मोदी और शी की अनौपचारिक मुलाक़ात में क्या होगा?

  • 26 अप्रैल 2018
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शंघाई कॉरपोरेशन संगठन से जुड़े विदेश मंत्री जून में होने वाले क्विंगदाओ सम्मेलन के लिए ज़मीनी काम कर रहे हैं जब एससीओ के सदस्य देशों के बड़े नेता चीन की यात्रा करेंगे. लेकिन कुछ मामलों में एक बेहद अहम काम हो चुका है.

बीते रविवार को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ बातचीत के बाद चीनी विदेश मंत्री और स्टेट काउंसिलर वांग यी ने घोषणा की कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग वुहान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक मुलाकात करेंगे.

चीनी न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ न्यूज़ ने वांग के हवाले से छापा है, "शी और मोदी के बीच भारत चीन रिश्तों पर रणनीतिक संवाद समेत अलग-अलग मुद्दों पर गहराई से बातचीत होगी."

कैसे देखना चाहिए ये कदम?

भारत के पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए कहा है, "ये निश्चित ही एक बड़ा कदम है. वे एक अनौपचारिक अंदाज में मिलेंगे. मुद्दे पूरी तरह खुले होंगे. ये एक व्यक्ति और सहज मुलाकात होगी. "

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भारत-चीन रिश्तों के लिहाज से 2017 बेहद अच्छा नहीं रहा क्योंकि डोकलाम समेत 2018 में अरुणाचल प्रदेश में दलाई लामा की यात्रा को लेकर तनाव बना रहा.

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भारत सरकार ने मालदीव में संवैधानिक संकट पैदा होने पर हस्तक्षेप ना करके और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की पहल 'थेंक्यू इंडिया' के मुद्दे पर सुलह सफाई वाला रुख अपनाया है.

इसी तरह फरवरी में जब फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान के चरमपंथी संगठनों को समर्थन देने के मामले में इस्लामाबाद पर दबाव बनाया तो बीजिंग बीच में नहीं आया.

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भारत के लिए अहम माने जाने वाले दो मुद्दों नाथू -ला रास्ते का दोबारा खोला जाना और ब्रह्मपुत्र-सतलुज नदी का हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने पर बीजिंग की ओर से सहमति बन गई है.

लेकिन अभी भी दरार बाकी है

भारत के लिए बीजिंग का कई स्तरों पर पाकिस्तान के साथ गठजोड़ अभी भी एक लाल निशान जैसा है. न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत के प्रवेश पर चीन की ओर से बाधा और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति अभी तक अनसुलझे मुद्दे हैं.

हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत बढ़ चुका है. इसी तरह ट्रेड डेफिसिट चीन के पक्ष में है.

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चीन अमरीका, जापान के साथ भारत की दोस्ती को शक की निगाह से देखता है. भारतीय-प्रशांत क्षेत्रों के देशों से संबंधों में सक्रिय रोल निभाने और सीमा पर जवानों की मौजूदगी ऐसे मामले हैं जिनका कोई इतिहास नहीं है.

बीजिंग अमरीका के मामले में भी एक नया दुश्मन देख रहा है जो चीन को आर्थिक से लेकर रणनीतिक मुद्दे पर भड़का रहा है.

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आख़िर अब क्या होगा?

अगर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो आपको एक रोचक सबक मिलेगा. ये मुमकिन है कि ये सबक पूरी तरह से अहम न हो.

वो साल 1989 था और जून का महीना था.

चीन की राजधानी में नागरिकों के ख़िलाफ़ सेना का इस्तेमाल किया गया था. इसके बाद शहर का तियाननमेन चौक रक्तरंजित हो गया.

इसके कुछ समय बाद चीन का प्रतिद्वंद्वी साम्यवादी देश सोवियत संघ बिखर गया.

भारत को लगा कि शायद चीन तीन दशक पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिेए तैयार होगा जिसकी वजह से एक कड़वे अनुभवों वाला युद्ध लड़ा गया था.

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पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश सचिव शिव शंकर मेनन ने 1992 में तत्कालीन विदेश सचिव जेएन दीक्षित से कहा था, "तियाननमेन चौराहे की घटना और सोवियत संघ के बिखरने से पैदा हुआ डर की वजह से चीनी नेतृत्व को भारत के साथ सीमा पर शांति सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि चीनी सरकार दूसरे तनाव भरे मुद्दों का समाधान कर सके. "

लेकिन बाद में ये पता चला कि चीनी सरकार सुनने की मुद्रा में थी.

मेनन ने अपनी किताब चॉइसेज़ - इनसाइड द मेकिंग ऑफ़ इंडियाज़ फॉरेन पॉलिसी में लिखा है कि 1993 तक चीन और भारत के बीच में सीमा विवाद पर एक समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके थे.

लेकिन इस पूरे मुद्दे पर सबसे अहम बात ये है कि चीन में एक ऐसा राष्ट्रपति है जो अपनी पूरी ज़िंदगी के लिए ये पद हासिल कर चुका है. वहीं भारत में मोदी अपना कार्यकाल ख़त्म करने वाले हैं और अगले साल चुनाव का सामना करेंगे.

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