जी.. बच्चों को नहीं, मां-बाप को मिल गया होमवर्क

  • 26 अप्रैल 2018
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स्कूल में बच्चों के लिए गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने वाली है. इन छुट्टियों में बच्चों के लिए होमवर्क आम बात है. अक्सर जो होमवर्क स्कूलों में दिए जाते है वो बच्चों के लिए कम और अभिभावकों के लिए ज़्यादा होते हैं.

लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया में एक स्कूल द्वारा पेरेंट्स को दिए गए होमवर्क का सर्कुलर वायरल हो रहा है.

ये होमवर्क तमिलनाडु के अन्नाई वायलेट मेट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंड्री स्कूल ने अपने यहां पढ़ने वाले पहली से पांचवी क्लास के छात्रों के माता-पिता के लिए जारी किया है.

इस सर्कुलर में अभिभावकों के लिए 17 प्वाइंट का काम दिया गया है, जैसे

•पेरेंट्स को दिन में दो वक्त का खाना बच्चों के साथ खाना चाहिए.

•खाने के बाद अपना बरतन खुद धोना बच्चों को सीखाएं.

•छुट्टियों के दौरान पेरेंट्स बच्चों को खाना बनाने की भी ट्रेनिंग दें.

•बच्चों के साथ पड़ोसियों के घर जाने, अपने ऑफिस ले जाने तक की सलाह दी गई है.

•टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रोनिक आइटम से बच्चों को दूर रखें.

स्कूल द्वारा जारी किए गए इस सर्कुलर पर बीबीसी ने स्कूल प्रबंधन से बात की.

स्कूल के अकेडमिक इंचार्ज डॉ थिरुसेलवी एडविल ने माना कि स्कूल ने वाकई में ऐसा सर्कुलर निकाला है.

इसके पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, "इन दिनों पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है. माता पिता ऑफिस में और बच्चे दिन भर मोबाइल में बिजी रहते है. इसलिए हमने इस बार पेरेंट्स से गुजारिश कि है कि बच्चों के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ारे."

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उनके मुताबिक पेरेंट्स 'वीकऐंड पेरेन्ट' बनते जा रहे हैं. केवल सप्ताह के अंत में बच्चों से बातचीत करते हैं. इसलिए हमने काम का तरीका थोड़ा बदलने की सोची. उसी क्रम में ये सर्कुलर जारी किया गया है.

लेकिन क्या स्कूल ने अभिभावकों के आलावा बच्चों को भी होमवर्क दिया है?

इस सवाल के जवाब में डॉ थिरुसेलवी कहती हैं, "इसकी ज़रुरत नहीं है. हमारी कोशिश है कि बच्चे किताबों से परे सोशल होना सीखें."

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डॉ थिरुसेलवी खुद एक टीचर है और पेरेंट भी. उनके मुताबिक स्कूल में केवल पढ़ाई की बात होती है तो पेरेंट भी किताबी पढ़ाई के लिए ही घर में बच्चों पर दवाब डालते हैं. अगर स्कूल बच्चों को पढ़ाई से अलग करने की पहल करेगा तो स्वाभाविक है कि पेरेंट्स भी ऐसा करेंगे.

दक्षिण भारत के इस स्कूल की पहल पर मुंबई में बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था एपीस्टोर.कॉम से बात की. एपीस्टोर से जुड़ी पूर्णिमा झा ने हमे बताया कि आज पढ़ाई से ज़्यादा ज़रुरी है बच्चों को सोशल स्किल सिखाना.

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अन्नाई वायलेट मेट्रीकूलेशन स्कूल के सर्कुलर का उदाहरण देते हुए पूर्णिमा ने कहा, "पहले के ज़माने में साथ खाना खाते वक्त कोई पहले उठ जाता था, तो उसे तमीज़दार नहीं मानते थे."

लेकिन उसके पीछे भी यही सोच हुआ करती थी. ये सोच ये थी कि पूरा परिवार एक साथ खाना खाने बैठे और उठे. खाना खाने का वक्त वो वक्त होता था जब परिवार एक साथ होता था. लेकिन भाग दोड़ भरी ज़िंदगी में ये वक्त हमें अब नहीं मिलता. उसी को अब सहेजने की ज़रुरत है.

वो आगे कहतीं हैं, " छह से दस साल की उम्र के बच्चों में डेवलेपमेंट और लर्निंग दोनों को साथ साथ में चलना चाहिए."

आजकल मां बाप बच्चों को छुट्टियों में समर कैंप भेज देते हैं और सोचते हैं बिजी रखने का यही सबसे बेहतर तरीका है. लेकिन ऐसा नहीं है.

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पूर्णिमा बताती है कि आजकल बच्चों में आबर्जवेशन स्किल, इमोशनल इंटेलिजेंशन सब कम होते जा रहे हैं. ये केवल नए अग्रेज़ी के टर्म नहीं है. इस पर बच्चों के साथ पेरेंट्स को वाकइ में काम करने की ज़रुरत है.

वो आगे बताती है, "हमने भी इसलिए ऑन लाइन समर कैंप की शुरूआत की है. इस समर कैंम्प में 30 दिन में माता पिता को बच्चों के हर दिन नया काम करना है. दोनों एक दूसरे को बेहतर समझ सके"

रोज़ाना जो हम सुनते हैं कि बच्चे ने क्लास में दूसरे बच्चे को मार डाला, मां पर बच्चे ने हाथ उठाया.

पूर्णिमा का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि बच्चों में 'एम्पेथी' यानी सहानुभूति की कमी है. पेरेंट्स के लिए जो होमवर्क दिया गया है, ये एक सराहनीय प्रयास है सोशल स्किल बढ़ाने में.

दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में रहने वाली अमृता को भी लगता है कि ये एक अच्छा प्रयास है. वो कहती हैं, ये होमवर्क कम से कम उन बेतुके होमवर्क से तो अच्छा है जिसमें बच्चे सारा काम माता-पिता से कराते हैं. इससे बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का वक्त मिलता है.

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