने. हालांकि उन्हें जोधपुर मामले में न्याय की उम्मीद है पर सबसे ज़्यादा अपने बेटे की सलामती की फ़िक्र है.

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'भगवान की तस्वीर उतरवाकर अपनी लगवाई'

महेंद्र के अनुसार आश्रमों में पहला सबक 'गुरू पर सवाल न उठाने' का सिखाया जाता है.

वह जोड़ते हैं, "आसाराम की ऋषि प्रसाद जैसी पत्रिकएं उनके भक्तों में बांटी जाती हैं. इसमें यही लिखा होता है कि गुरू ईश्वर से पहले और बड़ा है.

आसाराम ने अपने भक्तों से घरों में से राम और कृष्ण जैसे देवताओं की तस्वीरें उतरवाकर अपनी तस्वीरें लगवा दी थीं.

"गुरू नानक जी की तरह वह अपना एक समांतर धर्म और अनुयायी समूह तैयार करना चाहते थे. इस सबकी शुरुआत सबसे पहले भक्तों को अंध-भक्तों में बदलने से होती थी."

महेंद्र पर हुए जानलेवा हमले के मामले में हरियाणा पुलिस ने अभी तक चार्जशीट दायर नहीं की है.

अपने भविष्य को लेकर परेशान महेंद्र कहते हैं कि उन्होंने जोधपुर और सूरत मामलों में गवाही देकर आसाराम के ख़िलाफ़ आवाज़ इसलिए उठाई ताकि उनके जैसे दूसरे लोगों की ज़िंदगी तबाह होने से बच सके.

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