क्यों दरक रही है भारत और रूस की दोस्ती की दीवार?

  • 26 अप्रैल 2018
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यह समय संभवत: दक्षिण एशिया के दो महत्वपूर्ण देश भारत और पाकिस्तान के दोस्त बदलने और पुराने दोस्तों से दूरियां बढ़ने का है.

रूस और भारत में क़रीबी का एक समृद्ध इतिहास रहा है तो दूसरी तरफ़ पाकिस्तान और अमरीका के याराना का भी. पिछले 10 सालों में वैश्विक स्तर पर कई चीज़ें उलट-पुलट हुई हैं और इसी क्रम में दोनों देशों के दोस्त भी स्पष्ट तौर पर बदलते दिख रहे हैं.

इसी महीने 6 अप्रैल को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़ुर्रम दस्तगिर ख़ान ने रूस की सरकारी मीडिया स्पूतनिक से कहा कि पाकिस्तानी सेना की रूस से एसयू-35 लड़ाकू विमान और टी-90 टैंक ख़रीदने की योजना है.

ख़ान की यह घोषणा पाकिस्तान के पहले के रुख़ से बिल्कुल अलग थी. इससे पहले पाकिस्तान ने एसयू-35 ख़रीदने से इनकार कर दिया था. ज़ाहिर है इस घोषणा का संबंध पाकिस्तान और रूस के बीच गहरे होते संबंधों से है.

रूस और भारत की दोस्ती और ऐतिहासिक अविश्वास के कारण पाकिस्तान से रूस के अच्छे संबंधों की संभावना के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जाता था. लेकिन अब पाकिस्तान और रूस के बीच बढ़ते सुरक्षा संबंधों से दक्षिण एशिया का भूराजनीतिक वातावरण नई और अहम करवट ले रहा है.

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पाकिस्तान-रूस में दोस्ती की संभावना

रूस और पाकिस्तान के बीच गहरे रिश्तों का संबंध दोनों देशों के व्यापक और साझा हितों से है और आने वाले वक़्त में इसके और फलने-फूलने की संभावना है.

रूस और पाकिस्तान की दोस्ती में स्थायित्व और उसके भविष्य को दोनों देशों की साझी चाहत में देखने की बात कही जा रही है. दोनों देश चाहते हैं कि दक्षिण एशिया में अमरीका का प्रभाव कम हो और अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध का समाधान ढूंढने के लिए साझी रणनीति के तहत काम किया जाए.

रूस अब पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग में सीधे तौर पर शामिल है और इसके साथ ही रूस ने पाकिस्तान का दुनिया भर के कई संगठनों में बचाव किया है. रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंध अमरीका के नीति निर्माताओं के लिए एक नई चुनौती से कम नहीं हैं.

रूस और पाकिस्तान के बीच संबंधों में जमी बर्फ़ तब पिघली जब 2007 में रूसी प्रधानमंत्री मिखाइल फ्रादकोव पाकिस्तान के दौरे पर गए. 2011 में अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में अविश्वास इस कदर बढ़ा कि ऐतिहासिक रूप से दोनों की दोस्ती बिखर-सी गई.

2011 में ही अमरीका ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मारा था. इसी दौरान रूस और पाकिस्तान क़रीब आए. दोनों देशों में अमरीका विरोधी भावना ज़बरदस्त थी और दोनों को क़रीब लाने में इस भावना की भी बड़ी भूमिका रही.

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पाकिस्तान ने पहले अमरीका को चुना अब रूस को

पाकिस्तान और रूस के नीति निर्माताओं को लगा कि दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए अमरीका के प्रभाव को कम करना ज़रूरी है और इसी तर्क पर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में गति आती गई.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय पांडे का मानना है कि पाकिस्तान और रूस के संबंधों की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी रही है.

वो कहते हैं, ''1949 में सोवियत संघ ने पहली बार तत्कालीन पाकिस्तानी नेता लियाक़त अली ख़ान को आमंत्रित किया था, लेकिन वो गए नहीं थे. इसी आधार पर उन्हें अमरीका से न्योता मिल गया. इसके बाद पाकिस्तान और अमरीका के बीच 1954 में ख़ास संबंध बना. पाकिस्तान अमरीका की कैंटोनमेंट पॉलिसी में शामिल हो गया. ज़ाहिर है पाकिस्तान शीत युद्ध में अमरीका के साथ था. अफ़ग़ानिस्तान में भी उसने रूस के ख़िलाफ़ अमरीका का साथ दिया था. हालांकि अब वही पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में रूस की मध्यस्थता की बात कर रहा है और चाहता है कि अमरीकी सेना रूस से निकल जाए.''

संजय पांडे कहते हैं, ''इसके बावजूद रूस ने कभी पाकिस्तान को छोड़ा नहीं था. जब 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ तो रूस ने बड़ा ही संतुलित पक्ष रखा था. ताशकंद में रूस ने जो समझौता कराया वो भी भारत के ख़िलाफ़ ही गया था. इस समझौते के बाद पाकिस्तान को लगा था कि रूस पूरी तरह से उसके ख़िलाफ़ नहीं है.''

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रूस के लिए पाकिस्तान भी अहम

''सोवियत संघ के आख़िरी दिनों में देखें तो उस वक़्त के विश्लेषणों में रूस में कहा जाता था कि भारत उसके लिए अहम देश है, लेकिन पाकिस्तान के ख़िलाफ़ होने से उसी का नुक़सान होगा. उस दौरान सोवियत संघ की फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान से निकल रही थी. रूस के बहुत सारे युद्धबंदी थे जिन्हें पाकिस्तान की मदद के बिना नहीं निकाला जा सकता था. ऐसे में रूस पाकिस्तान से संबंधों की संभावना को ख़त्म नहीं करना चाहता था.''

सोवियत संघ के विघटन के बाद भी ऐसी कोशिश की गई, लेकिन रूस को लगा कि भारत की क़ीमत पर पाकिस्तान से दोस्ती ना की जाए. संजय पांडे कहते हैं, ''अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना हटाने की बात कही तो रूस को लगा कि तालिबान प्रभावशाली होगा और मध्य एशिया में ख़तरे बढ़ेंगे. इसलिए अमरीका के बाद अफ़ग़ानिस्तान में उसकी मौजूदगी होनी चाहिए और इसमें पाकिस्तान अहम भूमिका निभा सकता है.''

अमरीका विरोधी भावना के कारण दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग भी कायम हुआ. सितंबर 2016 में रूस और पाकिस्तान ने पहली बार संयुक्त सैन्य अभ्यास का आयोजन किया. आतंकवाद विरोधी इस सैन्य अभ्यास को पाकिस्तान के रक्षा साझेदारों में विस्तार के तौर पर देखा गया.

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अमरीका से बढ़ रही पाकिस्तान की दूरी

इसके साथ ही एक संदेश यह भी मज़बूती से गया कि पाकिस्तान अपनी सैन्य आपूर्ति की अमरीका पर निर्भरता कम करना चाहता है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार अमरीका और पाकिस्तान के बीच का हथियारों का सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भारत के साथ संबंधों को काफ़ी तवज्जो दे रहे हैं. इस्लामिक चरमपंथियों से संबंधों को लेकर ट्रंप कई बार पाकिस्तान की आलोचना कर चुके हैं. इसी के मद्देनज़र रूस और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में अमरीका के प्रभाव को साथ मिलकर कम करना चाहते हैं.

पाकिस्तान और रूस चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका अपने सैन्य अभियान को समेट ले. इसी साल 20 फ़रवरी को पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ रूस गए थे. इस दौरे में पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा था कि रूस लंबे समय से कहता रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में नेटो देशों का सैन्य अभियान बुरी तरह से नाकाम हुआ है और इसमें सच्चाई है.

पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता के लिए रूस को मध्यस्थ बनाने का प्रस्ताव पहले ही पेश कर चुका है. पाकिस्तान चाहता है कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से चला जाए.

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Image caption रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर

अफ़ग़ानिस्तान पर साथ हैं रूस और पाकिस्तान

दोनों देश अफ़ग़ानिस्तान में बिना अमरीका के शांति स्थापना चाहते हैं. अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा मुद्दा है जिसका संबंध दोनों देशों में अमरीका विरोधी भावना से है. पाकिस्तान और रूस चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना में तालिबान को भी शामिल किया जाए.

रूस और पाकिस्तान का मानना है कि आईएसआईएस-खोरासन (ISIS-K) अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है, जबकि अमरीका का मानना है कि आईएसआईएस-के का ख़तरा लगातार कमज़ोर हो रहा है.

रूस और पाकिस्तान का तर्क है कि इराक़ और सीरिया में आईएसआईएस लड़ाकों की कमी के कारण आतंकवादी नेटवर्क लगातार नई नियुक्तियां कर रहे हैं. दोनों देशों की इस अवधारणा के बीच कहा जा रहा है कि आईएसआईएस के ख़तरों से निपटने के लिए पाकिस्तान और रूस तालिबान को हथियार मुहैया करा रहे हैं.

पाकिस्तान और रूस दोनों इस बात पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं कि आतंक विरोधी अभियान में संप्रभुता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. नवंबर 2011 में सीमा पार कर अपने 24 सैनिकों के मारे जाने को लेकर पाकिस्तान अमरीका की तीखी आलोचना करता रहा है.

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रूस दे चुका है पाकिस्तान का साथ

ऐसे मौकों पर रूस पाकिस्तान की संप्रभुता का हवाला देकर उसके साथ खड़ा रहा है. सबसे दिलचस्प यह है कि मध्य-पूर्व में रूस सीरिया में बशर अल-असद के साथ है और सऊदी अरब रूस के ख़िलाफ़ है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान सऊदी का ख़ास क़रीबी है. इसके बावजूद पाकिस्तान से रूस सैन्य संबंध बढ़ा रहा है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण एशिया में स्थिति काफ़ी जटिल है. एक तरफ़ चीन हिन्द महासागर में अपनी पहुंच पुख्ता कर रहा है तो दूसरी तरफ़ रूस चाहता है कि अमरीका के प्रभाव को कम किया जाए. ऐसे में भारत न खुलकर रूस का विरोध कर पाता है और न ही चीन से टकराने की उसकी क्षमता है.

1991 में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान ने 'साउथ एशिया न्यूक्लियर फ़्री ज़ोन' का प्रस्ताव पेश किया था जिसका भारत विरोध करता था. भारत का तर्क था कि जब तक इसमें चीन नहीं शामिल होगा तब तक इस प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है.

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संजय पांडे कहते हैं कि पाकिस्तान का यह प्रस्ताव भारत के परमाणु कार्यक्रम को बाधित करने के लिए था, लेकिन सोवियत संघ ने पाकिस्तान के इस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया था.

प्रोफ़ेसर पांडे को लगता है कि पाकिस्तान और रूस में दोस्ती की संभावना है और इसके साथ ही दक्षिण एशिया में बहुत ही जटिल गेम शुरू होने वाला है. पांडे यह भी मानते हैं कि रूस को भारत जैसा ख़रीदार नहीं मिलेगा क्योंकि हथियारों की ख़रीद के मामले में भारत की जगह पाकिस्तान नहीं ले सकता क्योंकि पाकिस्तान के पास इतनी विदेशी मुद्रा नहीं है.

पाकिस्तान के दौरे पर आज तक कोई रूसी राष्ट्रपति नहीं गया है. 18 मार्च 2016 को पाकिस्तान में रूसी राजदूत से राष्ट्रपति पुतिन के पाकिस्तान दौरे को लेकर सवाल किया गया था कि पुतिन ने एक भी पाकिस्तानी दौरा क्यों नहीं किया? इस सवाल के जवाब में तत्कालीन रूसी राजदूत ने कहा था, ''रूस को लगता है कि अभी तक कोई ऐसी वजह नहीं है जिसके आधार पर पुतिन पाकिस्तान का दौरा करें.'' ज़ाहिर है इसके बाद भी राष्ट्रपति पुतिन पाकिस्तान नहीं गए.

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